Uttar Pradesh

StateCommission

A/2014/705

Suresh Chandra Jaiswal - Complainant(s)

Versus

Post Office - Opp.Party(s)

R K Gupta

15 Oct 2018

ORDER

STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP
C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010
 
First Appeal No. A/2014/705
( Date of Filing : 07 Apr 2014 )
(Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission)
 
1. Suresh Chandra Jaiswal
a
...........Appellant(s)
Versus
1. Post Office
a
...........Respondent(s)
 
BEFORE: 
 HON'BLE MR. Raj Kamal Gupta PRESIDING MEMBER
 HON'BLE MR. Mahesh Chand MEMBER
 
For the Appellant:
For the Respondent:
Dated : 15 Oct 2018
Final Order / Judgement

सुरक्षित

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0 लखनऊ।

अपील संख्‍या : 705/2014

(जिला उपभोक्‍ता फोरम, इलाहाबाद द्वारा परिवाद संख्‍या-681/2007 में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 10-03-2014 के विरूद्ध)

  1. सुरेश चन्‍द्र जायसवाल पुत्र स्‍व0 छोटे लाल जायसवाल।
  2. श्रीमती राज कुमारी जायसवाल पत्‍नी श्री सुरेश चन्‍द्र जायसवाल।

समस्‍त निवासीगण-47/7, मास्‍टर जहरूल हसन रोड, कटरा, इलाहाबाद।

  1.  
  2.  
  3.  

समस्‍त निवासीगण-402/11, तिलिया कोट, नगर पालिका परिषद, रायबरेली।

                                            ...अपीलार्थी/परिवादीगण

बनाम्

  1. सीनियर सुपरीटेन्‍डेन्‍ट आफ पोस्‍ट आफिस, इलाहाबाद डिवीजन, निकट मुख्‍य डाकघर, इलाहाबाद।
  2. सब पोस्‍ट मास्‍टर, के0जी0 मार्ग पोस्‍ट आफिस, इलाहाबाद।
  3.                                        

अपीलार्थी  की ओर से उपस्थित-          श्री आर0 के0 गुप्‍ता।

प्रत्‍यर्थी की ओर से उपस्थित-            डा0 उदय वीर सिंह।

समक्ष  :-

  1. मा0 श्री राज कमल गुप्‍ता,         पीठासीन सदस्‍य।
  2. मा0 श्री महेश चन्‍द,              सदस्‍य

दिनांक : 28-11-2018

मा0 श्री महेश चन्‍द, सदस्‍य द्वारा उद्घोषित निर्णय

परिवाद संख्‍या-681/2007 सुरेश चन्‍द्र जायसवाल व अन्‍य बनाम् सीनियर सुपरिटेन्‍डेन्‍ट आफ पोस्‍ट आफिस, इलाहाबाद डिवीजन व एक अन्‍य  

 

2

में जिला उपभोक्‍ता फोरम, इलाहाबाद द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय एवं आदेश दिनां‍क 10-03-2014 के विरूद्ध यह अपील उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम की धारा-15 के अन्‍तर्गत इस आयोग के समक्ष प्रस्‍तुत की गई है।

