Uttar Pradesh

StateCommission

A/2009/1384

Post Office - Complainant(s)

Versus

Suneeta Devi - Opp.Party(s)

Dr U V Singh

27 Jul 2015

ORDER

STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP
C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010
 
First Appeal No. A/2009/1384
(Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission)
 
1. Post Office
a
...........Appellant(s)
Versus
1. Suneeta Devi
a
...........Respondent(s)
 
BEFORE: 
 HON'BLE MR. Alok Kumar Bose PRESIDING MEMBER
 HON'BLE MRS. Smt Balkumari MEMBER
 
For the Appellant:
For the Respondent:
ORDER

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।

सुरक्षित

अपील सं0-१३८४/२००९

 

(जिला फोरम, एटा द्वारा परिवाद सं0-१९३/२००६ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक   १७-०७-२००९ के विरूद्ध)

 

सुपरिण्‍टेण्‍डेण्‍ट आफ पोस्‍ट आफिसेज, पोस्‍टल डिवीजन, एटा।

                                      .....................        अपीलार्थी/विपक्षी।

बनाम्

श्रीमती सुनीता देवी पत्‍नी श्री दया शंकर निवासी गली नं0-७ए श्रंगार नगर, सिटी व जिला-एटा।                             ......................      प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी।                                                              

समक्ष:-

१-  मा0 श्री आलोक कुमार बोस, पीठासीन सदस्‍य।

२-  मा0 श्रीमती बाल कुमारी, सदस्‍य।

 

अपीलार्थी की ओर से उपस्थित :- डॉ0 उदयवीर सिंह विद्वान अधिवक्‍ता।

प्रत्‍यर्थी की ओर से उपस्थित   :- कोई नहीं।

दिनांक : २१-०८-२०१५

 

मा0 श्री आलोक कुमार बोस, पीठासीन सदस्‍य द्वारा उदघोषित

निर्णय

अपील दिनांक २७-०७-२०१५ को सुनवाई हेतु ली गयी। अपीलार्थी डाक विभाग ने प्रस्‍तुत अपील विद्वान अधीनस्‍थ फोरम एटा द्वारा परिवाद सं0-१९३/२००६ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक १७-०७-२००९ से क्षुब्‍ध होकर योजित की गयी है। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता डॉ0 उदयवीर सिंह उपस्थित आये परन्‍तु नोटिस के बाबजूद प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी न तो स्‍वयं और न ही उसके विद्वान अधिवक्‍ता उपस्थित आये। चूँकि यह अपील पिछले ०५ वर्ष से भी अधिक समय से निस्‍तारण हेतु लम्बित चली आ रही है अत: उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम १९८६ (अधिनियम संख्‍या ६८ सन् १९८६) की धारा-३० की उपधारा (२) के अन्‍तर्गत निर्मित उत्‍तर प्रदेश उपभोक्‍ता संरक्षण नियमावली १९८७ के नियम ८ के उप नियम (६) में दिये गये प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए अपीलार्थी डाक विभाग के विद्वान अधिवक्‍ता डॉ0 उदयवीर सिंह को एकल रूप से सुना गया एवं उनके तर्क के परिप्रेक्ष्‍य में पत्रावली पर उपलब्‍ध समस्‍त अभिलेख/साक्ष्‍य का गहनता से परिशीलन किया गया।

पत्रावली के परिशीलन से यह तथ्‍य प्रकाश में आता है कि परिवादिनी/प्रत्‍यर्थी

 

 

 

