राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0 लखनऊ।
अपील संख्या:-2627/2003
(सुरक्षित)
(जिला उपभोक्ता फोरम, शाहजहॉंपुर द्वारा परिवाद संख्या 131/2001 में पारित आदेश दिनॉंक 26.08.2003 के विरूद्ध)
े
1-Superintendent of Post Offices, Shahajahanpur Division, Sahjahanpur.
2-Pos Master General, Bareilly.
3-Post Master, Sub-Post Office, Sindhauli. Shahajahanpur.
…………Appellants.
Versus
Smt. NafeesBano, W/o Sri Nasimu-llah, R/o Village & P.O. Sindhauli, Shahajahanpur.
……………Respondents.
समक्ष
1. माननीय श्री उदय शंकर अवस्थी, पीठासीन सदस्य।
2. मा0 श्रीमती बालकुमारी, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : अधिवक्ता डॉ0 श्री उदयवीर सिंह।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : अधिवक्ता श्री आर0के0 गुप्ता।
दिनॉंक: 01-09-2017.
माननीय श्री उदय शंकर अवस्थी, सदस्य द्वारा उद्घोषित
निर्णय
प्रस्तुत अपील जिला मंच, शाहजहॉंपुर द्वारा परिवाद संख्या 131/2001 में पारित आदेश दिनॉंक 26.08.2003 के विरूद्ध योजित की गयी है।
संक्षेप में तथ्य इस प्रकार हैं कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी के कथनानुसार परिवादिनी ने 05 जनवरी, 1996 को तत्कालीन डाकपाल, शाखा सिंधौली, जिला-शाहजहॉंपुर के कहने पर रू0 25,000/- फिक्स डिपाजिट में निवेश किया था। डाकघर की फिक्स डिपॉजिट योजना के अन्तर्गत परिवादिनी को पॉंच साल बाद दुगुना धन रू0 50,000/-मिलना था। परिवादिनी ने जब शाखा डाकपाल से 25,000/-रूपये जमा करने की रसीद मॉंगी तो उन्होंने कहा कि दो दिन बाद वह अपनी पासबुक ले ले। दो दिन बाद दिनॉंक 07.01.1996 को परिवादिनी अपीलकर्ता संख्या-03 के तत्कालीन डाकपाल के पास गयी तो उसे पासबुक दी गयी। परिवादिनी की पासबुक में खाता संख्या 554686 अंकित था, तथा जमा की हुई धनराशि 25,000/-रूपये अंकित थी। परिवादिनी को पासबुक दिये जाने के लगभग एक साल बाद विपक्षी संख्या-03 के तत्कालीन डाकपाल परिवादिनी के पास आये ओर कहा कि पासबुक की जॉंच अपीलकर्ता संख्या-01 के द्वारा की जायेगी। वह उसे पासबुक दे दे। परिवादिनी ने विश्वास करके विपक्षी संख्या-03 के तत्कालीन डाकपाल श्री नरवीर सिंह को पासबुक दे दी। एक सप्ताह गुजर जाने के बाद जब डाकपाल ने परिवादिनी की पासबुक नहीं दी तो परिवादिनी शाखा डाकपाल के पास अपने पति को लेकर गयी और पासबुक मॉंगी तो डाकपाल ने टाल-मटोल किया और कहा कि उसकी पासबुक विपक्षी संख्या-01 शाहजहॉंपुर ले गया है। वापस आने पर उसके घर भिजवा दी जायेगी। परिवादिनी उसके कहने पर विश्वास में रही, परन्तु पासबुक वापस नहीं की गयी। जुलाई, 1999 में परिवादिनी को गॉंव में तथा शाखा डाक सिंधौली शाहजहॉंपुर में ज्ञात हुआ कि शाखा डाकपाल नरवीर सिंह ने अनेकों खाताधारकों का रूपया गबन कर लिया तथा कहीं गायब हो गया, तथा उसकी धनराशि शाखा डाक पुवायां शाहजहॉंपुर में स्थानान्तरित कर दी गयी है। परिवादिनी ने शाखा पुवायां से जानकारी ली तो उसे बताया गया कि धनराशि उसके उक्त खाते में जमा है। परिवादिनी ने 1999 में विपक्षी संख्या 1 व 2 तथा पोस्ट मास्टर जनरल को अपनी जमाशुदा धनराशि के सम्बन्ध में शिकायत की तथा धनराशि वापस मॉंगी। विपक्षी संख्या-01 द्वारा सूचित किया गया कि शिकायत की जॉंच की जा रही है, किन्तु विपक्षी संख्या-01 ने अपने पत्र दिनॉंकित 09.08.2002 द्वारा परिवादिनी को अवगत कराया कि उसका दावा निरस्त कर दिया गया है। अत: परिवादिनी ने 25,000/-रूपये मय ब्याज भुगतान किये जाने एवं क्षतिपूर्ति की अदायगी हेतु परिवाद जिला मंच के समक्ष योजित किया।
