राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।
(सुरक्षित)
अपील संख्या:-2563/2016
(जिला फोरम, औरैया द्धारा परिवाद सं0-215/2014 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 08.9.2015 के विरूद्ध)
1- Dakshinanchal Vidyut Vitran Nigam Ltd., through Adhishashi Abhiyanta, Dakshinanchal Vidyut Vitran Nigam Ltd., Vitran Khand, Auraiyya, District Auraiyya.
2- Adhishashi Abhiyanta, Dakshinanchal Vidyut Vitran Nigam Ltd., Vidyut Vitran Khand, Auraiyya, District Auraiyya.
........... Appellants/ Opp. Parties
Versus
1- Smt. Vinod Bala, W/o Sri Ram Prakash Singh,
2- Ram Prakash Singh, S/o Sri Manni Singh, Both R/o Mohalla Lohia Nagar, Kasba Dibiyapur, Pargana & District- Auraiyya.
…….. Respondents/ Complainants
3- Nideshak, Vidyut Suraksha, Uttar Pradesh Shashan, Vidyut Khand-2, Gomti Nagar, Lucknow.
4- Up- Nideshak, Vidyut Suraksha, Uttar Pradesh Shashan, Kanpur Kshetra, Kanpur.
…….. Respondents/ Opp. Parties
समक्ष :-
मा0 न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष
अपीलार्थी के अधिवक्ता : श्री दीपक मेहरोत्रा
प्रत्यर्थी के अधिवक्ता : श्री रामगोपाल
दिनांक :-29-4-2019
मा0 न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष द्वारा उदघोषित
निर्णय
परिवाद संख्या-215/2014 श्रीमती विनोद बाला बनाम दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड आदि में जिला फोरम, औरैया द्वारा पारित निर्णय और आदेश दिनांक 08.9.2015 के
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विरूद्ध यह अपील धारा-15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अन्तर्गत राज्य आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई है।
आक्षेपित निर्णय के द्वारा जिला फोरम ने परिवाद स्वीकार करते हुए निम्न आदेश पारित किया है:-
“परिवाद विपक्षी संख्या एक व दो के विरूद्ध 5,07,000.00 रू0 की वसूली हेतु स्वीकार किया जाता है। इस धनराशि पर वादयोजन की तिथि से वास्तविक भुगतान की तिथि तक 7 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज भी देना होगा। विपक्षी संख्या एक व दो को आदेशित किया जाता है कि उपरोक्तानुसार धनराशि निर्णय के एक माद में अदा करें।”
जिला फोरम के निर्णय से क्षुब्ध होकर परिवाद के विपक्षीगण दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड और अधिशाषी अभियंता, दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड ने यह अपील प्रस्तुत की है।
अपील की सुनवाई के समय अपीलार्थीगण की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री दीपक मेहरोत्रा और प्रत्यर्थी/परिवादीगण की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री रामगोपाल उपस्थित आये हैं।
मैंने उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्तागण के तर्क को सुना है और आक्षेपित निर्णय एवं आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया है।
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अपील के निर्णय हेतु संक्षिप्त सुसंगत तथ्य इस प्रकार है कि प्रत्यर्थी/परिवादीगण ने परिवाद जिला फोरम के समक्ष अपीलार्थी/विपक्षीगण व दो अन्य के विरूद्ध इस कथन के साथ प्रस्तुत किया है कि अपीलार्थी/विपक्षीगण के हाई टेन्शन विद्युत लाइन के तार अत्याधिक नीचे थे, जिसके कारण दिनांक 03.7.2013 को करीब 3.00 बजे दिन में जब प्रत्यर्थी/परिवादीगण का पुत्र अनुराग सिंह मोटर साइकिल पर पीछे बैठकर उधर से गुजर रहे थे, तो उपरोक्त तारों से टच होने के कारण उसे करेंट लग गया। मोटर साइकिल चालक सर्वेश कुमार सिंह और एक अन्य व्यक्ति वीरेन्द्र सिंह दोनों मिलकर उसे सरकारी अस्पताल दिबियापुर ले गये, जहॉ पर उसे मृत घोषित कर दिया गया।
परिवाद पत्र के अनुसार अपीलार्थी/विपक्षीगण की हाई टेन्सन विद्युत लाइन के तार अत्याधिक निचाई पर लटके होने के कारण स्पर्शाघात से प्रत्यर्थी/परिवादीगण के पुत्र की मृत्यु हुई है और घटना की सूचना दिनांक 09.7.2013 को थाना दिबियापुर में दर्ज करायी गई है। परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादीगण का कथन है कि प्रत्यर्थी/परिवादीगण के पुत्र का पंचायतनामा तैयार किया गया है और पोस्ट मार्टम कराया गया है। उसके बाद उसका अंतिम संस्कार किया गया है।