-२-

श्रीमती सुनीता देवी के पति श्री दया शंकर ने एक पंजीकृत पत्र सं0-एम.डी.जी. ०३६१३०५ आर०एल०ए० संख्‍या ९९८० के लिफाफे में स्‍टेट बैंक आफ सौराष्‍ट्र द्वारा निर्गत एक ड्राफ्ट सं0-०६८६७३ मु० ८,०००/- रू० रखकर पोस्‍ट आफिस खमशालिया जिला जामनगर, गुजरात से दिनांक २२-०५-२००६ को परिवादिनी/प्रत्‍यर्थी के पते पर एटा भेजा था परन्‍तु यह पंजीकृत पत्र गन्‍तव्‍य पर नहीं पहुँचा तो परिवादिनी के पति ने इसकी शिकायत अधीक्षक डाकघर एटा से की एवं इस शिकायत पर जांच कार्यवाही करने के उपरान्‍त पोस्‍ट मास्‍टर एटा ने उपरोक्‍त पंजीकृत डाक वितरण हेतु लम्बित रहने के सम्‍बन्‍ध में परिवादिनी को सूचित किया। अपीलार्थी डाक विभाग के इसी कृत्‍य को सेवा में कमी मानते हुए प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी श्रीमती सुनीता देवी ने परिवाद संख्‍या-१९३/२००६ अधीनस्‍थ फोरम में योजित किया।

विद्वान फोरम के समक्ष अपीलार्थी/विपक्षी डाक विभाग द्वारा अपने बचाव में यह कहा गया कि विधि के प्राविधान के अनुसार परिवादिनी ने जिन कथनों के आधार पर वर्तमान परिवाद योजित किया है, उन कथनों के आधार पर परिवादिनी को परिवाद योजित करने का कोई विधिक अधिकार प्राप्‍त नहीं है। उनका यह भी कहना है कि डाकघर गाइड भाग-१ के क्‍लॉज १७० के अनुसार कथित पंजीकृत पत्र संख्‍या आर.एल. नम्‍बर : ९९८० दिनांक २२-०५-२००६ के प्रेषक को ही रजिस्‍टर्ड पत्र गुम हो जाने के सम्‍बन्‍ध में दावा करने का अधिकार प्राप्‍त है और पत्र प्रेषक को ही पंजीकृत पत्र के जारीकर्ता कार्यालय के अधीक्षक के समक्ष शिकायत/दावा करने का अधिकार है। प्रेषक श्री दया शंकर द्वारा कथित पंजीकृत पत्र के द्वारा क्‍या भेजा गया है ? इस तथ्‍य की जानकारी पंजीकृ पत्र बुक करने वाले कार्यालय को नहीं होती है, बल्कि पंजीकृत पत्र के प्रेषक को ही अन्‍तर्वस्‍तु की जानकारी होती है। परिवादिनी को वर्तमान परिवाद योजित करने का कोई विधिक क्षेत्राधिकार प्राप्‍त नहीं है।  

दोनों पक्षों को सुनने के उपरान्‍त अधीनस्‍थ फोरम द्वारा निर्णय एवं आदेश दिनांक १७-०७-२००९ के अन्‍तर्गत परिवाद स्‍वीकार करते हुए क्षतिपूर्ति स्‍वरूप ५,०००/- रू० २,०००/- रू० मानसिक कष्‍ट एवं १,०००/- रू० वाद व्‍यय स्‍वरूप एक माह के अन्‍दर

 

 

-३-

परिवादिनी को अदा करने हेतु अपीलार्थी/विपक्षी डाक विभाग को आदेश दिया गया। अधीनस्‍थ फोरम के इसी आदेश से क्षुब्‍ध होकर अपीलार्थी डाक विभाग द्वारा प्रस्‍तुत अपील योजित की गयी है।

अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता का कहना है कि अधीनस्‍थ फोरम द्वारा पारित प्रश्‍नगत निर्णय एवं आदेश तथ्‍यों एवं विधिक सिद्धान्‍तों के विपरीत होने के कारण अपास्‍त होने योग्‍य है एवं यदि इसे अपास्‍त नहीं किया जाता है तो अपीलार्थी डाक विभाग को अपूर्णनीय आर्थिक क्षति होगी। अपीलार्थी का कहना है कि प्रश्‍नगत पंजीकृत डाक दिये गये पते पर वितरण हेतु लम्बित रहने के सम्‍बन्‍ध में परिवादिनी को सूचित कर दिया गया था। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता ने अपने कथन के समर्थन में माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा यूनियन आफ इण्डिया व अन्‍य बनाम एम0एल0 बोरा २०११(२) सीपीसी १७९ एवं पोस्‍ट मास्‍टर इम्‍फाल बनाम जामिनी देवी सगोलबन्‍द (२०००) एनसीजे १४२ तथा सुपरिण्‍टेण्‍डेण्‍ट आफ पोस्‍ट आफिसेज व अन्‍य बनाम उपभोक्‍ता सुरक्षा परिषद III(1996) CPJ 105 (NC) में दिये गये विधिक सिद्धान्‍त की ओर पीठ का ध्‍यान आकृष्‍ट कराया जिनमें यह विधि व्‍यवस्‍था दी गयी है कि इस प्रकार के परिवाद भारतीय डाक अधिनियम १८९८ की धारा-६ की बाधित हैं। प्रस्‍तुत मामले में विभाग के किसी अधिकारी या कर्मचारी पर कोई व्‍यक्तिगत द्वेष अथवा भ्रष्‍टाचार का आरोप नहीं है। अत: इस मामले में धारा-६ भारतीय डाक अधिनियम १८९८ में दिये गये प्राविधान लागू होते हैं। उल्‍लेखनीय है कि भारतीय डाक अधिनियम १८९८ (अधिनियम सं० ६ सन् १८९८) की धारा-६ में निम्‍नवत् प्राविधान है कि -

      Section 6 of the Indian Post Office Act. 1898 reads as under :

“6. Exemption from liability for loss, misdelivery, delay or damage - The Government shall not incur any liability by reason of the loss, misdelivery or delay of, or damage to, any postal article in course of transmission by post, except insofar as such liability may in express terms be undertaken by the Central Government as hereinafter provided and no officer of the Post Office shall incur any liability by reason of any such loss, misdelivery, delay or damage, unless he has caused the same fraudulently or by his willful act or default.”

 

 

-४-

इस प्रकरण में यह तथ्‍य निर्विवाद है कि परिवादिनी/प्रत्‍यर्थी श्रीमती सुनीता देवी के नाम उसके पति श्री दया शंकर ने एक पंजीकृत पत्र सं0-एम.डी.जी. ०३६१३०५ आर०एल०ए० संख्‍या ९९८० पोस्‍ट आफिस खमशालिया जिला जामनगर, गुजरात से दिनांक २२-०५-२००६ को परिवादिनी/प्रत्‍यर्थी के पते पर एटा भेजा था। यह रजिस्‍टर्ड पत्र परिवादिनी को न मिलने के सम्‍बन्‍ध में प्रेषक दया शंकर की ओर से कोई भी शिकायत अथवा दावा नहीं किया गया है। प्रेषक दया शंकर ने अपनी पत्‍नी को उनकी ओर से मुकदमा दायर करने के लिए अधिकृत किया है। इस सम्‍बन्‍ध में श्री दया शंकर द्वारा दिये गये अधिकार पत्र की प्रति पत्रावली में उपलब्‍ध है। अपीलार्थी का कहना है कि उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम के अन्‍तर्गत इस प्रकार के अधिकार पत्र के आधार पर उपभोक्‍ता परिवाद को संस्थित नहीं किया जा सकता है। परिवादिनी को श्री दया शंकर की ओर से परिवाद में पैरवी करने का अधिकार तो था परन्‍तु स्‍वतन्‍त्र रूप से परिवाद संस्थित करने का कोई अधिकार नहीं रहा। अत: पक्षकारान् के बीच उपभोक्‍ता–सेवादाता का कोई सम्‍बन्‍ध वैधानिक रूप से स्‍थापित नहीं हुआ। डाकघर गाइड भाग-१ के क्‍लॉज १७० के अनुसार कथित पंजीकृत डाक गुम हो जाने के सम्‍बन्‍ध में प्रेषक श्री दया शंकर को ही दावा दायर करने का अधिकार प्राप्‍त है। यह अधिकार अन्‍तरित करने का कोई प्राविधान नहीं है।  इसी आधार पर परिवाद पोषणीय न होने के कारण निरस्‍त होने योग्‍य है। इसके अतिरिक्‍त श्री दया शंकर ने अपने पंजीकृत डाक के लिफाफे के अन्‍दर क्‍या भेजा था इसका कोई लेखा-जोखा डाक विभाग के पास उपलब्‍ध नहीं रहता है। किसी भी पंजीकृत डाक के लिफाफे में कोई धनराशि अथवा किसी भी प्रकार का ड्राफ्ट आदि भेजा जाना वर्जित है, जैसा कि भारतीय डाक अधिनियम १८९८ (अधिनियम सं० ६ सन् १८९८) की धारा-१७ में स्‍पष्‍ट प्राविधान दिया गया है। इसके अतिरिक्‍त यह तथ्‍य भी निर्विवाद है कि कथित पंजीकृत डाक के लिफाफे में भेजे गये बैंक ड्राफ्ट को भुनाया नहीं गया है। इस प्रकार प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी अथवा प्रेषक श्री दया शंकर को कोई धनीय क्षति नहीं हुई है।

