Uttar Pradesh

StateCommission

A/619/2015

Smt Pramila Singh - Complainant(s)

Versus

Reliance General Insurance Co. - Opp.Party(s)

Abhisek singh

08 Jul 2022

ORDER

STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP
C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010
 
First Appeal No. A/619/2015
( Date of Filing : 30 Mar 2015 )
(Arisen out of Order Dated 10/03/2015 in Case No. C/127/2013 of District Sultanpur)
 
1. Smt Pramila Singh
Sultanpur
...........Appellant(s)
Versus
1. Reliance General Insurance Co.
Delhi
...........Respondent(s)
 
BEFORE: 
 HON'BLE MR. Rajendra Singh PRESIDING MEMBER
 HON'BLE MR. Vikas Saxena JUDICIAL MEMBER
 
PRESENT:
 
Dated : 08 Jul 2022
Final Order / Judgement

(सुरक्षित)

 

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ

अपील सं0- 619/2015

 

(जिला उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, सुल्‍तानपुर द्वारा परिवाद सं0- 127/2013 में पारित निर्णय दिनांक 10.03.2015 के विरुद्ध)

 

Smt. Pramila Singh, Aged about 42 years, Wife of Kailash Singh, Resident of Sarvodaya Inter College, Road Bazar Lambhuwa, District- Sultanpur.                                                                                      

                                                                                ….....Appellant 

 

Versus

1. Reliance General Insurance Company Limited through its Chairman at Registered office 19 Reliance Centre Valchand Hirachand Marg Valard Estate, Mumbai.

2. Reliance General Insurance Company Limited through its C.M.D. Plot No. 560 Okhla Industrial Estate Phase-3 S.B.I. Bank New Delhi-20.                                                                                       

                                                                                ……Respondent

 

समक्ष:-

     माननीय श्री राजेन्‍द्र सिंह, सदस्‍य।

     माननीय श्री विकास सक्‍सेना, सदस्‍य।

   

अपीलार्थी की ओर से   : श्री अभिषेक सिंह,

                        विद्वान अधिवक्‍ता।

प्रत्‍यर्थीगण की ओर से    : श्री महेन्‍द्र कुमार मिश्रा,

                      विद्वान अधिवक्‍ता। 

 

दिनांक:- 17.08.2022

माननीय श्री विकास सक्‍सेना, सदस्‍य द्वारा उद्घोषित

 

निर्णय

1.        परिवाद सं0- 127/2013 प्रर्मिला सिंह बनाम रिलायंस जनरल इंश्‍योरेंस कं0लि0 में जिला उपभोक्‍ता आयोग, सुल्‍तानपुर द्वारा पारित निर्णय दि0 10.03.2015 के विरुद्ध यह अपील धारा 15 उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत राज्‍य आयोग के समक्ष प्रस्‍तुत की गई है, जिसके द्वारा अपीलार्थी/परिवादिनी का परिवाद समय-सीमा से बाधित होने के आधार पर खारिज किया गया है।

2.        मामले के तथ्‍य संक्षेप में इस प्रकार हैं कि अपीलार्थी/परिवादिनी ने परिवाद इस आधार पर प्रस्‍तुत किया कि अपीलार्थी/परिवादिनी एक ट्रक पंजीयन नं0- यू0पी044टी/2004 की  पंजीकृत स्‍वामिनी है। दि0 27.07.2009 से दि0 26.07.2010 की अवधि के लिए प्रश्‍नगत ट्रक का बीमा रू0 12,96,750/- के लिए कराया था। यह ट्रक दि0 29.12.2009 को जनपद कौशाम्‍बी में दुर्घटनाग्रस्‍त हो गई। दुर्घटना की सूचना प्रत्‍यर्थीगण/विपक्षीगण को दी गई। इस ट्रक की मरम्‍मत टाटा मोटर्स एण्‍ड जनरल फाइनेंस कम्‍पनी, इलाहाबाद के वर्कशॉप में करायी गई जिसमें कुल व्‍यय 4,81,359/-रू0 आया। इसके अतिरिक्‍त अन्‍य व्‍यय दुर्घटनाग्रस्‍त वाहन के परिवहन में खर्च किए गए कुल 4,91,689/-रू0 की मांग की गई। प्रत्‍यर्थीगण/विपक्षीगण ने अपीलार्थी/परिवादिनी के खाते में 3,00,000/-रू0 जमा करा दिए। इसके लिए अपीलार्थी/परिवादिनी से कोई सहमति नहीं ली गई। ज्ञात होने पर अपीलार्थी/परिवादिनी ने दि0 30.11.2010 को डिमाण्‍ड नोटिस शेष क्षतिपूर्ति की धनराशि अदा करने हेतु अपने अधिवक्‍ता के माध्‍यम से भेजी, किन्‍तु यह धनराशि अदा नहीं की गई। पुन: धनराशि परिवर्तित करते हुए एक नई विधिक नोटिस प्रेषित की गई। अपीलार्थी/परिवादिनी द्वारा शेष धनराशि 1,91,395/-रू0 की क्षतिपूर्ति मय ब्‍याज हेतु यह परिवाद प्रस्‍तुत किया गया।

