राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ
अपील संख्या-187/2021
(सुरक्षित)
(जिला उपभोक्ता आयोग, गौतम बुद्ध नगर द्वारा परिवाद संख्या 183/2014 में पारित आदेश दिनांक 02.07.2018 के विरूद्ध)
Indrapal son of Shri Lakhmi Chand resident of C -4/102, Sector, 31 Noida, District-Gautambudhh Nagar
................अपीलार्थी/परिवादी
बनाम
Universal Sompo General Insurance Co. Ltd. Unit 401 Fourth Floor, Sangam Complex 127 Andheri, Kurli Road, Andheri East, Mumbai and regional claim office at Assotech One Building, IInd Floor, C-20/1A, Sector-62, Noida, Gautambudhh Nagar-201309
...................प्रत्यर्थी/विपक्षी
समक्ष:-
1. माननीय न्यायमूर्ति श्री अशोक कुमार, अध्यक्ष।
2. माननीय श्री गोवर्धन यादव, सदस्य।
3. माननीय श्री राजेन्द्र सिंह, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री शैलेश सचान,
विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : कोई नहीं।
दिनांक: 23.03.2021
मा0 श्री राजेन्द्र सिंह, सदस्य द्वारा उदघोषित
निर्णय
अपीलार्थी द्वारा प्रार्थना पत्र अपील प्रस्तुत करने में हुए विलम्ब को क्षमा करने हेतु प्रस्तुत किया गया है। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता श्री शैलेश सचान को सुना और पत्रावली का परिशीलन किया।
अपीलार्थी की ओर से दिये गये शपथ पत्र दिनांकित 25.02.2021 में कहा गया है कि विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग,
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गौतम बुद्ध नगर द्वारा दिनांक 02.07.2018 को आदेश पारित किया गया, जिसके पश्चात् प्रार्थी यहॉं से वहॉं सूचना प्राप्त करने के लिए दौड़ता रहा, लेकिन उसे नवम्बर, 2018 तक कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई। दिसम्बर, 2018 में वह अपील प्रस्तुत करने लखनऊ आया और एक राम निवास से मिला, जिन्होंने दावा किया कि वे अधिवक्ता हैं और उसने उनको अपने अभिलेख तथा 5,000/-रू0 फीस के दे दिये, लेकिन वह उन वकील साहब का मोबाइल नम्बर नहीं ले पाया और वापस नोएडा लौट गया। 06 महीने तक इन्तजार करने पर जब उसे कोई सूचना नहीं मिली तब वह नोएडा स्थित अपने वकील साहब से मिला। सितम्बर, 2019 में प्रार्थी लखनऊ आया और जब उसने अपने अपील के बारे में मालूम किया तब पता चला कि कोई अपील प्रस्तुत नहीं की गयी है। अक्टूबर, 2019 में वह अपना अर्थराइटिस का इलाज कराने चला गया और उसे दिसम्बर, 2019 में कुछ आराम मिला। जनवरी, 2020 में उसकी योजना लखनऊ आने की थी, किन्तु अर्थराइटिस और ठण्ड के कारण लखनऊ आना सम्भव नहीं हो पाया। प्रार्थी ने सोचा कि वह होली के बाद लखनऊ जायेगा, किन्तु 18 मार्च से जनता कर्फ्यू लग गया और सम्पूर्ण बन्दी हो गयी। इसके पश्चात् वह फरवरी, 2021 में अपने स्थानीय अधिवक्ता के साथ लखनऊ आया और अपने नये अधिवक्ता श्री शैलेश सचान से मिला। यह विलम्ब जो हुआ है यह जानबूझकर नहीं किया गया है, इसलिए इस विलम्ब को क्षमा करते हुए अपील मूल नम्बर पर संस्थित की जाये।
