राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।
(सुरक्षित)
अपील संख्या:-2708/2018
(जिला फोरम, एटा द्धारा परिवाद सं0-13/2013 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 01.8.2018 के विरूद्ध)
Dakshinanchal Vidyut Vitran Nigam Ltd., Railway Road District Etah, through its Executive Engineer, EUDD, Etah.
........... Appellant/ Opp. Party
Versus
Ram Khilari Misra, S/o Sri Ram Chandra Misra, R/o Nagla Khanger, R/o Shanti Nagar Road, Pota Ka Nagla, Tahsil and District-Etah.
…….. Respondent/ Complainant
समक्ष :-
मा0 न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष
अपीलार्थी के अधिवक्ता : श्री इसार हुसैन
प्रत्यर्थी के अधिवक्ता : श्री राघवेन्द्र प्रताप सिंह
दिनांक :-21-8-2019
मा0 न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष द्वारा उदघोषित
निर्णय
परिवाद संख्या-13/2013 रामखिलाडी मिश्र बनाम दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में जिला फोरम, एटा द्वारा पारित निर्णय और आदेश दिनांक 01.8.2018 के विरूद्ध यह अपील धारा-15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अन्तर्गत राज्य आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई है।
आक्षेपित निर्णय के द्वारा जिला फोरम ने परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्न आदेश पारित किया है:-
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“परिवादी का परिवाद पत्र विरूद्ध विपक्षी आंशिक रूप से निम्न प्रकार से स्वीकार किया जाता है।
विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह उसके विद्युत कनेक्शन सं0-213-29932 से सम्बन्धित भेजे गये समस्त बिल निरस्त किये जाते हैं। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि विपक्षी भविष्य में उपरोक्त विद्युत कनेक्शन के सम्बन्ध में कोई भी धनराशि वसूल नहीं कर सकेगा।
मामले की सभी परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए उभय पक्ष वाद व्यय अपना-अपना स्वयं वहन करेंगे।”
जिला फोरम के निर्णय से क्षुब्ध होकर परिवाद के विपक्षी दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड ने यह अपील प्रस्तुत की है।
अपील की सुनवाई के समय अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री इसार हुसैन और प्रत्यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री राघवेन्द्र प्रताप सिंह उपस्थित आये हैं।
मैंने उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्तागण के तर्क को सुना है और आक्षेपित निर्णय एवं आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया है।
मैंने प्रत्यर्थी/परिवादी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत लिखित तर्क का भी अवलोकन किया है।
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अपील के निर्णय हेतु संक्षिप्त सुसंगत तथ्य इस प्रकार है कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने परिवाद जिला फोरम के समक्ष अपीलार्थी/विपक्षी के विरूद्ध इस कथन के साथ प्रस्तुत किया है कि उसने अपने शान्ति नगर के आवास हेतु विद्युत कनेक्शन सं0-213-29932 शान्ति नगर रोड़ पोता का नगला एटा के पते पर काफी समय पूर्व लिया था। उसका यह कनेक्शन कई वर्षो तक चला उसके बाद वर्ष-1985 में वह अपने गॉव नगला खंगार रहने चला गया और अपने शान्ति नगर आवास के उपरोक्त कनेक्शन की समस्त बकाया धनराशि जमा करके दिनांक 17.12.1985 को विद्युत कनेक्शन कटवाकर फार्म-9 की एक फोटोप्रति प्राप्त कर ली। परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन है कि विद्युत केबिल व मीटर निकालकर अपीलार्थी/विपक्षी के कर्मचारी ले गये और लाइन पूरी तरह से डिसमेन्टल कर दी गई, उसके बाद जब वह अपने गॉव से एटा शान्ति नगर के उपरोक्त मकान पर आया तो पता चला कि उसके नाम 1,02,450.00 रू0 का विद्युत बिल आया है। तब उसने विद्युत विभाग के सम्बन्धित अधिकारियों से फोन कर व व्यक्तिगत रूप से मिलकर बातचीत की, परन्तु उसे कोई समुचित उत्तर नहीं मिला। उसके बाद उसने रजिस्टर्ड डाक से अपीलार्थी/विपक्षी को नोटिस दिनांक 03.11.2012 को भेजा, परन्तु नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया गया।
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परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन है कि एटा में उसका एक कनेक्शन सं0-0103/20968 चक्की का है, जो नियमित रूप से चल रहा है और उसके बिल का भुगतान वह नियमित रूप से कर रहा है और उसके प्रश्नगत कनेक्शन का कोई विद्युत बिल बकाया नहीं है, परन्तु अपीलार्थी/विपक्षी ने उसकी नोटिस मिलने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की है। अत: विवश होकर उसने परिवाद जिला फोरम के समक्ष प्रस्तुत किया है।
