Uttar Pradesh

StateCommission

A/2004/2445

U P P C L - Complainant(s)

Versus

Sri Brijesh - Opp.Party(s)

D Mehrotra

13 Feb 2009

ORDER

STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP
C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010
 
First Appeal No. A/2004/2445
(Arisen out of Order Dated in Case No. of District )
 
1. U P P C L
a
 
BEFORE: 
 HON'ABLE MR. Ashok Kumar Chaudhary PRESIDING MEMBER
 HON'ABLE MR. Sanjay Kumar MEMBER
 
For the Appellant:
For the Respondent:
ORDER

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0 प्र0 लखनऊ)

                                   

सुरक्षित                                                          

 

(जिला मंच बांदा द्वारा परिवाद सं0 260/2000 में पारित निर्णय/आदेश दिनांकित 22/06/2004 के विरूद्ध)

अपील संख्‍या 2445/2004

                                                    

इक्‍जीक्‍यूटिव इंजीनियर, उत्‍तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड, इलेक्‍ट्रीसिटी डिस्‍ट्रीब्‍यूशन डिवीजन, बांदा।

                                                      …अपीलार्थी/विपक्षी

 

बनाम

 

श्री बृजेश पुत्र श्री राम लाल, निवासी- ग्राम दुरेड़ी, परगना/जिला बांदा।

.........प्रत्‍यर्थी/परिवादी

समक्ष:

       1. मा0 श्री अशोक कुमार चौधरी, पीठा0 सदस्‍य।

  2. मा0 श्री संजय कुमार, सदस्‍य ।

 

अपीलार्थी की ओर से उपस्थित      : श्री दीपक मेहरोत्रा।

प्रत्‍यर्थी की ओर से उपस्थित        : कोई नहीं।

 

दिनांक     16/12/2014

 

मा0 श्री संजय कुमार, सदस्‍य द्वारा उदघोषित ।

 

निर्णय

     अपीलार्थी ने प्रस्‍तुत अपील परिवाद सं0 260/2000 बृजेश बनाम उ0 प्र0 पावर कारपोरेशन लि0 जिला पीठ बांदा के निर्णय/आदेश दिनांक 22/06/2004 के विरूद्ध प्रस्‍तुत की है।

     प्रश्‍नगत परिवाद में जिला फोरम ने परिवाद इस अंशत: स्‍वीकार करते हुए यह आदेशित किया कि 1992 से 1998 तक दिखाये गये फर्जी उपभोग की मांग नोटिसों को निरस्‍त किया जाता है। विपक्षी उक्‍त अवधि की कोई राशि परिवादीगणों से वसूल करने का अधिकारी नहीं होगा। इसके अलावा विपक्षी प्रत्‍येक परिवादी को मु0 500/ रूपये वाद व्‍यय व 500/ रूपये क्षतिपूर्ति भी दो माह के अंदर देगा अथवा बाढ़ के पूर्व के बिलों में समायोजित करेगा। इस निर्णय की प्रति अग्रणी के परिवाद के अलावा अन्‍य परिवादों में भी रखी जावे।

     संक्षेप में परिवाद के तथ्‍य इस प्रकार हैं कि परिवाद सं0 256/2000 विशला पुत्र श्री विश्‍व नाथ, परिवाद सं0 257/2000 राम किशुन पुत्र कल्‍लू, परिवाद सं0 258/2000 गेंदा पुत्र

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दाता, परिवाद सं0 259/2000 भुरा पुत्र झरूवा तथा परिवाद सं0 260/2000 बृजेश पुत्र रामलाल ने दिनांक 31/10/2000 को विपक्षी के विरूद्ध इस प्रतिकार हेतु संस्थित किये है कि परिवादीगणों का परिवाद स्‍वीकार किया जावे तथा विपक्षी को बिल संशोधित करने का आदेश दिया जावे एवं परिवादीगणों को 5500/ रूपये वाद व्‍यय दिलाया जावे व अन्‍य प्रतिकर जिसको परिवादीगण पाने के अधिकारी हो दिलाया जावे। परिवाद पत्रों के अनुसार परिवादीगण विपक्षी के उपभोक्‍ता हैं। परिवादीगण ने 1990 में घरेलू विधुत कनेक्‍शन लिया था जिसकी संयोजन सं0 1415 कोड नं0 273 था। सितम्‍बर, 1992 में बांदा शहर में भीषण बाढ़ आई तथा ग्राम दुरेड़ी बाढ़ की चपेट में था। बाढ़ में सैकड़ों घर गिर गये। बिजली के खम्‍भे व तार व ट्रांसफार्मर पूर्ण रूप से नष्‍ट हो गया और प्रशासन के आदेश से बिजली काट दी गई। परिवादीगणों के परिवाद पत्र के दफा- 5 के अनुसार उपरोक्‍त समस्‍त परिवादियों द्वारा बिजली का कनेक्‍शन काटने हेतु प्रार्थना पत्र दिया गया व उनके साथ अन्‍य लोगों ने भी बिजली काटने का प्रार्थना पत्र दिया। बाढ़ के कारण ट्रांसफार्मर नष्‍ट हो गया तथा प्रार्थना पत्र देने के कारण 1992-98 तक विधुत आपूर्ति नहीं हो सकी। 1999 में फतेहपुर के सांसद द्वारा 3-4 लोगों के प्रयास का अनुमोदन करने पर विधुत दुरूस्‍त की गई परन्‍तु परिवादीगणों ने कनेक्‍शन नहीं लिया। परिवाद पत्र के अनुसार परिवादीगणों को पूर्ण विश्‍वास था कि सन् 1998 तक विधुत आपूर्ति न होने के कारण उनसे तत्‍कालीन विधुत बिल न लिया जायेगा । परिवाद पत्रों के अनुसार अचानक 20 दिन पहले नोटिस प्राप्‍त हुआ जिससे विशला, राम किशन, गेंदा लाल, भूरा से 13758/ रूपये तथा बृजेश से 15578/ रूपये का नोटिस प्राप्‍त हुआ जो अनुचित है। 13 सितम्‍बर, 1992 से आज तक उनके यहां विधुत प्रदाय नहीं हुआ। इसलिए मांगी गई धनराशि अनुचित है। परिवादीगण 1992 से पूर्व का बकाया देने को तैयार हैं।