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हमने प्रश्नगत निर्णय का अवलोकन किया, जिसमें निर्णय की अतिरिक्त प्रति दिनांक 12.01.2021 को तैयार होने सम्बन्धी मोहर लगी है। प्रत्यर्थी/विपक्षी जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, गौतम बुद्ध नगर के समक्ष उपस्थित हुआ था और उसने अपना लिखित कथन प्रस्तुत किया था तथा तर्क के समय भी उसके अधिवक्ता वहॉं उपस्थित थे। निर्णय दिनांक 02.07.2018 का है। शपथी का यह कहना कि वह यहॉं से वहॉं भागदौड़ करता रहा और उसे निर्णय के बारे में जानकारी नहीं हुई, विश्वसनीय नहीं है।
लॉकडाउन के कारण माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दिनांक 15.03.2020 से दिनांक 15.03.2021 तक की अवधि के विलम्ब को क्षमा करने के लिए एक सामान्य निर्देश जारी किया था। उसके पहले के समय के लिए ऐसी कोई अवधारणा नहीं की जायेगी। इस सम्बन्ध में निम्न न्यायिक दृष्टान्त महत्वपूर्ण हैं:-
महिन्द्रा व महिन्द्रा फाइनेंशियल सर्विसेज लि0 बनाम नरेश सिंह, I (2013) CPJ 407 (NC) के मामले में माननीय राष्ट्रीय आयोग ने कहा कि विलम्ब को क्षमा करने का कोई रोजमर्रा का कार्य नहीं है तथा याची को प्रत्येक दिवस के विलम्ब का उचित स्पष्टीकरण देना होगा। चूँकि उक्त मामले में 71 दिन के विलम्ब का वह कोई उचित और संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका, इसलिए उसे कालबाधित माना गया।
यू0पी0 आवास एवं विकास परिषद बनाम बृज किशोर पाण्डेय, IV (2009) CPJ 217 (NC) के मामले में 84 दिवस का
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विलम्ब था और माननीय राष्ट्रीय आयोग ने कहा कि यह अपने आप में यह दर्शित करने के लिए पर्याप्त है कि इस विलम्ब का कोई कारण नहीं है और ऐसा कोई भी कारण नहीं दिखाया गया, जो निश्चयात्मक तर्कों पर आधारित हो। अत: विलम्ब क्षमा योग्य नहीं है।
अंशुल अग्रवाल बनाम नोएडा, IV (2011) CPJ 63 (SC) के पैरा-7 में लिखा है कि न्यायालय को विलम्ब क्षमा करने के प्रार्थना पत्र पर विचार करते समय यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत विशेष अवधि निश्चित की गयी है, जो अपील और पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत करने के सम्बन्ध में है, जिसका उद्देश्य ऐसे मामलों के यथाशीघ्र निस्तारण का है। यदि न्यायालय ऐसे विलम्ब को, जो काफी समय से है, क्षमा करेंगे तब उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का मूल उद्देश्य असफल हो जायेगा। अपील प्रस्तुत करने की अवधि 30 दिन की है।
I (2013) CPJ 460 (NC), IV (2009) CPJ 217 (NC), IV (2011) CPJ 155 (NC) न्यायिक दृष्टान्तों एवं माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंशुल अग्रवाल बनाम नोएडा में दी गयी न्याय व्यवस्था को देखते हुए हम इस विचार के हैं कि वर्तमान अपील कालबाधित है और विलम्ब क्षमा करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं है।
इस तरह हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह अपील
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अत्यधिक विलम्ब से प्रस्तुत की गयी है और प्रत्येक दिन के विलम्ब का उचित और संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। ऐसी स्थिति में विलम्ब क्षमा करने का प्रार्थना पत्र स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है।
आदेश
विलम्ब क्षमा प्रार्थना पत्र निरस्त किया जाता है। अपील अंगीकरण के स्तर पर कालबाधित होने के कारण खारिज की जाती है। पत्रावली दाखिल दफ्तर हो।
(राजेन्द्र सिंह) (गोवर्धन यादव) (न्यायमूर्ति अशोक कुमार)
सदस्य सदस्य अध्यक्ष
जितेन्द्र आशु0
कोर्ट नं0-1