जिला फोरम के समक्ष अपीलार्थी/विपक्षी की ओर से लिखित कथन प्रस्तुत किया गया है, जिसमें कहा गया है कि उसके जिम्मा विद्युत विभाग का 1,16,019.00 रू0 दिनांक 16.4.2013 तक का बकाया है। उसका यह कहना गलत है कि उसका कनेक्शन दिनांक 17.12.1985 को समस्त बकाया धनराशि जमा करने के बाद कटाकर फार्म-9 की प्रति उसे प्राप्त करायी गयी थी और विद्युत केबिल व मीटर विद्युत कर्मचारी ले गये थे तथा पूरी लाइन डिसमेन्टल कर दी गई थी। लिखित कथन में अपीलार्थी/विपक्षी की ओर से कहा गया है कि अपीलार्थी/विपक्षी के कर्मचारी से मिलकर प्रत्यर्थी/परिवादी ने फार्म-9 की फोटोप्रति बनवा ली है जिसकी कोई जिम्मेदारी विपक्षी अधिशाषी अभियंता की नहीं है, क्योंकि यदि उसका उपरोक्त कनेक्शन सं0-213/29932 पूर्ण धनराशि जमा करने के बाद काटा गया होता और कनेक्शन
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परमानेंट तौर पर डिसमेन्टल किया गया होता तो उस स्थित में परिवादी द्वारा पी0डी0 फीस 150.00 रू0 विभाग में जमा की गई होती। बिना पी0डी0 फीस के कोई भी कनेक्शन पी0डी0 नहीं किया जा सकता है।
लिखित कथन में अपीलार्थी/विपक्षी की ओर से कहा गया है कि प्रत्यर्थी/परिवादी के विद्युत कनेक्शन सं0-213/29932 का सितम्बर, 2012 तक का बिल दिनांक 14.9.2012 को जारी किया गया है, उस समय अवशेष धनराशि 1,02,450.00 रू0 थी, जो दिनांक 16.4.2013 तक 1,16,019.00 रू0 हो गयी है। लिखित कथन में अपीलार्थी विपक्षी की ओर से कहा गया है कि प्रत्यर्थी परिवादी ने दूसरा कनेक्शन चक्की स्पेलर हेतु लिया है, जो कामर्शियल कनेक्शन है और उसका विवाद वर्तमान परिवाद में नहीं है।
लिखित कथन में अपीलार्थी/विपक्षी की ओर से कहा गया है कि परिवाद सुनने का अधिकार जिला फोरम को नहीं है और परिवाद कालबाधित है।
जिला फोरम ने उभय पक्ष के अभिकथन और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के उपरांत यह माना है कि वर्ष-1985 के बाद और सितम्बर, 2012 के पहले अपीलार्थी विपक्षी के विभाग द्वारा प्रत्यर्थी/परिवादी को कोई विद्युत बिल जारी नहीं किया गया है।
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जिला फोरम ने अपने निर्णय में यह भी उल्लेख किया है कि परिवादी ने फार्म-9 के बनने तक देय धनराशि जमा करना कहा है और विपक्षी ने ही यह नोट अंकित किया है कि उपभोक्ता का मीटर बन्द था अलमारी में तथा केबिल मीटर के साथ जुडी थी। मीटर खराब होने के कारण बन्द था। मीटर उतारकर परीक्षण के लिए भेजा गया और केबिल उपभोक्ता को दी गई। अत: जिला फोरम ने यह माना है कि परिवादी ने सिद्ध कर दिया है कि उसके जिम्मा कोई देय धनराशि बकाया नहीं है। अत: जिला फोरम ने यह निष्कर्ष निकाला है कि विद्युत कनेक्शन काटने के बाद फार्म-9 तैयार होने के उपरांत विद्युत बिल भेजा जाना सेवा में कमी है। अत: जिला फोरम ने परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आदेश पारित किया है, जो ऊपर अंकित है।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि जिला फोरम द्वारा पारित निर्णय और आदेश तथ्य और विधि के विरूद्ध है। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने अपने प्रश्नगत कनेक्शन को अस्थायी रूप से विच्छेदित करने हेतु निर्धारित शुल्क 150.00 रू0 जमा नहीं किया है। अत: यह स्पष्ट है कि उसके कनेक्शन का स्थायी विच्छेदन नहीं किया गया है।
अपीलार्थी/विपक्षी ने अपने लिखित कथन में प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा प्रस्तुत फार्म-9 की फोटोप्रति को कूटरचित नहीं कहा है और
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यह कहा है कि अपीलार्थी/विपक्षी के कर्मचारी से मिलकर प्रत्यर्थी/परिवादी ने फार्म-9 की फोटोप्रति बनवा ली है। अत: ऐसी स्थिति में प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा प्रस्तुत फार्म-9 को कूटरचित नहीं कहा जा सकता है। प्रत्यर्थी/परिवादी ने जो फार्म-9 की फोटोप्रति प्रस्तुत की है उससे यह स्पष्ट है कि यह अभिलेख उसे वर्ष-1985 में दिया गया है और वर्ष-1985 में प्रत्यर्थी/परिवादी का मीटर हटाया गया है। पुन: प्रत्यर्थी/परिवादी को मीटर लगाये जाने का कोई साक्ष्य अपीलार्थी/विपक्षी प्रस्तुत नहीं कर सका है। इसके साथ ही उल्लेखनीय है कि अपीलार्थी/विपक्षी ने वर्ष-1985 के बाद और दिनांक 14.9.2012 के प्रश्नगत बिल के पहले की अवधि में कोई विद्युत बिल प्रत्यर्थी/परिवादी को जारी किया जाना दर्शित नहीं कर सका है। अत: सम्पूर्ण तथ्यों, साक्ष्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद मैं इस मत का हॅू कि जिला फोरम ने जो निष्कर्ष अंकित किया है वह तथ्य और साक्ष्य के अनुकूल है। जिला फोरम के निर्णय में हस्तक्षेप हेतु उचित आधार नहीं है। अत: अपील अस्वीकार की जाती है।
अपील में उभय पक्ष अपना अपना वाद व्यय स्वयं बहन करेगें।
(न्यायमूर्ति अख्तर हुसैन खान)
अध्यक्ष
हरीश आशु.,
कोर्ट सं0-1