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DAYARAM SANODIYA filed a consumer case on 25 Jul 2014 against UNITED INDIA INSURANCE COMPANY LMD. in the Seoni Consumer Court. The case no is CC/35/2014 and the judgment uploaded on 15 Oct 2015.
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण फोरम, सिवनी(म0प्र0)
प्रकरण क्रमांक- 35-2014 प्रस्तुति दिनांक-15.04.2014
समक्ष :-
अध्यक्ष - रवि कुमार नायक
सदस्य - श्री वीरेन्द्र सिंह राजपूत,
दयाराम सनोडिया, आत्मज श्री छोटेलाल
सनोडिया, उम्र लगभग 40 वर्श, निवासी-
ग्राम पीपरडाही, तहसील व जिला सिवनी
(म0प्र0)।.....................................................................आवेदकपरिवादी।
:-विरूद्ध-:
(1) डिवीजनल मैनेजर, यूनाटेड इंडिया
इंष्योरेंस कंपनी लिमिटेड, जबलपुर,
तहसील व जिला जबलपुर (म0प्र0)।
(2) ब्रांच मैनेजर, यूनार्इटड इंडिया
इंष्योरेंस कंपनी लिमिटेड, ब्रांच आफिस
चर्च कम्पाउंड, जबलपुर रोड, सिवनी,
तहसील व जिला सिवनी
(म0प्र0)।.................................................अनावेदकगणविपक्षीगण।
:-आदेश-:
(आज दिनांक- 25.07.2014 को पारित)
द्वारा-अध्यक्ष:-
(1) परिवादी ने यह परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के तहत, अनावेदक बीमा कम्पनी की सिवनी षाखा (अनावेदक क्रमांक-2) द्वारा जारी बीमा पालिसी दिनांक-24.03.2011 से बीमित परिवादी की गाय, इयर टैग नंबर-37608, दिनांक-21.08.2013 को मृत्यु हो जाने के आधार पर, पेष परिवादी के बीमा क्लेम को दिनांक-13.02.2014 के पत्र के माध्यम से अनावेदक क्रमांक-2 के द्वारा अस्वीकार कर दिये जाने को अनुचित व सेवा में कमी बताते हुये, क्लेम राषि व हर्जाना दिलाने के अनुतोश हेतु पेष किया है।
(2) यह अविवादित तथ्य है कि-परिवादी ने सेन्ट्रल म0प्र0 ग्रामीण बैंक षाखा, पीपरडाही से ऋण प्राप्त कर, दो गाय खरीदी थी और अनावेदक बीमा कम्पनी की षाखा, अनावेदक क्रमांक-2 से उन्हें बीमित कराया था, जिनमें से प्रत्येक का बाजार मूल्य 15,400-रूपये रहा है और खरीदने की तारिख 24.02.2011 से दिनांक-23.03.2016 तक की पांच वर्श की अवधि के लिए बीमा किये जाने का प्रस्ताव परिवादी द्वारा दिया गया था, जो कि- अनावेदक बीमा कम्पनी द्वारा, पषु बीमा योजना के तहत दिनांक-31.03.2011 से 30.03.2016 तक की अवधि के लिए बीमा पालिसी क्रमांक-19090347 100100001687 जारी की गर्इ थी, जिसमें से एक गाय का आर्इ0डी0 नंबरइयर टैग नंबर-27608 रहा है, जिसका टैग, उक्त गाय के कान में लगाया गया था। यह भी विवादित नहीं कि-उक्त गाय की दिनांक-21.08.2013 को मृत्यु हो जाने संबंधी लिखित सूचना परिवादी के द्वारा, संबंधित बैंक षाखा वा अनावेदक क्रमांक-2 को