राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।
सुरक्षित
अपील सं0-१६४८/२०१४
(जिला फोरम (द्वितीय), लखनऊ द्वारा परिवाद सं0-१२२२/२००९ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक १६-०८-२०१४ के विरूद्ध)
लक्ष्य जनचेतना समिति द्वारा सन्तोष कुमार शुक्ला (अध्यक्ष) निवासी ३१५/१८, बाग महानारायण चौक, लखनऊ।
..................... अपीलार्थी/परिवादी।
बनाम्
मुख्य डाकपाल, चौक प्रधान डाकघर, लखनऊ।
..................... प्रत्यर्थी/विपक्षी।
समक्ष:-
१- मा0 श्री उदय शंकर अवस्थी, पीठासीन सदस्य।
२- मा0 श्री महेश चन्द, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित :- श्री सन्तोष कुमार शुक्ला विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित :- डॉ0 उदयवीर सिंह विद्वान अधिवक्ता।
दिनांक : २९-०९-२०१६.
मा0 श्री उदय शंकर अवस्थी, पीठासीन सदस्य द्वारा उदघोषित
निर्णय
प्रस्तुत अपील, जिला फोरम (द्वितीय), लखनऊ द्वारा परिवाद सं0-१२२२/२००९ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक १६-०८-२०१४ के विरूद्ध योजित की गयी है।
संक्षेप में तथ्य इस प्रकार हैं कि अपीलार्थी/परिवादी के कथनानुसार वह एक समाज सेवी संस्था है, जिसका मुख्य उद्देश्य समाज के सभी वर्गों तक स्वास्थ्य, शिक्षा रोजगार प्रशिक्षण, जन जागरूकता, परिवाद परामर्श, विधिक परामर्श उपलब्ध कराना है। संस्था द्वारा जन हित में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम प्रति वर्ष संचालित किए जाते हैं। दिनांक १८-०५-२००९ को संस्था की आयोजित बैठक के उपरान्त सर्व सम्मति से चौक डाकघर से पूरे वर्ष की अवधि के लिए पोस्ट बाक्स संख्या आबंटन कराने का निर्णय लिया गया, जिससे निर्बाध रूप से पत्रों की प्राप्ति सुगम हो सके। तद्नुसार अपीलार्थी/परिवादी ने पोस्ट बाक्स आबंटन हेतु चोक डाकघर में आवेदन प्रेषित किया। पोस्ट बाक्स आबंटन से पूर्व विभागीय जन सम्पर्क निरीक्षक द्वारा संस्था के कार्यालय
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का निरीक्षण किया गया और भौतिक सत्यापन के साथ-साथ संस्था के रजिस्ट्रेशन प्रमाण पत्र का अवलोकन किया तथा परिवादी के आवेदन पत्र को प्रमाणित करते हुए अपने हस्ताक्षर सहित अनुमति प्रदान कर दी। तदोपरान्त सम्बन्धित लिपिक के निर्देशानुसार दिनांक ०२-०७-२००९ को परिवादी ने आबंटित किए गए पोस्ट बाक्स नम्बर-७ के लिए निर्धारित वार्षिक शुल्क राशि २१०/- रू० नकद काउण्टर पर जमा कर दिये और प्राप्त मूल रसीद लिपिक के निर्देशानुसार उन्हें सौंप दी। जानकारी करने पर उपरोक्त लिपिक ने बताया कि मूल रसीद की आवश्यकता मुख्य डाकपाल के समक्ष आबंटन पत्र हस्ताक्षर कराने के समय प्रस्तुत करनी होगी एवं हस्ताक्षर के बाद आबंटन पत्र, मूल रसीद एवं पोस्ट बाक्स की चाभियॉं एक साथ परिवादी को सौंप दी जाऐंगीं, जबकि वस्तुत: पोस्ट बाक्स आबंटित हो जाने के बाद दिनांक २४-०७-२००९ तक बार-बार सम्पर्क करने पर भी चौक डाकघर से कोई सूचना अथवा उपरोक्त सामग्री परिवादी को नहीं सौंपी गयी। संस्था के कार्य क्षेत्र में विस्तार का