राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।
सुरक्षित
अपील सं0-२०३७/१९९८
(जिला फोरम, गोण्डा द्वारा परिवाद सं0-१९१/१९९७ में पारित प्रश्नगत निर्णय/आदेश दिनांक १३-०७-१९९८ के विरूद्ध)
१. सुपरिण्टेण्डेण्ट आफ पोस्ट आफिसेज, गोण्डा डिवीजन, गोण्डा।
२. दी पोस्ट मास्टर, करनेल गंज, सब पोस्ट आफिस, जिला गोण्डा।
..................... अपीलार्थीगण/विपक्षीगण।
बनाम्
शंकर जायसवाल पुत्र श्री राम चन्द्र जायसवाल, जायसवाल बूट हाउस, गुडाही बाजार, पोस्ट करनेल गंज, जिला गोण्डा।
...................... प्रत्यर्थी/परिवादी।
समक्ष:-
१- मा0 श्री आलोक कुमार बोस, पीठासीन सदस्य।
२- मा0 श्रीमती बाल कुमारी, सदस्य।
अपीलार्थीगण की ओर से उपस्थित :- डॉ0 उदयवीर सिंह विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी/परिवादी की ओर से उपस्थित :- कोई नहीं।
दिनांक : १४-०८-२०१५
मा0 श्री आलोक कुमार बोस, पीठासीन सदस्य द्वारा उदघोषित
निर्णय
अपीलार्थी डाक विभाग की ओर से यह अपील जिला फोरम, गोण्डा द्वारा परिवाद सं0-१९१/१९९७ में पारित प्रश्नगत निर्णय/आदेश दिनांक १३-०७-१९९८ के विरूद्ध योजित की गयी है जिसके अन्तर्गत परिवाद को स्वीकार करते हुए अपीलार्थीगण को आदेशित किया गया कि वे १५००/- रू० मनीआर्डर की धनराशि दिनांक ११-०१-१९९६ से देय तिथि तक १२ प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित एवं ५००/- रू० क्षतिपूर्ति व वाद व्यय स्वरूप ५००/-रू० परिवादी को अदा करें।
दिनांक २७-०७-२०१५ को अन्तिम सुनवाई के समय अपीलार्थीगण की ओर से विद्वान अधिवक्ता डॉ0 उदयवीर सिंह उपस्थित आये। प्रत्यर्थी को वर्ष १९९८ के बाद एकाधिक बार अपील पर आपत्ति दाखिल करने हेतु नोटिस भेजी गयी फिर भी उसकी की ओर से कोई उपस्थित नहीं आया और न ही कोई आपत्ति योजित की गयी। चूँकि
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यह अपील पिछले १६ वर्ष से भी अधिक समय से निस्तारण हेतु सूचीबद्ध होती चली आ रही है अत: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम १९८६ (अधिनियम सं० ६८ सन् १९८६) की धारा-३० की उपधारा (२) के अन्तर्गत निर्मित उत्तर प्रदेश उपभोक्ता संरक्षण नियमावली १९८७ के नियम ८ के उप नियम (६) में दिये गये प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए पीठ द्वारा यह समीचीन पाया गया कि पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य/अभिलेख के आधार पर इस अपील में न्यायोचित आदेश पारित कर दिया जाय। अत: पीठ द्वारा अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्ता को एकल रूप से सुना गया तथा पत्रावली पर उपलब्ध समस्त अभिलेख/साक्ष्य का गहनता से परिशीलन किया गया।
पत्रावली के परिशीलन से यह तथ्य प्रकाश में आता है कि प्रत्यर्थी/परिवादी शंकर जायसवाल ने डाकघर करनेलगंज, गोण्डा से दिनांक ११-०१-१९९६ को मु० १५००/- रू० का मनीआर्डर जरिए रसीद सं0-३१६४ अपनी पुत्री कुमारी नीतू कुमारी के लिए केयर आफ श्री मुन्द्रिका सिंह ग्राम रूपसमहाजी पछियारी टोला, पोस्ट ग्यासपुर महाजी वाया खुसरूपुर जिला पटना बिहार के पते पर भेजा था परन्तु यह मनीआर्डर एक वर्ष आठ माह तक प्रत्यर्थी/परिवादी की पुत्री को प्राप्त नहीं हुआ। इस सम्बन्ध में प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा डाक विभाग के अधिकारियों को अनेकों शिकायती प्रार्थना पत्र भेजे जाने के बाद अपीलार्थीगण द्वारा विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ तो की गयी परन्तु परिवाद पत्र में परिवादी के कथनानुसार मनीआर्डर की धनराशि का भुगतान नहीं किया गया। अपीलार्थी/विपक्षी डाक विभाग के इसी कृत्य को सेवा में कमी मानते हुए प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा प्रश्नगत परिवाद सं0 ४१०/१९९७ अधीनस्थ जिला फोरम में योजित किया, जिसे अधीनस्थ फोरम द्वारा स्वीकार करते हुए अपीलार्थी डाक विभाग के विरूद्ध उपरोक्तानुसार आदेश पारित किया गया। इसी आदेश से क्षुब्ध होकर प्रस्तुत अपील संस्थित की गयी है।
अपीलार्थी का कहना है कि अधीनस्थ फोरम द्वारा पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश, तथ्यों एवं विधि विरूद्ध होने के कारण यदि अपास्त नहीं किया जाता है तो अपीलार्थीगण/डाक विभाग को अपूर्णनीय क्षति होगी। प्रश्नगत मनीआर्डर की धनराशि अपरिहार्य कारणों से प्राप्तकर्ता को समय उपलब्ध नहीं करायी जाने के सम्बन्ध में शिकायत प्राप्त होने पर अपीलार्थी डाक विभाग द्वारा विभागीय कार्यवाही की गयी एवं