इस प्रकरण में विवाद के संक्षिप्‍त सुसंगत तथ्‍य इस प्रकार है कि परिवादी संख्‍या-1 व 2 द्वारा विपक्षी संख्‍या-2 से रू0 24,000/- के किसान विकास पत्र दिनांक 17-01-1997 को क्रय किये गये थे जिनकी परिपक्‍वता ति‍थि दिनांक 17-02-2002 थी। इस तरह परिवादी संख्‍या-1 व 3 द्वारा विपक्षी संख्‍या-2  से रू0 40,000/- के किसान विकास पत्रभी उक्‍त तिथिको क्रय किये गये और जिनकी परिपक्‍वता तिथि भी दिनांक 17-02-2002 थी। परिवादी संख्‍या-1 उक्‍त किसान विकास पत्र का  भुगतान लेने के लिए विपक्षी संख्‍या-2 के पास गया तो उन्‍होंने भुगतान करने से मना कर दिया जिसकी शिकायत परिवादी ने विपक्षीगण से की, लेकिन विपक्षीगण द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गयी। परिवादी ने सिविल प्रकीर्ण रिट याचिका संख्‍या-20322/2004 मा0 उच्‍च न्‍यायालय में प्रस्‍तुत की, जिसकी सुनवाई के बाद मा0 न्‍यायालय द्वारा पारित आदेश में कहा गया कि यदि किसान विकास पत्र असली है तो उनका भुगतान किया जाए। इसके बावजूद भी विपक्षीगण द्वारा भुगतान नहीं किया गया। परिवादी ने मानहानि याचिका संख्‍या-2481/2004 मा0 उच्‍च न्‍यायालय में प्रस्‍तुत की जिस पर मा0 उच्‍च न्‍यायालय द्वारा कहा गया कि मानहानि याचिका के अन्‍तर्गत भुगतान नहीं कराया जा सकता है और इसके लिए परिवादीगण सिविल कोर्ट या फोरम के समक्ष अपना वाद प्रस्‍तुत करे। परिवादीगण को विपक्षीगण द्वारा भुगतान नहीं किया गया है जो कि विपक्षीगण के स्‍तर पर सेवा में कमी है। इसलिए क्षुब्‍ध होकर परिवादीगण ने परिवाद संख्‍या-681/2007 जिला फोरम, इलाहाबाद के समक्ष योजित करते हुए निम्‍न अनुतोष दिलाये जाने की याचना की है:-

‘’परिवादीगण को किसान विकास पत्रों की कुल परिपक्‍वता धनराशि रू0 1,28,000/- दिनांक 17-07-2002 से 12 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्‍याज सहित दिलायी जाए।इसके अतिरिक्‍त परिवादी को विपक्षीगण से रू0 50,000/- मानसिक,शारीरिक क्षतिपूर्ति व रू0 11000/- वाद व्‍यय भी दिलाया जाए।‘’

 

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विपक्षीगण की ओर से प्रतिवाद पत्र दाखिल किया गया जिसमें परिवाद के अभिकथनों का प्रतिवाद करते हुए कथन किया गया कि किसान विकास पत्र परिवादीगण के नाम निर्गत नहीं किये गये है और कहा गया कि किसान विकास पत्रों के चोरी होने के संबंध में प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करायी गयी थी। विपक्षीगण के कर्मचारियों द्वारा फ्राड नहीं किया गया बल्कि फ्राड व चोरी अन्‍य व्‍यक्ति द्वारा एजेंट से मिलकर किया गया है। परिवादीगण द्वारा  विपक्षीगण से किसान विकास पत्र नहीं खरीदे गये है। अत: विपक्षीगण के स्‍तर पर किसी प्रकार की कोई सेवा में कमी नहीं की गयी है।

जिला फोरम ने पक्षकारों द्वारा प्रस्‍तुत किये गये साक्ष्‍यों का परिशीलन करने तथा उनके तर्कों को सुनने के बाद आक्षेपित निर्णय दिनांक 10-03-2014 के द्वारा परिवादी का परिवाद पोषणीय न होने के आधार पर निरस्‍त कर दिया है।

उपरोक्‍त आक्षेपित आदेश से क्षुब्‍ध होकर यह अपील योजित की गयी है।

अपील की सुनवाई के समय अपीलार्थी की ओर से विद्धान अधिवक्‍ता श्री आर0 के0 गुप्‍ता उपस्थित हुए। प्रत्‍यर्थी की ओर से विद्धान अधिवक्‍ता डा0 उदय वीर सिंह उपस्थित हुए।

पीठ द्वारा उभयपक्षों के विद्धान अधिवक्‍ताओं के तर्कों को सुना गया तथा आक्षेपित निर्णय और आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया गया।

इस प्रकरण में मुख्‍य विवाद इस बिन्‍दु पर है कि रू0 24,000/- के प्रश्‍नगत किसान विकास पत्र परिवाद के परिवादी संख्‍या-1 व 2 द्वारा तथा रू0 40,000/- की धनराशि के किसान विकास पत्र परिवादी संख्‍या-1 व 3 द्वारा दिनांक 17-01-1997 को कस्‍तूरबा गांधी, उप डाकघर से क्रय किये गये थे अथवा नहीं। प्रत्‍यर्थी/विपक्षी का यह अभिकथन है कि दिनांक 17-01-1997 को उक्‍त कथित किसान विकास पत्र, इलाहाबाद कचहरी डाकघर से कस्‍तूरबा बांधी मार्ग स्थित उपडाकघर को भेजे ही नहीं गये थे बल्कि उक्‍त किसान विकास पत्र कस्‍तूरबा गांधी मार्ग उपडाकघर में दिनांक 31-01-1997 को प्राप्‍त