उपरोक्‍त प्राविधान तथा मा0 राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा टीकाराम बनाम इण्डियन पोस्‍टल डिपार्टमेण्‍ट IV (2007) CPJ 123 (NC) के अतिरिक्‍त माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा यूनियन आफ इण्डिया व अन्‍य बनाम एम0एल0 बोरा २०११(२) सीपीसी १७९ एवं

 

 

-५-

(२०००) एनसीजे १४२ पोस्‍ट मास्‍टर इम्‍फाल बनाम जामिनी देवी सगोलबन्‍द तथा सुपरिण्‍टेण्‍डेण्‍ट आफ पोस्‍ट आफिसेज व अन्‍य बनाम उपभोक्‍ता सुरक्षा परिषद III(1996) CPJ 105 (NC) में दिये गये विधिक सिद्धान्‍त को दृष्टिगत रखते हुए हमारे विचार से अधीनस्‍थ फोरम द्वारा पारित प्रश्‍नगत निर्णय एवं आदेश विधि अनुरूप नहीं है। विद्वान फोरम द्वारा तथ्‍यों एवं विधि के विरूद्ध आदेश पारित किया गया है जो किसी भी दृष्टिकोण से पोषणीय नहीं है। वर्णित परिस्थिति में अधीनस्‍थ फोरम द्वारा पारित प्रश्‍नगत निर्णय एवं आदेश तथ्‍य एवं विधि के विपरीत होने के कारण अपास्‍त होने तथा  

अपील स्‍वीकार होने योग्‍य है। 

                           आदेश

      प्रस्‍तुत अपील स्‍वीकार की जाती है। जिला फोरम, एटा द्वारा परिवाद सं0-१९३/२००६ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक १७-०७-२००९ अपास्‍त किया जाता है। पक्षकार अपीलीय व्‍यय-भार अपना-अपना स्‍वयं वहन करेंगे। उभय पक्ष को इस निर्णय की प्रमाणित प्रतिलिपि नियमानुसार उपलब्‍ध करायी जाय।  

 

                                               (आलोक कुमार बोस)

                                                 पीठासीन सदस्‍य

 

 

                                                  (बाल कुमारी)

                                                     सदस्‍य

 

प्रमोद कुमार

वैय0सहा0ग्रेड-१,

कोर्ट-४.

 

 

 

 

 
 
[HON'BLE MR. Alok Kumar Bose]
PRESIDING MEMBER
 
[HON'BLE MRS. Smt Balkumari]
MEMBER

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