3.        प्रश्‍नगत निर्णय के अवलोकन से स्‍पष्‍ट है कि प्रत्‍यर्थीगण/विपक्षीगण रिलायंस जनरल इंश्‍योरेंस कं0लि0 द्वारा एक प्रार्थना पत्र इस आशय का दिया गया कि दि0 15.09.2010 को अपीलार्थी/परिवादिनी के खाते में 3,00,000/-रू0 की अदायगी की जा चुकी है। यह परिवाद उसके 03 वर्ष बाद प्रस्‍तुत किया गया है, अत: समय-सीमा से बाधित है व पोषणीय नहीं है।

4.        अपीलार्थी/परिवादिनी की ओर से एक प्रार्थना पत्र परिवाद प्रस्‍तुत करने में हुई देरी माफ किए जाने हेतु दिया गया, जिसमें कथन किया गया था कि अपीलार्थी/परिवादिनी के घर के लोग दि0 16.10.2012 से दि0 16.03.2013 तक जेल में थे, अत: परिवाद दि0 13.07.2013 को संस्थित किया।

5.        विद्वान जिला उपभोक्‍ता आयोग द्वारा परिवाद को समय-सीमा से बाधित इस आधार पर माना गया कि अपीलार्थी/परिवादिनी ने अपने परिवाद पत्र में यह स्‍वीकार किया है कि दि0 30.11.2010 को उसने अपने अधिवक्‍ता महोदय के माध्‍यम से डिमाण्‍ड नोटिस भेजा था। अत: दि0 30.11.2010 को उसको यह जानकारी हो गई थी कि प्रत्‍यर्थीगण/विपक्षीगण ने 3,00,000/-रू0 बीमा क्‍लेम के विरुद्ध दिए हैं। इसके लगभग 03 वर्ष के उपरांत दि0 13.07.2013 को परिवाद प्रस्‍तुत किया गया है जिसका कारण यह बताया गया है कि उसके घर के पूरे सदस्‍य जेल में दि0 16.10.2012 से दि0 16.03.2013 तक निरुद्ध रहे, यह कारण पर्याप्‍त नहीं है। इस आधार पर परिवाद को समय-सीमा से बाधित मानते हुए वाद निरस्‍त किया गया।

6.        हमने अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता श्री अभिषेक सिंह तथा प्रत्‍यर्थीगण के विद्वान अधिवक्‍ता श्री महेन्‍द्र कुमार मिश्रा को सुना। प्रश्‍नगत निर्णय तथा पत्रावली पर उपलब्‍ध अभिलेखों का सम्‍यक परिशीलन किया।

7.        अपील के अंतर्गत योजित वाद वर्ष 2013 में योजित किया गया था। अत: उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के प्रावधान इस मामले पर लागू होंगे। उक्‍त अधिनियम की धारा 24A वाद योजन की समय-सीमा प्रदान करती है जिसके अनुसार वाद का कारण उत्‍पन्‍न होने के 02 वर्ष के भीतर परिवाद योजित हो जाने की समय-सीमा प्रदान की गई है एवं विद्वान जिला उपभोक्‍ता आयोग तथा अन्‍य उपभोक्‍ता आयोग को यह निर्देश प्रदान है कि वाद कारण उत्‍पन्‍न होने के 02 वर्ष उपरांत वाद पोषणीय नहीं होगा। इस धारा के परन्‍तुक में यह दिया गया है कि यदि उचित आधार दर्शाये जाते हैं तो कारण दर्शाते हुए इस समय-सीमा के उपरांत भी परिवाद लाया जा सकता है।