दी गर्इ थी। और पषु चिकित्सा अधिकारी के पोस्टमार्टम रिपोर्ट, वेटेनरी सर्टिफिकेट व अन्य दस्तावेजों सहित, इयर टैग के साथ बीमा क्लेम, संबंधित बैंक षाखा के माध्यम से अनावेदक बीमा कम्पनी को परिवादी ने प्रेशित कराया था और अनावेदक क्रमांक-2 के पत्र दिनांक-13.02.2014 के माध्यम से परिवादी के दावा को बीमाकृत मृत पषु का टैग तोड़कर जमा किये जाने को पालिसी षर्तों का उल्लघंन बताते हुये वा षव विच्छेदन रिपोर्ट में उलिलखित लक्षण, बीमारी के लक्षणों से मेल न खाने के आधार पर, दावा मान्य न करते हुये, क्लेम भुगतान से इंकार कर दिया गया।
(3) स्वीकृत तथ्यों के अलावा परिवाद का सार यह है कि-परिवादी को गाय की बीमा पालिसी दिनांक-25.03.2011 को प्राप्त हुर्इ थी, बैंक से ऋण लेकर गाय क्रय की गर्इ थी, जो ऋण की राषि का भुगतान बैंक को कर दिया गया है। परिवादी की बीमित गाय जिसका इयर टैग नंबर-37608 रहा है, वह दिनांक-17.08.2013 को अचानक बीमार हुर्इ, पषु चिकित्सक द्वारा उसका इलाज किया जाता रहा और इलाज के दौरान गाय की मृत्यु दिनांक- 21.08.2013 को सुबह हो गर्इ, मृत्यु की सूचना पषु चिकित्सा अधिकारी को दिये जाने पर उनके द्वारा गाय का षव विच्छेदन प्रमाण-पत्र दिया गया वा संबंधित बैंक षाखा, पीपरडाही को भी मृत्यु की सूचना दी गर्इ वा सभी दस्तावेजों को संलग्न कर, इयर टैग के साथ अनावेदकों के कार्यालय में क्षतिपूर्ति का दावा पेष किया गया, जो कि-अनावेदकों के द्वारा, जिन कारणों से परिवादी का दावा निरस्त किया गया है, उनके आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि-परिवादी मृत पषु की क्षतिपूर्ति राषि पाने का अधिकारी नहीं है, जो कि-बीमित अवधि के अंदर पषु की मृत्यु हुर्इ है और बीमा षर्त के अनुसार, इलाज खर्च वा बीमित मूल्य का भुगतान व हर्जाना दिलाने का अनुतोश चाहा गया है और यह आधार लिया गया है कि-दावा स्वीकृत तथ्य में जिन कारणों का उल्लेख किया गया है उनकी जानकारी परिवादी को नहीं थी, इसलिए परिवादी को उल्लघंन के लिए दोशी करार नहीं किया जा सकता। और परिवादी ने जरिये अधिवक्ता नोटिस भी अनावेदकों को प्रेशित किया था, तब भी क्लेम राषि का भुगतान नहीं किया गया।
(4) स्वीकृत तथ्यों के अलावा, परिवाद के आधारों से इंकार करते हुये, अनावेदक के जवाब का यह अतिरिक्त कथन है कि-परिवादी की गाय, जिसका टैग नंबर-37608 था, की मृत्यु होने की सूचना प्राप्त होने पर, अनावेदक द्वारा इन्वेस्टीगेटर डाक्टर आर0के0 तिवारी से जांच करार्इ गर्इ, इन्वेस्टीगेटर रिपोर्ट के अनुसार, बीमित पषु के टैग को दो हिस्सों में तोड़कर जमा कराया गया है, जो कि-टैग लाक्ड सिथति में न होने के कारण टैग में कटिंग व रबिंग किये जाने के कारण, पालिसी षर्तों का उल्लघंन होने से