राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, लखनऊ उ0प्र0
अपील संख्या- 1397/2005 सुरक्षित
(जिला उपभोक्ता फोरम, कानपुर नगर द्वारा परिवाद सं0 1276/2003 में पारित निर्णय/आदेश दिनांकित 22-07-2005 के विरूद्ध)
1-द पोस्ट मास्टर जनरल, कानपुर- प्रथम।
2-सीनियर अधीक्षक, पोस्ट आफिस सिटी मण्डल कानपुर- प्रथम।
अपीलार्थीगण/विपक्षीगण
बनाम
शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी निवासी- मकान नं0-2, संतोचौरा छावनी, कानपुर नगर- प्रथम।
प्रत्यर्थी/विपक्षी
समक्ष:-
माननीय श्री आर0सी0 चौधरी, पीठासीन सदस्य।
माननीय श्री गोवर्द्धन यादव, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थिति : डा0 उदय वीर सिंह, विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थिति : कोई नहीं।
दिनांक-16-03-2017
माननीय श्री आर0सी0 चौधरी, पीठासीन सदस्य, द्वारा उद्घोषित
निर्णय
प्रस्तुत अपील जिला उपभोक्ता फोरम, कानपुर नगर द्वारा परिवाद सं0 1276/2003 में पारित निर्णय/आदेश दिनांकित 22-07-2005 के विरूद्ध योजित की गई है, जिसमें जिला उपभोक्ता फोरम के द्वारा निम्न आदेश पारित किया गया है:-
परिवाद पत्र स्वीकार किया जाता है। विपक्षीगण को आदेश दिया जाता है कि वे परिवादी को क्षतिपूर्ति के रूप में रूपया 500-00 एवं परिवाद व्यय 250-00 निर्णय की तिथि से दो माह के अन्दर भुगतान करें। निर्धारित समयावधि में भुगतान न करने पर उपरोक्त समस्त राशि पर निर्णय के दिनांक से 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी विपक्षी द्वारा देय होगा।
संक्षेप में केस के तथ्य इस प्रकार से है कि परिवादी ने दिनांक 24-04-2003 को पत्र सं0-3001 पावती रसीद संलग्न करके विपक्षीगण के उक्त कार्यालय से रजिस्ट्री की। दो माह ब्यतीत होने के पश्चात पत्र वितरण की कोई लिखित सूचना प्राप्त नहीं हुई। परिवादी ने उक्त पत्र श्री कश्यप निवासी- सफीपुर जीप अड्डा के पास जिला उन्नाव प्रेषित किया था। परिवादी ने अपने परिवाद पत्र के शपथ पत्र में यह उल्लिखित किया है कि निर्गत पत्र विधि व्यवस्था से सम्बन्धित था, जिससे भारी उपेक्षा, मानसिक व आर्थिक क्षति हुई। विधिक कार्य बाधित हुआ। अत: परिवादी ने परिवाद पत्र प्रस्तुत करके विपक्षीगण से आर्थिक क्षतिपूर्ति के रूप में रूपया 10,000-00, मानसिक क्षतिपूर्ति 5000-00 तथा प्रतिष्ठा की क्षति के लिए रूपया 50,000-00 न्यायहित में अनुतोष की मांग की।
(2)
जिला उपभोक्ता फोरम के समक्ष प्रतिवादीगण उपस्थित आये और अपना लिखित कथन प्रस्तुत किया, जिसमें कहा गया है कि परिवादी का पंजीकृत पत्र सं0-3001 दिनांक 24-02-2003 को दिये गये पते पर प्रेषित किया गया था, पत्र वितरण हेतु दिनांक 01-07-2003 शिकायत पत्र प्राप्त होते ही विपक्षीगण ने जॉच प्रक्रिया पूर्ण करके पत्रॉक सी.आर. 03ए/7/2003/112 सी.ओ.एम. 3 दिनांक 18-08-2003 के माध्यम से पत्र वितरण दिनांक 26-04-2003 प्रापक को प्राप्त करा दिया गया है। किसी प्रकार की त्रुटि नहीं हुई है। सेवाकार्य पूर्ण होने का कार्य अपने शपथ पत्र में उल्लिखित किया है। धारा-6 में यह प्राविधान है कि पत्र खोने, गलत वितरण व देरी तथा नष्ट होने पर विपक्षी उत्तरदाता है। पोस्ट आफिस एक्ट 1898 धारा-29 में क्षतिपूर्ति मात्र 100-00 देने का प्राविधान उल्लिखित है। परिवादी का कथन भ्रामक है। परिवाद पत्र निरस्त होने योग्य है।