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परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादीगण कथन है कि उनका पुत्र बी0ए0 उत्तीर्ण था और ठेकेदारी का व्यापार करता था। उसकी मृत्यु से परिवार का जीवन अंधकार मय हो गया है, वह ही प्रत्यर्थी/परिवादी के बुढापे का सहारा था। अत: अपीलार्थी/विपक्षीगण की सेवा में कमी के आधार पर प्रत्यर्थी/परिवादी ने परिवाद जिला फोरम के समक्ष प्रस्तुत कर क्षतिपूर्ति और वाद व्यय दिलाये जाने की मॉग की है।
जिला फोरम के समक्ष अपीलार्थी/विपक्षीगण की ओर से लिखित कथन प्रस्तुत किया गया है और कहा गया है कि वैदिक महाविद्यालय दिबियापुर के सामने नव नर्मित कालोनी में भवन के निर्माण का कार्य चल रहा था और प्रत्यर्थी/परिवादी का पुत्र भवन निर्माण के लिए लोहे की सरिया 3.5 मीटर मोटर साइकिल से ला रहा था, तभी दिन में 3.00 बजे 11 के0बी0 की लाइन को जब वह क्रास करता हुआ निकला, तभी यह कथित दुर्घटना घटित हुई है। लिखित कथन में अपीलार्थी/विपक्षीगण की ओर से कहा गया है कि वैदिक महाविद्यालय के सामने नई कालोनी में जाने के लिए कच्ची सड़क बनी है तथा 11 के0वी0 से सैनिक नगर फीडर कच्ची सड़क को क्रास करता हुआ खिंचा हुआ है। यह फीडर काफी समय पहले बनाया गया था। कथित दुर्घटना के समय कालोनी वाली जगह पर अत्याधिक पानी भरा था। जिसके कारण लाइन पर
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अनुरक्षण करने में अत्याधिक कठिनाइयॉ होती थी। दिनांक 03.7.2013 को कथित दुर्घटना के समय 11 के0वी0 सैनिक नगर फीडर की जमीन से ऊंचाई लगभग 04 मीटर थी और प्रत्यर्थी/परिवादीगण का पुत्र अनुराग सिंह सरिया को मोटर साइकिल पर लेकर जा रहा था, जिससे सरिया तथा मोटर साइकिल में 11 के0वी0 लाइन से करेंट उतर आया और अनुराग सिंह की मृत्यु हुई है।
जिला फोरम के आक्षेपित निर्णय से स्पष्ट है कि जिला फोरम के समक्ष परिवाद के विपक्षीगण सं0-3 व 4 जो अपील में प्रत्यर्थीगण सं0-3 व 4 हैं, की ओर से लिखित कथन प्रस्तत नहीं किया गया है।
जिला फोरम ने उभय पक्ष के अभिकथन और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के उपरांत यह माना है कि प्रत्यर्थी/परिवादी के पुत्र की मृत्यु की दुर्घटना अपीलार्थी/विपक्षीगण की लापरवाही के कारण घटित हुई है। अत: जिला फोरम ने परिवाद स्वीकार करते हुए आदेश पारित किया है, जो ऊपर अंकित किया गया है।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि जिला फोरम द्वारा पारित आदेश विधि विरूद्ध है। प्रत्यर्थी/परिवादीगण द्वारा प्रस्तुत परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत ग्राह्य नहीं है, क्योंकि जिस विद्युत लाइन से दुर्घटना होना बताया गया
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है। उस विद्युत लाइन से प्रत्यर्थी/परिवादीगण या उनके पुत्र को विद्युत आपूर्ति नहीं की जा रही थी और उस लाइन के परिवादीगण या उनका पुत्र उपभोक्ता नहीं रहे है। अपीलार्थी/विपक्षीगण के विद्वान अधिवक्ता का यह भी तर्क है कि लाइन के रख-रखाव व मेनटेनेंस में अपीलार्थी/विपक्षीगण की ओर से कोई कमी नहीं की गई है। दुर्घटना प्रत्यर्थी/परिवादी के पुत्र की लापरवाही से घटित हुई है। वह मोटर साइकिल पर बैठकर 3.5 मीटर लम्बी सरिया लेकर जा रहा था और सरिया के विद्युत तार से स्पर्श करने के कारण यह दुर्घटना घटित हुई है।
प्रत्यर्थी/परिवादीगण के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि जिला फोरम द्वारा पारित निर्णय और आदेश साक्ष्य और विधि के अनुकूल है। परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत ग्राह्य है। प्रश्नगत दुर्घटना अपीलार्थी विपक्षीगण की लापरवाही और विद्युत लाइन को ठीक ढंग से व्यवस्थित न किए जाने के कारण हुई है। जिला फोरम के निर्णय में हस्तक्षेप हेतु उचित आधार नहीं है।
प्रत्यर्थी/परिवादीगण के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि अपीलार्थी/विपक्षीगण ने परिवाद की ग्राह्यता के सम्बन्ध में जिला फोरम के समक्ष आपत्ति नहीं की है।