दावा भुगतान योग्य नहीं पाया गया, इसलिए निरस्त किया गया। और जांच रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि-पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उलिलखित लक्षण, बीमारी के लक्षणों से मेल नहीं खाते, तो उपरोक्त कारणों से भी दावा निरस्त किया गया है, बीमा पालिसी की षर्तों का उल्लघंन किया गया, इसलिए दावा नो-क्लेम किया गया। बीमा कराते समय उक्त पषु का मूल्य 15,400-रूपये रहा है और पषु चिकित्सक विस्तार अधिकारी, सिवनी द्वारा अपने वेल्यूएषन रिपोर्ट में मृत्यु के समय गाय की कीमत 13,000-रूपये आंकी गर्इ है, परिवाद में जो 90,800-रूपये की मांग की गर्इ है, वह पूर्णत: फर्जी है। बीमित पषु की मृत्यु दिनांक-21.08.2013 को होना बतार्इ गर्इ और बीमा कम्पनी को मृत्यु की सूचना दिनांक-27.08.2013 को दी गर्इ, जो कि-विलम्ब से सूचना दिया जाना बीमा पालिसी की षर्तों का उल्लघंन है। परिवादी को क्लेम निरस्ती की सूचना दी गर्इ है, उसके प्रति कोर्इ सेवा में कमी नहीं की गर्इ है, इसलिए परिवाद निरस्त योग्य है।
(5) मामले में निम्न विचारणीय प्रष्न यह हैं कि:-
(अ) क्या अनावेदकगण द्वारा, परिवादी के क्लेम को अस्वीकार
कर दिया जाना अनुचित होकर, परिवादी के प्रति-की गर्इ
सेवा में कमी है?
(ब) क्या परिवादी, अनावेदकगण से पालिसी षर्तों के अनुसार
क्लेम राषि व हर्जाना पाने का अधिकारी है?
(स) सहायता एवं व्यय?े
-:सकारण निष्कर्ष:-
विचारणीय प्रष्न क्रमांक-(अ) :-
(6) परिवादी-पक्ष की ओर से अनावेदक क्रमांक-2 को बीमित गाय की मृत्यु की सूचना के पत्र दिनांक-23.08.2013 की प्रति प्रदर्ष सी-4 जो पेष की गर्इ है, वह स्वयं में कोर्इ पावती प्रति नहीं। और अनावेदक-पक्ष की ओर से उक्त प्राप्त पत्र की प्रति प्रदर्ष आर-1 जो पेष की गर्इ है, उसमें प्राप्त होने की जो सील लगार्इ गर्इ है, उनमें तारिख स्पश्ट न होने से हाथ से 27 अगस्त-2013 लेख किया गया है, तो वास्तव में किस तारिख को लिखित सूचना प्राप्त हुर्इ, इस संबंध में स्पश्ट प्रमाण नहीं, लेकिन स्वयं अनावेदक के द्वारा अनुचित विलंबित सूचना के आधार पर, परिवादी का क्लेम निरस्त किया गया हो, ऐसा प्रदर्ष सी-7 से दर्षित नहीं। और अनावेदक क्रमांक-2 के कार्यालय से पषु की मृत्यु सूचना के आधार पर, दावा फार्म जारी करने का पत्र दिनांक-27.08.2013 जो षाखा प्रबंधक, सेन्ट्रल म0प्र0 ग्रामीण बैंक षाखा, पीपरडाही को प्रदर्ष सी-6 का जारी किया गया उसमें भी अनावेदक क्रमांक-2 के द्वारा, बीमाकृत पषु की मृत्यु के संबंध में पत्र प्राप्त होने की दिनांक के कालम को खाली रखा गया है। और प्रदर्ष सी-6 के पत्र के द्वारा पूर्ण भरा हुआ दावा फार्म संबंधित बैंक अधिकारी के हस्ताक्षर व मोहर के सहित, पषु का षव