इस सम्बन्ध में अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता डा0 उदय वीर सिंह, को सुना गया। प्रत्यर्थी को नोटिस दिनांक 06-05-2014 को प्रेषित की गई थी, लेकिन प्रत्यर्थी की ओर से कोई उपस्थित नहीं आया। अत: प्रत्यथी पर नोटिस का तामीला पर्याप्त माना गया। जिला उपभोक्ता फोरम के निर्णय/आदेश दिनांकित 22-07-2005 का अवलोकन किया गया एवं अपील आधार का अवलोकन किया गया।
अपीलार्थी के तरफ से लिखित बहस भी दाखिल किया गया है, जिसमें कहा गया है कि परिवादी को परिवाद दाखिल करने से पहले विपक्षी सं0-2 के द्वारा रजिस्टर्ड पत्र 3081 दिनांक 24-04-2003 को डिलेवरी की तिथि बता दी गई थी और पत्र दिनांक 18-08-2003 दिया गया था और डिलेवरी की तिथि 26-04-2003 बताया गया था। परिवादी ने केस दायर किया कि उसने रजिस्टर्ड पत्र हेड पोस्ट आफिस कानपुर को 24-04-2003 को दिया था और कोई सूचना उसके बारे में प्राप्त नहीं हुई और कहा गया है कि अपीलकर्ता ने धारा-6 पोस्ट आफिस एक्ट 1898 का हवाला दिया था, लेकिन जिला उपभोक्ता फोरम ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया और जिला उपभोक्ता फोरम ने लिख दिया कि पोस्ट आफिस अधिनियम की धारा-6 प्रस्तुत परिवाद में एप्लीकेबल नहीं है। अपीलार्थी के तरफ से मान्नीय राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग नई दिल्ली की रूलिंग दाखिल की गई है:-
(1)रिवीजन पिटीशन सं0- 2411/2006 यूनियन आफ इंडिया एण्ड अन्य बनाम एम0एल0 बोरा, निर्णय तिथि- 13-10-2010 दाखिल किया, जिसमें कहा गया है कि-
(3)
Consumer Protection Act, 1986- Sections 3 & 21 (b)- Indian Post Office Act, 1898- Section 6- Postal service- Non delivery of letter- Complainant sent two registered letters containing 532 shares but letters were not deliverd to the addressees-District Forum allowing complaint of complainant (respondent) directed petitioner/OP to pay Rs. 2,58,254 in one case and Rs.1,76,244 in another case- State Commission upheld the order passed by the District Forum- Revision filed- Held, as section 6 of the Post Office Act provides complete immunity to Government from loss or mis- delivery of postal articles- petitioner cannot be held liable especially when no specific allegation of any willful act on the part of any official has benn made- Relief granted by the Fora below set aside.
अपीलकर्ता के तरफ से यह कहा गया कि परिवादी का कोई ऐसा कथन इस सम्बन्ध में नहीं है कि जानबूझकर देरी किया गया है, या कोई छल-कपट किया गया है और किसी कर्मचारी के बारें में भी जानबूझकर कोई गलती किये जाने का आरोप नहीं लगाया गया है।
(2)राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग, नई दिल्ली के ऊषा मिश्रा बनाम चीफ पोस्ट मास्टर जनरल, निर्णीत दिनांक 30-05-2016 को भी पेश किया गया।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता को सुनने एवं उपरोक्त रूलिंग के दृष्टिगत हम यह पाते हैं कि जिला उपभोक्ता फोरम के द्वारा जो निर्णय/आदेश पारित किया गया है, वह विधि सम्मत् नहीं है और निरस्त किये जाने योग्य है। अपीलकर्ता की अपील स्वीकार होने योग्य है।
आदेश
अपीलकर्ता की अपील स्वीकार की जाती है तथा जिला उपभोक्ता फोरम, कानपुर नगर द्वारा परिवाद सं0 1276/2003 में पारित निर्णय/आदेश दिनांकित 22-07-2005 को निरस्त किया जाता है।
उभय पक्ष अपना-अपना अपीलीय व्यय भार स्वयं वहन करेंगे।
(आर0सी0 चौधरी) (गोवर्द्धन यादव)
पीठासीन सदस्य सदस्य
आर.सी.वर्मा, आशु. कोर्ट नं0-3