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प्रश्नगत मनीआर्डर की धनराशि का प्राप्तकर्ता को दिनांक २१-०३-१९९८ को भुगतान कर दिया गया। उनका यह भी कहना है कि इस तथ्य का उल्लेख अधीनस्थ फोरम द्वारा अपने निर्णय दिनांकित १३-०७-१९९८ में नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त अपीलार्थीगण का यह भी कहना है कि इस प्रकार के परिवादों की सुनवाई का मौलिक क्षेत्राधिकार अधीनस्थ फोरम के पास नहीं था एवं इस प्रकरण में विभाग की ओर से किसी प्रकार की कोई सेवा में कमी नहीं की गयी है। अपीलार्थी डाक विभाग के विद्वान अधिवक्ता के तर्कों के परिप्रेक्ष्य में पीठ द्वारा प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश तथा समस्त अभिलेख/साक्ष्य का गहनता से परिशीलन किया गया। यहॉं यह उल्लेखनीय है कि भारतीय डाक अधिनियम १८९८ (अधिनियम सं० ६ सन् १८९८) की धारा-४८ में निम्नवत् प्राविधान है कि -
48- Exemption from liability in respect of money orders. – No suit or other legal proceeding shall be instituted against [the Government] or any officer or the Post Office in respect of-
(a) anything done under any rules made by the [Central Government] under this Chapter; or
(b) the wrong payment of a money order caused by incorrect or incomplete information given by the remitter as to the name and address of the payee, provided that, as regards incomplete information; there was reasonable justification for accepting the information as a sufficient description for the purpose of identifying the payee; or
(c) the payment of any money order being refused or delayed by, or on account of , any accidental neglect, omission or mistake, by, or on the part of, an officer of the Post Office, or for any other cause whatsoever, other than the fraud or wilful act or default of such officer; or
(d) any wrong payment of a money order after the expiration of one year from the date of the issue of the order; [or]
(e) any wrong payment or delay in payment of a money order beyond the limits of [India] by an officer of any Post Office, not being one established by the [Central Government].
इसी अधिनियम की धारा ६ में यह प्राविधान दिया गया है कि –
Section 6 of the Indian Post Office Act. 1898 reads as under :
“6. Exemption from liability for loss, misdelivery, delay or damage - The Government shall not incur any liability by reason of the loss, misdelivery or delay of, or damage to, any postal article in course of transmission by post, except insofar as such liability may in express terms be undertaken by the Central Government as hereinafter provided and no
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officer of the Post Office shall incur any liability by reason of any such loss,
misdelivery, delay or damage, unless he has caused the same fraudulently or
by his willful act or default.”
उपरोक्त प्राविधान तथा मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा टीकाराम बनाम इण्डियन पोस्टल डिपार्टमेण्ट IV (2007) CPJ 123 (NC) में दिये गये विधिक सिद्धान्त को दृष्टिगत रखते हुए हमारे विचार से अधीनस्थ फोरम द्वारा पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश विधि अनुरूप नहीं है। विद्वान फोरम द्वारा विधि विरूद्ध आदेश पारित किया गया है जो किसी भी दृष्टिकोण से पोषणीय नहीं है। वर्णित परिस्थिति में अधीनस्थ फोरम द्वारा पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश, तथ्य एवं विधि के विपरीत होने के कारण अपास्त होन तथा अपील स्वीकार होने योग्य है।
आदेश
प्रस्तुत अपील स्वीकार की जाती है। जिला फोरम, गोण्डा द्वारा परिवाद सं0-१९१/१९९७ में पारित निर्णय/आदेश दिनांक १३-०७-१९९८ अपास्त किया जाता है। पक्षकार अपीलीय व्यय-भार अपना-अपना स्वयं वहन करेंगे। उभय पक्ष को इस निर्णय की प्रमाणित प्रतिलिपि नियमानुसार उपलब्ध करायी जाय।
(आलोक कुमार बोस)
पीठासीन सदस्य
(बाल कुमारी)
सदस्य
प्रमोद कुमार
वैय0सहा0ग्रेड-१,
कोर्ट-४.