विच्छेदन प्रमाण-पत्र, उपचार प्रमाण-पत्र, सरपंच और पंचनामा प्रमाण-पत्र, पषु की बीमारीमृत्यु की प्रथम सूचना पत्र की मूल, पषु का फोटो यदि संभव हो, जिसमें टैग नंबर स्पश्ट दिखता हो और पषु के कान का बिल्ला नंबर, दावा-प्रपत्र में नत्थी कर प्रेशित करने की मांग की गर्इ थी। स्पश्ट है कि-मृत पषु का कोर्इ भौतिक परीक्षण करने या पोस्टमार्टम के समय अपने किसी व्यकित को उपसिथत रखने की कार्यवाही का कोर्इ प्रयास अनावेदक बीमा कम्पनी की ओर से किया नहीं गया, न उक्त बाबद कोर्इ पत्राचार किया गया, तो सूचना के किसी विलम्ब के आधार पर, अनावेदक बीमा कम्पनी के कोर्इ हित या अवसर प्रभावित होने का मामला नहीं और इसलिए मृत्यु की सूचना देने में विलम्ब को अनावेदक-पक्ष की ओर से क्लेम अस्वीकृति का आधार नहीं बनाया गया है और इसलिए परिवाद के जवाब में अनावेदक बीमा कम्पनी के द्वारा उठाया गया नवीन आधार जो क्लेम निरस्त करते समय नहीं उठाया गया था, वह अब विचार योग्य भी नहीं और समुचित आधार भी नहीं।
(7) इंष्योरेंस इन्वेस्टीगेटर डाक्टर आर0के0 तिवारी के परीक्षण प्रतिवेदन की प्रति प्रदर्ष आर-2 में पषु का पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्षाया कारण, रेस्पीरेटरी फैल्योर के संबंध में यह कहा गया है कि-फेफड़ों की वास्तविक सिथति जो निमोनिया में हो जाती है, पषु चिकित्सक द्वारा नहीं पार्इ गर्इ, जिससे पोस्टमार्टम रिपोर्ट पूर्णत: फर्जी व अमान्य योग्य है और मूल्याकंन कम उपचार पत्रक (वेल्यूएषन कम ट्रीटमेंट सर्टिफिकेट) को भी पूर्ण रूपेण फर्जी व अमान्य योग्य होना डाक्टर आर0के0 तिवारी के प्रतिवेदन में कहा गया, क्योंकि उक्त में वर्णित टैग नंबर की वास्तविक सिथति छिपाते हुये, वेल्यूएषन कम सर्टिफिकेट जारी किया गया।
(8) तो उक्त संबंध में प्रदर्ष आर-4 को देखने से ही यह स्पश्ट है कि-उसमें मृत्यु पूर्व किये गये इलाज के संबंध में कोर्इ उल्लेख डाक्टर जे0 बी0 जैन पषु चिकित्सक द्वारा नहीं किया गया और मात्र यह लिख दिया गया कि-इन्चार्ज के द्वारा लक्षणों के अनुसार इलाज किया गया। और पषु के स्वास्थ्य के संबंध में संक्षेप बाबद जो विवरण दिया गया, उसमें रेस्पीरेटरी फैल्योर या निमोनिया के विषेश लक्षण नहीं दर्षाये गये हैं, तो पषु का कमजोर और षकितहीन हो जाना, हल्का बुखार और उसके द्वारा मृत्यु तक भोजन-पानी न लेना वास्तव में कोर्इ रेस्पीरेटरी प्राब्लम के लक्षण नहीं। प्रदर्ष सी-3 के वेटेनरी प्रमाण-पत्र में दिनांक-17.08.2013 से 21.08.2013 तक मृत्यु पूर्व इलाज वास्तव में किस चिकित्सक द्वारा किया गया, यह प्रदर्ष सी-3 के वेटेनरी प्रमाण-पत्र, प्रदर्ष सी-4 के वेल्यूएषन कम ट्रीटमेंट सर्टिफिकेट में कहीं दर्षाया नहीं गया, तो वेटेनरी चिकित्सक द्वारा