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अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता ने अपने तर्क के समर्थन में मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा Andhra Pradesh Eastern Power Distribution Co. Ltd. (APEPDCL) Vs. Janni Suramma & Ors. के वाद में दिया गया निर्णय जो I (2016) CPJ 558 (NC) में प्रकाशित है, संदर्भित किया है।
प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता ने अपने तर्क के समर्थन में निम्नलिखित नजीरें प्रस्तुत की हैं:-
1- Prakash Gajendra Bhai Desai & Ors. Vs. Madya Gujarat Vij Co. Ltd. & Ors. IV (2012) CPJ 805 (NC)
2- DHBVNL Vs. Vidhya Devi III (2010) CPJ 198 (NC)
3- Ajmer Vidyut Vitnan Nigam Ltd. Vs. Parthu & Anr. I (2013) CPJ 159 (NC)
4- Dakshini Haryana Bijli Vitran Nigam Ltd. & Anr. Vs. Parmila Devi & Ors. II (2013) CPJ 321 (NC)
5- A.P. Transco & Ors. Vs. Bhimeswara Swamy & Ors. I (2015) CPJ 195 (NC)
6- Mangalore Electricity Supply Co. Ltd. Vs. K. Nagaraj Shetty III (2016) CPJ 613 (NC)
7- Consumer Case No. 253/2002 Smt. Munesh Devi Vs. U.P. Power Corporation Ltd. & Ors. में मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा पारित निर्णय दिनांक 03.02.2014
8- Civil Appeal No. 1339/2017 State of Himachal Pradesh & Ors. Vs. Naval Kumar alias Rohit Kumar
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में मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय और आदेश दिनांक 02.02.2017
9- अपील सं0-411/2015 रेखा देवी आदि बनाम उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा जिलाधिकारी, औरैया आदि में राज्य आयोग उ0प्र0 द्वारा पारित निर्णय दिनांक 04.7.2017
मैंने उभय पक्ष के तर्क पर विचार किया है और उभय पक्ष की ओर से प्रस्तुत उपरोक्त नजीरों का आदरपूर्वक अवलोकन किया है।
Andhra Pradesh Eastern Power Distribution Co. Ltd. (APEPDCL) Vs. Janni Suramma & Ors. I (2016) CPJ 558 (NC) के उपरोक्त वाद में मा0 राष्ट्रीय आयोग ने अपने निर्णय में यह माना है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत विद्युत स्पर्शाघात से हुई मृत्यु की क्षतिपूर्ति हेतु परिवाद तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब मृतक उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत उपभोक्ता रहा हो। मा0 राष्ट्रीय आयोग ने अपने इस निर्णय में अपने पूर्व पारित निर्णय Shankar Sitaram Jadhav Vs. Maharashtra State Electricity Board, III (1994) CPJ 50 (NC) का उल्लेख किया है और अपने इस निर्णय में प्रतिपादित सिद्धांत को दोहराते हुए उपरोक्त मत प्रकट किया है। परिवाद पत्र के अवलोकन से स्पष्ट है कि परिवाद पत्र में प्रत्यर्थी/परिवादीगण ने यह नहीं कहा है कि प्रत्यर्थी/परिवादीगण का
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पुत्र था। प्रत्यर्थी/परिवादीगण विपक्षीगण के उपभोक्ता रहे है और उनको विद्युत आपूर्ति करने वाली लाइन से यह दुर्घटना घटित हुई है, इसके विपरीत परिवाद पत्र के कथन से यह स्पष्ट होता है कि प्रत्यर्थी/परिवादीगण के पुत्र मोटर साइकिल पर पीछे बैठ कर गुजर रहे थे तभी विद्युत तार नीचे होने के कारण उन्हें करेंट लगा, जिससे उनकी दुर्घटना मृत्यु हुई है। परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादीगण का कथन है कि अपीलार्थी/विपक्षीगण द्वारा विद्युत लाइन का अनुरक्षण व संरक्षण ठीक ढंग से नहीं किया गया है और अपने दायित्व के प्रति लापरवाही बरती गयी है, जिससे यह दुर्घटना घटित हुई है। अत: परिवाद पत्र में कथित तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि प्रत्यर्थी/परिवादीगण ने अपीलार्थी/विपक्षीगण के विरूद्ध परिवाद Torteous Liabilit के आधार पर प्रस्तुत किया है।
परिवाद पत्र में प्रत्यर्थी/परिवादीगण ने न तो अपने को और न ही अपने पुत्र को अपीलार्थी/विपक्षीगण का उपभोक्ता बताया है और कथित तथ्यों से जाहिर होता है कि प्रत्यर्थी/परिवादीगण का पुत्र मोटर साइकिल से जा रहा था, तब विद्युत तार नीचे होने के कारण स्पर्श हुआ और परिवाद पत्र में कथित दुर्घटना घटित हुई है। अत: मा0 राष्ट्रीय आयोग के उपरोक्त निर्णयों में प्रतिपादित
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सिद्धांत के आधार पर प्रत्यर्थी/परिवादीगण द्वारा प्रस्तुत यह परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत ग्राह्य नहीं है।