     विपक्षी ने अपना लिखित कथन प्रस्‍तुत किया। समस्‍त परिवाद पत्र के लिखित कथन समान है। बाढ़ आना स्‍वीकार किया गया है लेकिन संयोजन पूर्णतया नष्‍ट होना स्‍वीकार नहीं है। विभाग को नोटिस मिलना स्‍वीकार किया गया है। विपक्षी ने यह स्‍वीकार किया है कि बांदा शहर में सन 1992 में बाढ़ आयी थी परन्‍तु बाढ़ से बिजली के तार ट्रांसफार्मर व परिवादीगणों के संयोजन पूर्णतया नष्‍ट नहीं हुआ था। बाढ़ आने पर कहीं-कहीं अस्‍थायी तौर पर आवश्‍यकतानुसार बहुत कम समय के लिए विधुत आपूर्ति बंद की गई थी। विधुत आपूर्ति में या ट्रांसफार्मर में कोई मामूली खराबी आयी उसको दुरूस्‍त करके विधुत आपूर्ति बहाल कर दी

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गई थी। विभागीय नियमों के अनुसार केवल संयोजन काटने के लिए प्रार्थना पत्र देने की प्रक्रिया में नहीं आता। स्‍थायी संयोजन विच्‍छेदन हेतु शुल्‍क जमा होने पर संयोजन काटे जाने का प्राविधान है। इस बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में भी बिजली मरम्‍मत करके विभाग के तत्‍काल आपूर्ति‍ बहाल कर दी थी। परिवादीगणों का यह कथन गलत है कि परिवादीगणों से 1992-98 तक पैसा नहीं लिया जायेगा। विभागीय प्रक्रिया के अनुसार विभाग से बिल भेजा जाता है और बिल न अदा होने पर धारा 3 की नोटिस दी जाती है और वसूली की प्रक्रिया अपनायी जाती है। परिवादीगणों का यह कथन गलत है कि परिवादीगणें से अनुचित धनराशि की मांग की जा रही है, क्‍योंकि परिवादीगणों ने विधुत का उपभोग किया है, इसलिए विधुत देय का भुगतान करना उनकी जिम्‍मेदारी है। विभाग द्वारा कोई सेवा में त्रुटि नहीं की गई है। परिवादीगण संयोजन की तिथि से लगातार विधुत उपभोग कर रहे है उनका परिवाद कालबाधित है और परिवादीगण को वाद दायर करने हेतु कोई हेतुक नहीं है वे किसी अनुतोष को पाने के अधिकारी नहीं है।

     अपीलकर्ता की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री दीपक मेहरोत्रा उपस्थित है। प्रत्‍यर्थी की ओर से कोई उपस्थित नहीं है। अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्‍ता श्री दीपक मेहरोत्रा के तर्कों को सुना गया।

     अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता ने यह तर्क दिया कि परिवादीगण का कहना गलत है कि सन् 1992 में बाढ़ से प्रभावित होने पर विधुत आपूर्ति 1998 तक बंद हो गई। यह स्‍वीकार करने योग्‍य नहीं है, क्‍योंकि बांदा शहर में शहर 06 वर्षों तक बिना विधुत सप्‍लाई के कैसे रह सकता है। जिला पीठ के समक्ष ग्राम प्रधान द्वारा विधुत अधिशासी अभियन्‍ता बांदा को पत्र लिखा गया है

      प्रत्‍यर्थी की ओर से कोई प्रस्‍तुत नहीं हुआ।

      आधार अपील एवं संपूर्ण पत्रावली का अवलोकन किया गया जिससे यह प्रतीत होता है कि सितम्‍बर, 1992 में बांदा शहर में बाढ़ आयी थी, जिससे बहुत से घर नष्‍ट हो गये तथा बिजली के खम्‍भे गिर गये। विधुत आपूर्ति बंद हो गई। विपक्षी द्वारा 1992 से 1998 तक के विधुत बकाया बिलों का भुगतान करने के लिए नोटिस भेजा गया। जिला पीठ के समक्ष ग्राम प्रधान बिहारी लाल प्रजापति द्वारा दिनांक 22/04/96 को एक पत्र की छायाप्रति इस आशय का दाखिल किया गया कि ग्राम प्रधान ने अधिशासी अभियन्‍ता बांदा को यह सूचित किया कि