मृत्यु पूर्व वास्तव में कोर्इ इलाज किया गया हो, ऐसा वास्तव में उभयपक्ष द्वारा पेष अभिलेख से दर्षित नहीं है, लेकिन प्रदर्ष सी-4 के पृश्ठ भाग में दिये पोस्टमार्टम रिपोर्ट में फेफड़ों की कौन सी सिथति नहीं पार्इ गर्इ, जो निमोनिया में हो जाती हो, यह प्रदर्ष आर-2 के इन्वेस्टीगेटर डाक्टर आर0के0 तिवारी के प्रतिवेदन से भी स्पश्ट नहीं। और उक्त तथ्य को स्पश्ट करने के लिए कथित इन्वेस्टीगेटर रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर, वेटेनरी डाक्टर आर0के0 तिवारी का कोर्इ तथ्यात्मक षपथ-पत्र उनकी उक्त राय के आधार पर पेष नहीं। और उक्त गाय की मृत्यु निमोनिया के कारण हुर्इ हो, यह बीमा पालिसी की षर्तों को देखते हुये अधिक महत्वपूर्ण नहीं है।
(9) जो कि-महत्वपूर्ण यह है कि-उक्त बीमा पालिसी के द्वारा, बीमित गाय की ही मृत्यु बीमा अवधि में ही हुर्इ है, यह स्थापित हुये बिना, परिवादी बीमा पालिसी के तहत क्लेम राषि बीमा कम्पनी से पाने का हकदार नहीं हो सकता। जो कि-बीमित पषु की सही पहचान स्थापित करने के लिए उक्त पषु बीमा की षर्तों में इयर टैग, जो बीमा कम्पनी द्वारा पषु के कान में लगाये गये, तो उक्त पहचान के रूप में इयर टैग मृत पषु के कान में लगा होना और उक्त लाक्ड इयर टैग बीमा क्लेम के साथ पेष किया जाना, क्लेम के भुगतान हेतु मुख्य आधार रहा है और इसीलिए संभव हो, तो मृत पषु का फोटोग्राफ भी चाहा गया था, जो प्रदर्ष सी-6 से स्पश्ट है। लेकिन परिवादी-पक्ष ने अपने परिवाद व परिवाद के साथ पेष लेख प्रमाण सूची में बीमित पषु के मृत षरीर का छायाचित्र (फोटो) पेष किया जाना उल्लेख करते हुये, प्रदर्ष सी-1 का जो फोटो पेष किया, वह मृत पषु का फोटो नहीं है, बलिक जीवित खड़े पषु के कान में टैग लगा था, तब का फोटो है, जिसे मृत पषु के कान में टैग लगा होने का फोटो कहते हुये, गलत रूप में पेष किया गया, जो उक्त फोटो को देखने से ही स्पश्ट है। और इसके अलावा यह महत्वपूर्ण है कि-स्वयं परिवादी-दयाराम सनोडिया का साक्ष्य में दिनांक-03.07.2014 का षपथ-कथन पेष हुआ, उसमें स्वयं परिवादी के षपथ-पत्र की कणिडका-5 में यह उल्लेख किया है कि-इयर टैग को पषु ने लकड़ी में फंसाकर जोड़ दिया था, उसमें आवेदक की कोर्इ गलती नहीं, टैग में बराबर नंबर डला हुआ था और परिवादी को इस बात की जानकारी नहीं थी की पुन: उसे लगवाया जाता है, तो पषु का टैग दो टुकड़े में तोड़कर जमा किये जाने से पालिसी का उल्लघंन होने के आधार पर, दावा निरस्त किये जाने बाबद यह स्पश्टीकरण साक्ष्य में परिवादी का रहा है।