अपीलकर्तागण की ओर से प्रतिवाद पत्र जिला मंच के समक्ष प्रस्तुत किया गया। अकपीलकर्तागण के कथनानुसार परिवादिनी ने कोई फिक्स डिपॉजिट/टाइम डिपॉजिट खाता नहीं खोला बल्कि उसने एक बचत खाता संख्या:- 554686 मुबलिग 25,000/- से शाखा डाकघर सिंधौली में दिनॉंक 11.06.1995 को खोला था। उसके संबंध में नियमत: पासबुक जारी की गयी। अपीलकर्तागण का यह भी कथन है कि वर्ष 95 में किसी भी प्रकार का खाता पॉंच वर्ष में दुगुना नहीं होता था। परिवादिनी ने उक्त धनराशि के आहरण हेतु निर्धारित प्रारूप में दिनॉंक 22.03.1996 को आवेदन किया और उसकी शिनाख्त उसके लड़के रहीसुद्दीन या दूसरे गवाह ने की। उक्त रकम दिनॉंक 22.03.96 को प्राप्त की गयी। तदोपरान्त लम्बी अवधि के उपरान्त अनुचित लाभ उठाने के लिये जमा धनराशि प्राप्त करने के बाद यह जानकर कि तत्कालीन शाखा डाकपाल नरवीर सिंह कतिपय धनराशि के गबन में आरोपित हैं। परिवादिनी ने भी नरवीर सिंह पर धनराशि की निकासी का आरोप लगाया। किन्तु उसे परिवाद में पक्षकार नहीं बनाया।
विद्वान जिला मंच ने प्रश्नगत निर्णय द्वारा परिवादिनी द्वारा 25,000/-रूपये फिक्स डिपॉजिट में पॉंच वर्ष के लिए जमा किया जाना मानते हुए तथा धनराशि की अदायगी प्रमाणित न होना मानते हुए परिवादिनी का परिवाद स्वीकार किया तथा अपीलकर्ता को आदेशित किया कि अंकन 50,000/-रूपये की धनराशि जिस पर परिवाद की तिथि 30.05.2001 से भुगतान की तिथि तक 09 प्रतिशत साधारण ब्याज भी देय होगा। निर्णय की तिथि से एक माह के अन्दर परिवादिनी को किया जाए। इसके अतिरिक्त 5000/-रूपये वाद व्यय एवं क्षतिपूर्ति के रूप में परिवादिनी को भुगतान किये जाने हेतु आदेशित किया गया। इस निर्णय से क्षुब्ध होकर यह अपील योजित की गयी।
अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता डॉ0 उदयवीर सिंह तथा प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता श्री आर0के0 गुप्ता के तर्क सुने तथा अभिलेख का अवलोकन किया।
अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि प्रस्तुत प्रकरण में अपीलकर्ता संख्या 03 के तत्कालीन डाकपाल श्री नरवीर सिंह के माध्यम से ही प्रश्नगत खाता खोला जाना तथा पासबुक जारी किया जाना परिवादिनी ने अभिकथित किया है, साथ ही परिवादिनी का यह भी कथन है कि श्री नरवीर सिंह ने यह पासबुक धोखे से उससे प्राप्त कर ली गयी। ऐसी परिस्थिति में श्री नरवीर सिंह प्रस्तुत परिवाद के निस्तारण में आवश्यक पक्षकार था। परिवादिनी ने उन्हें परिवाद में पक्षकार नहीं बनाया है, अत: परिवाद आवश्यक पक्षकार न बनाये जाने के कारण दोषपूर्ण है। अपीलार्थी की ओर से यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि परिवादिनी ने यह परिवाद स्वच्छ हाथों से नहीं योजित किया है, क्योंकि उसके द्वारा वास्तव में बचत खाता खोला गया किन्तु परिवादिनी ने परिवाद में फिक्स डिपॉजिट योजना के अर्न्तगत निवेश किया जाना अभिकथित करते हुए परिवाद योजित किया है। अपीलकर्ता की ओर से यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि परिवादिनी ने प्रश्नगत खाते के अन्तर्गत जमा की गयी धनराशि स्वयं दिनॉंक 22.03.96 को आहरित कर ली थी। किन्तु विद्वान जिला मंच ने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य का उचित परिशीलन न करते हुए प्रश्नगत निर्णय पारित किया।