 

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हुए थे। अत: दिनांक 17-01-1997 को कस्‍तूरबा गांधी मार्ग, उपडाकघर से उपरोक्‍त प्रश्‍नगत किसान विकास पत्र निर्गत किये जाने का प्रश्‍न ही नहीं उठता। यहॉं यह तथ्‍य निर्विवाद रूप से स्‍वीकार्य है कि उक्‍त किसान विकास पत्र  असली है किन्‍तु दिनांक 17-01-1997 को कस्‍तूरबा गांधी मार्ग स्थित उप डाकघर से उनका निर्गत किया जाना संदिग्‍ध है। प्रत्‍यर्थी/विपक्षी के अनुसार उक्‍त किसान विकास पत्र के चोरी होने अथवा धोखा-धड़ी किये जाने से संबंधित पुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करायी गयी थी और प्रकरण जटिल रूप से विवादित है। अपीलार्थी ने भी उक्‍त किसान विकास पत्रों के क्रय किये जाने के लिए जमा की गयी धनराशि की रसीद भी प्रस्‍तुत नहीं की है।

     अपीलार्थी के विद्धान अधिवक्‍ता ने तर्क प्रस्‍तुत करते हुए मा0 राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा Revision Petition No. 3034 of 2005,  Union of India & Anr. Vs. Shri Nareshbhai Rayachandbhai Prajapati & Anr.,2006 (2) CPR 7 (NC)., Revision Petition No.1720 of 2001 Union of India through PMG Agra & Ors. Vs. Anil Kumar Garg & Anr. 2002 (2) CPR 76 (NC)., Revision Petition No. 2613 of 2005  Senior Superintendent of Post Office Vs. Smt. Kanti Mishra & Anr तथा Revision Petition No. 3035 of 2005 Union of India & Anr. Vs. Smt Lilaben Babubhai Prajapati & Anr. 2006 (2) CPR 12 (NC) के दृटान्‍त प्रस्‍तुत किये । इस सभी दृष्‍टान्‍तों को विद्धान जिला फोरम के समक्ष भी प्रस्‍तुत किया गया था जिन पर विचारोपरान्‍त विद्धान जिला फोरम ने प्रश्‍नगत आदेश पारित किया है।

सम्‍यक विचारोपरान्‍त यह पीठ इस मत की है कि इस प्रकरण के तथ्‍य एवं परिस्थितियॉं उपरोक्‍त उल्लिखित दृष्‍टान्‍तों के तथ्‍यों एवं परिस्थितियों से भिन्‍न है। इसके अतिरिक्‍त इस प्रकरण में एक आपराधिक एवं जटिल बिन्‍दु सन्निहित है, जिसमें साक्ष्‍यों के विस्‍तृत परीक्षण तथा प्रति परीक्षण की आवश्‍यकता है जो कि सरसरी कार्यवाही में जिला फोरम द्वारा निस्‍तारित

 

 

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किया जाना सम्‍भव नहीं है। विद्धान जिला फोरम ने प्रश्‍नगत आदेश पारित कर कोई त्रुटि नहीं की है।

अपीलार्थी की अपील में कोई बल नहीं है और अपील निरस्‍त होने योग्‍य है।

आदेश

अपील निरस्‍त की जाती है। प्रश्‍नगत आदेश की पुष्टि की जाती है। अपीलार्थी/परिवादी सक्षम न्‍यायालय में अपना वाद प्रस्‍तुत करने के लिए स्‍वतंत्र है। उभयपक्ष अपना-अपना वाद व्‍यय स्‍वयं वहन करेंगे।

निर्णय की प्रमाणित प्रति संबंधित पक्षकारों को नियमानुसार उपलब्‍ध करायी जाए।

 

(राज कमल गुप्‍ता)                                 (महेश चन्‍द)

 पीठासीन सदस्‍य                                     सदस्‍य

कोर्ट नं0-3 प्रदीप मिश्रा, आशु0

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
 
[HON'BLE MR. Raj Kamal Gupta]
PRESIDING MEMBER
 
[HON'BLE MR. Mahesh Chand]
MEMBER

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