(10) और तब, जब स्वयं साक्ष्य में पेष परिवादी के षपथ-पत्र में ही यह स्वीकार कर लिया गया कि-उक्त टैग पषु की मृत्यु होने के पूर्व से ही टूट चुका था, तो स्पश्ट है कि-पषु के कान में उसकी मृत्यु के समय कोर्इ इयर टैग नहीं लगा था। और परिवादी-पक्ष तथा पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक के द्वारा फिर भी मृत पषु के कान का टुकड़ा काटकर और साथ में टैग के दोनों अलग पल्ले रखकर बीमा कम्पनी को भेजे गये, जो अनावेदक- पक्ष की ओर से प्रदर्ष आर-6 के रूप में कान का टुकड़ा और टैग के दोनों अलग पल्ले पेष भी हुये हैं। और तब ऐसी सिथति में वास्तव में यह होना चाहिये था कि-प्रदर्ष सी-3 व प्रदर्ष आर-3 व आर-4 के वेटेनरी सर्टिफिकेट व वेल्यूएषन कम ट्रीटमेंट सर्टिफिकेट जारी करने वाले प्षु चिकित्सा अधिकारी डाक्टर जे0के0 जैन को प्रदर्ष आर-3 के वेटेनरी सर्टिफिकेट व आर-4 के वेल्यूएषनट्रीटमेंट सर्टिफिकेट में इयर टैग नंबर का उल्लेख पषु का विवरण देते समय करना ही नहीं चाहिये था और उन्हें यह लिखना चाहिये था कि- मृत पषु के कान में कोर्इ टैग नहीं पाया गया और परिवादी टूटे टैग के दोनों अलग पल्ले पेष करता, तो उन्हें अलग से पेष किये जाने की टीप लगार्इ जानी चाहिये थी, जो कि-प्रदर्ष सी-5 का पत्र जो मृत्यु क्लेम व दस्तावेज, पषु दावा के सेन्ट्रल म0प्र0 ग्रामीण बैंक षाखा, पीपरडाही ने अपने बैंक के सिवनी षाखा प्रबंधक को बीमा क्लेम को देने के लिए भेजा, उक्त प्रदर्ष सी-5 के पत्र में भी संलग्न दस्तावेजों में टैग नंबर के उपर ब्रेक (टूटा हुआ) उल्लेख किया है।
(11) ऐसे में जब स्वयं परिवादी के साक्ष्य के षपथ-पत्र में मृत्यु पूर्व से इयर टैग नंबर-37608 टूटकर उसके दोनों पल्ले अलग रहे होना स्वीकार किया गया है, तो इन्वेस्टीगेटर आर0के0 तिवारी की रिपोर्ट का यह भाग स्वयं स्थापित हो जाता है कि-वेटेनरी डा0 जे0बी0 जैन ने मृत गाय के कान में टैग न रहे होने के तथ्य को छिपाते हुये, बकायदा टैग नंबर का उल्लेख करते हुये, प्रदर्ष सी-3 व सी-4 के प्रमाण-पत्र परिवादी को क्लेम राषि दिलाने के लिए झूठे जारी किये।
(12) वास्तव में परिवाद में कोर्इ क्लेम निरस्ती के जो कारण अनावेदक द्वारा बताये गये, वे कारण सही रहे होने को कोर्इ चुनौती नहीं दी गर्इ है, बलिक ऐसे कारणों के आधार पर दावा निरस्ती को अनुचित बताया गया है। तो स्वयं परिवादी की ओर से पेष बीमा प्रस्ताव की प्रति प्रदर्ष सी-2 में ही नीचे इस जुमला की सील लगी हुर्इ है कि-''कान का बिल्ला नहीं-दावा नहीं (नो इयर टैग-नो क्लेम) जो कि-परिवादी द्वारा बीमा पालिसी की प्रति जानबूझकर पेष नहीं की गर्इ, अनावेदक के द्वारा, बीमा प्रमाण-पत्र की डुप्लीकेट प्रति प्रदर्ष सी-5 पेष की गर्इ है, जिसके पालिसी षेडयूल में ही यह स्पश्ट रूप से षर्त लेख है कि-दावा के समय टैग समर्पित किया जाना चाहिये, अन्यथा दावा नो-क्लेम माना जायेगा। और इयर टैग की क्षति होने की सिथति में यह बीमित का दायित्व है कि-वह कम्पनी को तुरंत सूचना दे और पषु को पुन: टैग करावें।