अपीलकर्ता की ओर से यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि प्रश्नगत मामले में जटिल प्रश्न निहित है। अत: परिवाद का निस्तारण संक्षिप्त विचारण के माध्यम से नहीं किया जा सकता। प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि विद्वान जिला मंच ने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य के विस्तृत विवेचन के उपरान्त प्रश्नगत निर्णय पारित किया। अपील में बल नहीं है। निरस्त किये जाने योग्य है।
प्रस्तुत प्रकरण के संदर्भ में यह तर्क निर्विवाद है कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी द्वारा 25,000/-रूपये डाकघर सिंधौली जिला शाहजहॉंपुर में जमा किया गया। अपीलकर्तागण के कथनानुसार यह धनराशि प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने दि0 11.06.95 को बचत खाते में जमा की जिसका नम्बर 554686 था जबकि प्रत्यर्थी/परिवादिनी का यह कथन है कि यह धनराशि दि0 05.01.96 को पॉंच वर्ष के लिए सावधि जमा खाते में जमा की गयी, जिसका खाता संख्या 554686 था तथा यह धनराशि पॉंच वर्ष में अपीलकर्ता की योजना के अनुसार दुगुना हो जाना था। प्रत्यर्थी/परिवादिनी के कथनानुसार खाता खोले जाने के एक वर्ष उपरान्त तत्काली संबंधित शाखा डाकपाल श्री नरवीर सिंह परिवादिनी के पास आये तथा यह कहकर परिवादिनी की पासबुक मॉंगी कि अपीलकर्ता सं0 1 के द्वारा जॉंच की जानी है। परिवादिनी ने श्री नरवीर सिंह की बात पर विश्वास करके यह पासबुक उसे दे दी, किन्तु श्री नरवीर सिंह ने बाद में मॉंगने के बावजूद पासबुक उसे वापस नहीं की और टालमटोल की। यह कहा कि पासबुक अपीलकर्ता संख्या 01 के पास शाहजहॉंपुर गयी है, वापस आने पर भिजवा दी जायेगी।
प्रश्नगत निर्णय के अवलोकन से विदित होता है कि जिला मंच के समक्ष अपीलकर्ता ने बचत खाता रजिस्टर की छायाप्रति दाखिल की। यह छायाप्रति अपील मेमो के साथ भी दाखिल किया है, जिसमें दि0 11.03.96 को टी0आर043 खाते में परिवादिनी द्वारा 25,000/-रूपये का नया खाता खोला जाना दर्शित है । खाता संख्या 554686 लिखा है, इस अभिलेख में अंतिम प्रविष्टि दि0 22.03.96 की खाता संख्या 554686 से अंकन 25,000/-रूपये की निकासी दर्शित है। उल्लेखनीय है कि स्वयं अपीलकर्ता का यह अभिकथन नहीं है कि परिवादिनी द्वारा दि0 11.03.96 प्रश्नगत खाता खोला गया, बल्कि प्रतिवाद पत्र के अभिकथनों के अनुसार प्रश्नगत खाता दि0 11.06.95 को खोला गया और नियमत: पासबुक जारी की गयी। अपीलकर्ता ने दि0 11.03.96 को प्रश्नगत खाता खोले जाने हेतु कथित आवेदन पत्र की प्रति भी जिला मंच के समक्ष प्रस्तुत की। जिसमें डाकघर की मोहर भी लगी थी। जब स्वयं अपीलकर्ता का यह कथन नहीं है कि दि0 11.03.96 को प्रश्नगत खाता खोला गया तब स्वाभाविक रूप से इन अभिलेखों में अंकित प्रविष्टि विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती। स्वयं अपीलकर्ता का यह कथन हे कि तत्कालीन डाकपाल श्री नरवीर सिंह खाताधारकों द्वारा जमा की गयी कतिपय धनरशि के गबन के आरोप में आरोपित किये गये थे। अपीलकर्ता की ओर से दाखिल किये गये इन अभिलेखों में दिनॉंक 11.03.96 को खाता खोलना तथा दि0 22.03.96 को इस खाते की धनराशि निकाला जाना दर्शित है। इन प्रविष्टियों पर किसी के हस्ताक्षर भी नहीं हैं। ऐसी परिस्थिति में इस अभिलेख में दर्शित प्रविष्टि विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती।