8.        प्रस्‍तुत मामले में 02 वर्ष के उपरांत वाद योजन का कारण यह दिया गया है कि अपीलार्थी/परिवादिनी के परिवार के पुरुष सदस्‍य जेल में थे। विद्वान जिला उपभोक्‍ता आयोग ने इस आधार को उचित नहीं माना है। वास्‍तव में यह आधार उचित नहीं है। इस सम्‍बन्‍ध में मा0 सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा कांदीमल राघवैय्या एण्‍ड कम्‍पनी बनाम नेशनल इंश्‍योरेंस कं0लि0 प्रकाशित 2010 NCJ पृष्‍ठ 65 (S.C.) में पारित निर्णय प्रसांगिक है जिसमें मा0 सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा यह निर्णीत किया गया है कि धारा 24A उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम के अनुसार 02 वर्ष के उपरांत वाद उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत ग्राह्य नहीं होगा, जब तक देरी का कारण उचित प्रकार से स्‍पष्‍ट न कर दिया जाए। अपीलार्थी/परिवादिनी ने दि0 16.10.2012 से दि0 16.03.2013 के मध्‍य परिवार के 05 पुरुष सदस्‍यों के कारागार में होने का कारण दिया है, किन्‍तु अपीलार्थी/परिवादिनी ने यह स्‍वीकार किया है कि दि0 30.11.2010 को उसने अपने अधिवक्‍ता के माध्‍यम से डिमाण्‍ड नोटिस प्रेषित किया था जिससे स्‍पष्‍ट है कि दि0 30.11.2010 से दि0 16.10.2012 अर्थात लगभग 02 वर्ष तक स्‍वयं अपीलार्थी/परिवादिनी के कथनानुसार उसके परिवार के पुरुष सदस्‍य कारागार से बाहर थे। इस बीच परिवाद प्रस्‍तुत न किए जाने का कोई कारण नहीं दर्शाया गया है। इसके उपरांत जब स्‍वयं अपीलार्थी/परिवादिनी के कथनानुसार दि0 16.03.2013 को उक्‍त सदस्‍य रिहा किए गए तब भी लगभग 04 माह तक वह परिवाद योजन में हुए देरी का कोई कारण व आधार नहीं दिया है। अत: अपीलार्थी/परिवादिनी द्वारा परिवाद प्रस्‍तुत करने में हुई देरी का जो कारण दिया गया है वह युक्ति-युक्ति व उचित प्रतीत नहीं होता है। विद्वान जिला उपभोक्‍ता आयोग ने उचित प्रकार से इस आधार को अपर्याप्‍त मानते हुए परिवाद को समय-सीमा से बाहर माना है और पोषणीयता के आधार पर खारिज किया है जो उचित है। आदेश में कोई त्रुटि प्रतीत नहीं होती है। अत: अपील के स्‍तर पर इस पीठ द्वारा आदेश में हस्‍तक्षेप की आवश्‍यकता नहीं है। तदनुसार प्रश्‍नगत निर्णय पुष्‍ट किए जाने एवं अपील निरस्‍त किए जाने योग्‍य है।                                        

आदेश

9.        अपील निरस्‍त की जाती है। प्रश्‍नगत निर्णय की पुष्टि की जाती है।  

          अपील में उभयपक्ष अपना-अपना वाद व्‍यय स्‍वयं वहन करेंगे।

          आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय व आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें। 

 

                            

   (विकास सक्‍सेना)                              (राजेन्‍द्र सिंह)           

      सदस्‍य                                      सदस्‍य 

         

निर्णय आज खुले न्‍यायालय में हस्‍ताक्षरित, दिनांकित होकर उद्घोषित किया गया।

 

 (विकास सक्‍सेना)                               (राजेन्‍द्र सिंह)           

     सदस्‍य                                      सदस्‍य     

शेर सिंह, आशु0,

कोर्ट नं0-2

 
 
[HON'BLE MR. Rajendra Singh]
PRESIDING MEMBER
 
 
[HON'BLE MR. Vikas Saxena]
JUDICIAL MEMBER
 

Consumer Court Lawyer

Best Law Firm for all your Consumer Court related cases.

Bhanu Pratap

Featured Recomended
Highly recommended!
5.0 (615)

Bhanu Pratap

Featured Recomended
Highly recommended!

Experties

Consumer Court | Cheque Bounce | Civil Cases | Criminal Cases | Matrimonial Disputes

Phone Number

7982270319

Dedicated team of best lawyers for all your legal queries. Our lawyers can help you for you Consumer Court related cases at very affordable fee.