Jagmittar Sain Bhagat (Dr.) Vs. Director, Health Service, Haryana & Ors. I (2013) CPJ 22 (SC) के निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि यदि निर्णय क्षेत्राधिकार के बिना विधि विरूद्ध ढंग से पारित किया गया है तो उसे किसी भी स्तर पर चुनौती दी जा सकती है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का संगत अंश निम्न है:-
"7. Indusputably, it is a settled legal proposition that conferment of jurisdiction is a legislative function and it can neither be conferred with the consent of the parties nor by a superior Court, and if the Court passes a decree having no jurisdiction over the matter, it would amount to nullity as the matter goes to the roots of the cause. Such an issue can be raised at any stage of the proceedings. The finding of a court or Tribunal becomes irrelevant and unenforceable/inexecutable once the Forum is found to have no jurisdiction Similarly, if. a-Court/Tribunal inherently lacks jurisdiction, acquiescence of party equally should not be permitted to erpetuate and perpetrate, defeating the legislative animation. The Court cannot derive jurisdiction apart from the Statute. In such eventuality the doctrine of waiver also does not apply."
प्रत्यर्थी/परिवादीगण की ओर से प्रस्तुत उपरोक्त नजीरों में मा0 राष्ट्रीय आयोग ने इस बिन्दु पर स्पष्ट रूप से विचार नहीं
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किया है कि क्या विद्युत स्पर्शाघात से मृत्यु होने पर उपभोक्ता से भिन्न व्यक्ति द्वारा Torteous Liabilit के आधार पर क्षतिपूर्ति हेतु प्रस्तुत परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत ग्राह्य है, जबकि मा0 राष्ट्रीय आयोग ने अपने उपरोक्त दो निर्णयों में इस सम्बन्ध में स्पष्ट मत व्यक्त किया है कि विद्युत स्पर्शाघात से मृत्यु होने पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनिमय के अन्तर्गत परिवाद तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब मृतक उपभोक्ता की श्रेणी में आता हो। अत: मा0 राष्ट्रीय आयोग के उपरोक्त दोनों निर्णयों में प्रतिपादित स्पष्ट सिद्धांत को दृष्टिगत रखते हुए मैं इस मत का हॅू कि परिवाद पत्र में कथित विवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत उपभोक्ता विवाद नहीं है और यह परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत ग्राह्य नहीं है। अत: जिला फोरम ने परिवाद ग्रहण कर जो आक्षेपित आदेश पारित किया है, वह अधिकाररहित है।
प्रत्यर्थी/परिवादीगण की ओर से मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Civil Appeal No. 1339/2017 State of Himachal Pradesh & Ors. Vs. Naval Kumar alias Rohit Kumar के निर्णय की जो प्रति प्रस्तुत की गई है, उससे स्पष्ट है कि यह अपील रिट याचिका सं0-475/2013 में मा0 उच्च न्यायालय हिमांचल प्रदेश द्वारा पारित आदेश के विरूद्ध प्रस्तुत की गई है। यह अपील उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अन्तर्गत विवाद के
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सम्बन्ध में नहीं है। अत: मा0 उच्च न्यायालय के इस निर्णय का कोई लाभ प्रत्यर्थी/परिवादीगण को वर्तमान अपील में नहीं मिल सकता है।
उपरोक्त सम्पूर्ण विवेचना के आधार पर मैं इस मत का हॅू कि प्रत्यर्थी/परिवादीगण द्वारा प्रस्तुत परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत ग्राह्य नहीं है। अत: जिला फोरम द्वारा पारित निर्णय अधिकाररहित और विधि विरूद्ध है। अत: अपील स्वीकार की जाती है और जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश अपास्त कर परिवाद प्रत्यर्थी/परिवादीगण को विधि के अनुसार सक्षम न्यायालय या अधिकरण में प्रस्तुत करने की छूट के साथ निरस्त किया जाता है।
अपील में उभय पक्ष अपना अपना वाद व्यय स्वयं बहन करेगें।
धारा-15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनिमय के अन्तर्गत अपील में जमा धनराशि अर्जित ब्याज सहित अपीलार्थीगण को वापस की जायेगी।
(न्यायमूर्ति अख्तर हुसैन खान)
अध्यक्ष
हरीश आशु.,
कोर्ट सं0-1