जहॉं तक इस विवाद का प्रश्न है कि प्रश्नगत खाता बचत खाता था अथवा सावधि जमा खाता था, यह तथ्य निर्विवाद है कि प्रश्नगत खाते की संख्या 554686 थी और इस खाते से संबंधित पासबुक परिवादिनी को निर्गत की गयी थी। परिवादिनी के कथनानुसार यह पासबुक श्री नरवीर सिंह द्वारा धोखे से उससे प्राप्त कर ली गयी और वापस नहीं की गयी। जिला मंच के समक्ष अपीलकर्ता की ओर से फिक्स डिपॉजिट रजिस्टर दाखिल किया गया। प्रश्नगत निर्णय के अवलोकन से यह विदित होता है कि इस रजिस्टर से प्रश्नगत डिपाजिट से संबंधित पृष्ठ 244 से 248 तक फटे हुए पाये गये और इसका कोई स्पष्टीकरण अपीलकर्ता की ओर से प्रस्तुत नहीं किया गया। अपीलीय स्तर पर भी इस सम्बन्ध में कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया गया।
प्रस्तुत प्रकरण में र्निविवाद रूप से 25,000.00 रूपये की एकमुश्त धनराशि परिवादिनी द्वारा जमा की गयी। परिवादिनी एक अल्प आयवर्ग की अशिक्षित ग्रामीण महिला है। सामान्यत: ऐसी परिस्थिति में एकतुश्त इतनी धनराशि फिक्स डिपॉजिट में जमा होना ही अधिक स्वाभाविक होगा। बचत खाते में प्राय: धीर-धीरे धन जमा किया व निकाला जाता है। परिवादिनी के कथनानुसार 5 जनवरी1996 को उसने 25,000/- रूपये 5 वर्ष के फिक्स डिपाजिट में जमा किये थे। धनराशि जमा किये जाने एवं कथित रूप से निकाले जाने के मध्य कोई अन्य ट्रांजेक्शन अभिकथित नहीं है। परिवादिनी के कथनानुसार जुलाई 1999 में यह जानकारी प्राप्त होने पर कि डाकपाल श्री नरवीर सिंह द्वारा बहुत से खातेदारों की जमा धनराशि का गबन किया गया तब उसे चिन्ता हुई और उसने भागदौड़ की तब उसे पता चला कि उसका धन भी हड़प लिया गया है। फिक्स डिपाजिट की परिस्थिति में परिवादिनी का यह आचरण स्वाभाविक प्रतीत होता है।
ऐसी परिस्थिति में जब परिवादिनी द्वारा 25,000/-रूपये निर्विवाद रूप से जमा किये गये तथा इस खाते का बचत खाता होने के संबंध में अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत की गयी साक्ष्य विश्वसनीय नहीं है, एवं इस खाते के संबंध में परिवादिनी को प्राप्त करायी गयी पासबुक उससे धोखे से प्राप्त कर ली गयी। प्रश्नगत धनराशि पॉंच वर्ष की सावधि जमा खाते में जमा किये जाने के संदर्भ में परिवादिनी द्वारा प्रस्तुत किये गये शपथ पत्र पर अविश्वास करने का कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता।
अपीलकर्ता का यह भी कथन है कि प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा जमा की गयी यह धनराशि दि0 22.03.96 का उसके द्वारा आहरण कर लिया गया। इस संदर्भ में जिला मंच के समक्ष अपीलार्थी की ओर से आहरण पर्ची दाखिल की गयी जिसपर प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने जिला मंच के समक्ष दिये गये अपने बयान दिनॉंकित 23.09.2002 में अपने निशान अंगूठा से इनकार किया इस तथ्य को सिद्ध करने का दायित्व भी अपीलकर्ता का था कि यह धनराशि प्रत्यर्थी/परिवादिनी द्वारा आहरित की गयी तदनुसार आहरण पर्ची पर प्रत्यर्थी/परिवादिनी के निशानी अंगूठा होने के तथ्य को प्रमाणित करने का दायित्व अपीलकर्ता का था। इस संदर्भ में जिला मंच के समक्ष अपीलकर्ता की ओर