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गांव में विधुत का उपभोग किन-किन व्‍यक्तियों द्वारा किया गया था। ग्राम प्रधान द्वारा लिखा गया पत्र की छायाप्रति आयोग के समक्ष प्रस्‍तुत है, जिसका अवलोकन करने से यह पाया जाता है कि ग्राम प्रधान द्वारा दिया गया कागजात फर्जी है, क्‍योंकि कोई भी व्‍यक्ति दिनांक 22/04/96 को यह कैसे कह सकता है कि 1992 से 1998 तक विधुत का प्रयोग निम्‍न लिखित व्‍यक्तियों द्वारा किया गया है। इस प्रकार ग्राम प्रधान द्वारा दिया गया प्रार्थना पत्र के साथ ग्राम प्रधान द्वारा ऐसा कोई शपथ पत्र नहीं प्रस्‍तुत किया गया है जो विश्‍वास किये जाने योग्‍य हो। प्रस्‍तुत सूची पत्र जिसमें व्‍यक्तियों के नाम अंकित हैं उस पर ग्राम प्रधान का कोई हस्‍ताक्षर भी नहीं है, न उस पर कोई तिथि अंकित है, जिसके कारण यह प्रस्‍तुत की गई सूची विश्‍वसनीय नहीं है। यह अपील 05 माह के विलंब से भी प्रस्‍तुत है। अपील के साथ विलंब क्षमा प्रार्थना पत्र भी प्रस्‍तुत नहीं किया गया है जो विलंब क्षमा किये जाने योग्‍य नहीं है।

     आर.बी. रामलिंगन बनाम आर.बी. भवनेश्‍वरी 2009 (2) Scale 108 के मामले में तथा अंशुल अग्रवाल बनाम न्‍यू ओखला इण्‍डस्ट्रियल डवपमेंट अथॉरिटी,v (2011) सी.पी.जे. 63 (एस.सी.) में माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा यह आधारित किया गया है कि न्‍यायालय को प्रत्‍येक मामले में यह देखना है और परीक्षण करना है कि क्‍या अपील में हुई देरी को अपीलार्थी ने जिस प्रकार से प्रस्‍तुत किया है क्‍या उसका कोई औचित्‍य है, क्‍योंकि देरी को क्षमा किये जाने के संबंध में यही मूल परीक्षण जिसे मार्गदर्शक के रूप में अपनाया जाना चाहिए कि क्‍या अपीलार्थी ने उचित विद्वता एवं सदभावना के साथ कार्य किया है और क्‍या अपील में हुई देरी स्‍वाभाविक देरी है। उपभोक्‍ता संरक्षण मामलों में अपील योजित किये जाने में हुई देरी को क्षमा किये जाने के लिए इसे देखा जाना अति आवश्‍यक है, क्‍योंकि उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम 1986 में अपील प्रस्‍तुत किये जाने के जो प्राविधान दिये गये हैं उन प्राविधानों के पीछे मामलों को तेजी से निर्णीत किये जाने का उद्देश्‍य रहा है और यदि अत्‍यन्‍त देरी से प्रस्‍तुत की गई अपील को बिना स्‍वाभाविक देरी के प्रश्‍न पर विचार किये हुए अंगीकरण कर लिया जाता है तो इसे उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम के प्राविधान के अनुसार उपभोक्‍ता के अधिकारों का संरक्षण संबंधी उद्देश्‍य ही विफल हो जायेगा।

     प्रस्‍तुत प्रकरण में विलंब क्षमा प्रार्थना पत्र प्रस्‍तुत नहीं किया गया है। अपील काल बाधित है, जो स्‍वीकार करने योग्‍य नहीं है।

 

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आदेश

          अपील अस्‍वीकार की जाती है। विद्वान जिला मंच बांदा द्वारा परिवाद सं0 260/2000 में पारित निर्णय/आदेश दिनांकित 22/06/2004 की पुष्टि की जाती है।

                   उभय पक्ष अपना अपीलीय व्‍यय स्‍वयं वहन करेंगे।

         उभय पक्ष को इस निर्णय की प्रमाणित प्रति नियमानुसार उपलब्‍ध कराई जाय।

 

 

                                 

                                                                    (अशोक कुमार चौधरी)

                                                                     पीठा0 सदस्‍य

 

                                                                     

                                                                                 

                                                                                (संजय कुमार)

सुभाष चन्‍द्र आशु0 ग्रेड 2                                                                 सदस्‍य

कोर्ट नं0 3

 

 

 

 

 

 

 

 
 
[HON'ABLE MR. Ashok Kumar Chaudhary]
PRESIDING MEMBER
 
[HON'ABLE MR. Sanjay Kumar]
MEMBER

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