(13) तो सिथति स्पश्ट है कि-जिस पषु की मृत्यु बतार्इ जा रही है, उसके कान में मृत्यु के समय कोर्इ इयर टैग नहीं था और परिवादी टैग के दोनों अलग पल्ले अपने पास से पेष कर, पषु के कान के टुकड़े के साथ भेजकर बीमा क्लेम किया, तो बीमा षर्तों के आधार पर, परिवादी का दावा, बीमा कम्पनी द्वारा विचार योग्य नहीं रहा है और उक्त आधार पर दावा को विचार योग्य न पाते हुये, क्लेम निरस्त किया गया है, जो कि-बीमित पषु ही मृत पषु रहा है, ऐसा पहचान जानने कोर्इ प्रमाण परिवादी-पक्ष की ओर से पेष हुआ नहीं और उसके स्थान पर जब पषु के कान में जीवित अवस्था में टैग लगा हुआ था, तबका फोटो पेष कर, उसे मृत पषु का इयर टैग लगा फोटो होना असत्य रूप से कहते हुये, क्लेम पेष किया गया था और ऐसा ही दर्षाकर यह परिवाद पेष किया गया है। तो अनावेदक बीमा कम्पनी द्वारा, बीमा षर्तों के आधार पर परिवादी के दावा को कोर्इ दावा नहीं मानकर, दावा फार्इल बंद कर दिये जाने की सूचना का पत्र प्रदर्ष सी-7 समुचित आधारों पर जारी किया गया है और ऐसा किया जाना किसी भी तरह परिवादी के प्रति-की गर्इ सेवा में कमी नहीं है। तो क्लेम अस्वीकृति किसी भी तरह अनुचित होना और परिवादी के प्रति-सेवा में कमी होना नहीं पाया जाता है। तदानुसार विचारणीय प्रष्न क्रमांक-'अ को निश्कर्शित किया जाता है।
विचारणीय प्रष्न क्रमांक-(ब):-
(14) विचारणीय प्रष्न क्रमांक-'अ के निश्कर्शों के आधार पर, परिवादी, अनावेदक से बीमा क्लेम पाने का व हर्जाना पाने का अधिकारी नहीं। और परिवाद मृत पषु के कान में टैग न रहे होने के तथ्य को छिपाकर पेष किया गया है। तदानुसार विचारणीय प्रष्न क्रमांक-'ब को निश्कर्शित किया जाता है।
विचारणीय प्रष्न क्रमांक-(स):-
(15) विचारणीय प्रष्न क्रमांक-'अ और 'ब के निश्कर्शों के आधार पर मामले में निम्न आदेष पारित किया जाता है:-
(अ) परिवादी का पेष परिवाद स्वीकार योग्य न होने से
निरस्त किया जाता है।
(ब) परिवाद सही तथ्यात्मक सिथति मृत पषु के कान में
टैग न रहे होने के तथ्य को छिपाकर, महज अनावेदक
पक्ष को परेषान करने के लिए पेष किया गया, इसलिए
परिवादी स्वयं का कार्यवाही-व्यय वहन करेगा और अनावेदक क्रमांक-1 व 2 को संयुक्त रूप से कार्यवाही-व्यय के रूप में 2,000-रूपये (दो हजार रूपये) आदेष दिनांक से तीन माह की अवधि के अंदर अदा करेगा।
मैं सहमत हूँ। मेरे द्वारा लिखवाया गया।
(श्री वीरेन्द्र सिंह राजपूत) (रवि कुमार नायक)
सदस्य अध्यक्ष
जिला उपभोक्ता विवाद जिला उपभोक्ता विवाद
प्रतितोषण फोरम,सिवनी प्रतितोषण फोरम,सिवनी
(म0प्र0) (म0प्र0)
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