से प्रार्थना पत्र द्वारा आहरण पर्ची पर प्रत्यथी/परिवादिनी का निशानी अंगूठा होने के तथ्य को साबित करने हेतु विशेषज्ञ आख्या प्रस्तुत करने की अनुमति चाही गयी। विद्वान जिला मंच द्वारा अपीलकर्ता का यह प्रार्थना पत्र स्वीकार किया गया, किन्तु ऐसी कोई विशेषज्ञ आख्या अपीलकर्ता की ओर जिला मंच के समक्ष पर्याप्त अवसर दिये जाने के बावजूद दाखिल नहीं की गयी। अपील के आधार में अपीलकर्ता द्वारा यह अभिकथित किया गया कि परिवाद के निर्णय होने तक विशेषज्ञ आख्या प्राप्त न हो पाने के कारण दाखिल नहीं की जा सकी। उल्लेखनीय है कि अपील की सुनवाई के मध्य भी ऐसी कोई विेशषज्ञ आख्या प्रस्तुत नहीं की गयी। ऐसी परिस्थिति में अपीलकर्ता का यह कथन कि अपीलकर्ता द्वारा जमा की गयी 25,000/- रूपये की धनराशि उसके द्वारा दिनॉंक 22.03.96 को वापस प्राप्त की गयी प्रमाणित नहीं है।
जहॉं तक नरवीरसिंह यादव को परिवाद में पक्ष बनाये जाने का प्रश्न है यह तथ्य निर्विवाद है कि श्री नरवीर सिंह ने प्रश्नगत निवेशित 25,000/-रूपये की धनराशि शाखा सिंधौली में डाकपाल के पद पर कार्यरत रहते हुए प्राप्त की। यह तथ्य भी निर्विवाद है कि अपने उक्त पद पर कार्यरत रहते हुए अपने राजकीय कार्य के निष्पादन में 25,000/-रूपये की यह धनराशि परिवादिनी से उन्होंने डाकघर की योजना में निवेशित किये जाने हेतु प्राप्त की । स्वाभाविक रूप से श्री नरवीर सिंह द्वारा किये गये कार्य के लिये अपीलकर्तागण संयुक्त रूपसे उत्तरदायी माने जायेंगे। प्रस्तुत मामले के संदर्भ में विवाद के निस्तारण हेतु अपीलकर्तागण आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत करने में सक्षम थे, और उनके द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत भी की गयी। ऐसी परिस्थिति में अपीलकर्तागण का यह तर्क स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है कि परिवाद के निस्तारण हेतु श्री नरवीर सिंह आवश्यक पक्षकार थे और उन्हें पक्षकार न बनाये जाने के कारण परिवाद निरस्त किये जाने योग्य है।
जहॉं तक अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता का यह तर्क है कि प्रश्नगत मामले में जटिल प्रश्न निहित है। अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता का यह तर्क भी स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है। पक्षकारों को साक्ष्य प्रस्तुत करने के संदर्भ में विद्वान जिला मंच द्वारा अवसर प्रदान किया गया और उनके द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत की गयी। प्रश्नगत प्रकरण में ऐसा कोई जटिल प्रश्न निहित होना विदित नहीं होता, जिसका निस्तारण संक्षिप्त विचारण के माध्यम से उपभोक्ता न्यायालय द्वारा नहीं किया जा सके।
हमारे विचार से विद्वान जिला मंच ने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य का उचित परिशीलन करते हुए प्रश्नगत निर्णय पारित किया है। अपील में बल नहीं है। निरस्त किये जाने योग्य है।
आदेश
प्रस्तुत अपील निरस्त की जाती है। जिला मंच शाहजहॉंपुर द्वारा परिवाद संख्या 131/2001 में पारित प्रश्नगत निर्णय दिनॉंक 26.08.2003 की पुष्टि की जाती है। उभयपक्ष अपीलीय व्यय भार अपना अपना वहन करेंगे। निर्णय की प्रमाणित प्रतिलिपि पक्षकारों को नियमानुसार प्राप्त करायी जाए।
(उदय शंकर अवस्थी) (बाल कुमारी)
पीठासीन सदस्य सदस्य
प्रदीप कुमार, आशु0 कोर्ट नं0-2