सर्व सम्मति से दिनांक १८-०५-२००९ को आयोजित बैठक में निर्णय लिया एवं जनसेवा कार्य हेतु आवश्यक कर्मियों की व्यवस्था के लिए पद विज्ञापित करके उपयुक्त अभ्यर्थियों का चयन करके नियुक्त करने का निर्णय लिया। दिनांक १८-०५-२००९ को आयोजित बैठक के दौरान् सर्व सम्मति से संस्था के अध्यक्ष श्री सन्तोष कुमार शुक्ला पुत्र श्री कन्हैया लाल शुक्ला निवासी ३१५/१८, बाग महानारायण, चौक लख्नऊ के निवास के पते को पत्र प्राप्ति/रजिस्ट्री पावती की सुगमता के कारण विज्ञापित पते के रूप में दर्ज कराने का निर्णय लिया गया व पूरी चयन सम्बन्धी कार्यवाही हेतु श्री सुधीर कुमार शुक्ला एवं श्री अभिषेक वर्मा की संयुक्त कमेटी बनाकर सम्पन्न करने का निर्णय लिया गया। इस सन्दर्भ में रोजगार एक्सप्रेस में दिनांक१३-०७-२००९ को विज्ञापन भी प्रकाशित कराया। दिनांक १३-०७-२००९ को आयोजित बैठक में चयन परीक्षा में आने वाले व्यय का आंकलन व आवश्यक धनराशि का एस्टीमेट प्रस्तुत करके अनुमोदन पश्चात् अग्रिम के रूप में फर्म नीलकंठ टेण्ट हाउस को २६,५००/- रू० का भुगतान किया गया। विज्ञापन के प्रत्युत्तर में दिनांक २०-०७-२००९ से लगातार आवेदन पत्र रजिस्ट्री के माध्यम से संस्था के विज्ञापित शाखा कार्यालय ३१५/१८ बाग महानारायण चौक लखनऊ
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के पते पर आने लगे जिसकी पावती विभागीय रजिस्ट्री लिस्ट में संस्था के पदाधिकारी द्वारा हस्ताक्षर व संस्था की मुहर सहित दर्ज की गई। दिनांक २४-०७-२००९ को आने वाले पत्रों में से दो पत्र के पैकेट खुले पाए, जिस पर आपत्ति करने पर स्थानीय पोस्टमेन ने बताया कि मुख्य डाकपाल के निर्देश पर ही यह पैकेट खोलकर आने वाली सामग्री की फोटोकापी कराई गई है। इस घटना की पूर्व सूचना न देने तथा ऐसा करने का कारण पूछने पर पोस्टमेन ने बताया कि मुख्या डाकपाल से मिलकर बात कर लें तभी और पत्र प्राप्त करें। ऐसा कहते हुए पोस्टमेन ने उसके अतिरिक्त अन्य आये हुए पत्र की भी डिलीवरी नहीं दी और नाराजगी व्यक्त करते हुए वापस चले गये। संस्था के अधिकृत प्रतिनिधि द्वारा सम्पर्क करने पर मुख्य डाकपाल ने संस्था द्वारा विज्ञापित पद के सम्बन्ध में शंका व्यक्त की, जिसके औचित्य का आधार व प्रमाण उन्हें दिखा या गया, किन्तु वह इससे सन्तुष्ट नहीं हुए बल्कि पुलिस में सूचना देने का मय पैदा करने का प्रयास करने लगे जिस पर परिवादी के पत्र वितरण पुन: प्रारम्भ करने, पोस्ट बाक्स की चाभी सौंपने एवं बिना सूचना दिये पत्र खोलने पर स्पष्टीकरण देने के बाद पुलिस कम्पलेण्ट करने की बात कहने पर मुख्य डाकपाल उग्र हो गये और अपशब्दों का प्रयाग करते हुए कार्यालय कर्मियों द्वारा पिटवाने की धमकी दी और संस्था को बदनाम करके अस्तित्व खत्म करने की धमकी देते हुए कार्यालय से बलपूर्वक निकाल दिया। तदोपरान्त पत्रों का वितरण जारी रखने हेतु पत्र अपीलार्थी संस्था द्वारा प्रेषित किया गया, किन्तु पत्र का कोई उत्तर चौक डाकघर द्वारा नहीं दिया गया। निराश होकर एक शिकायत विभागीय उच्चाधिकारी चीफ पोस्ट मास्टर जनरल, लखनऊ के कार्यालय को भी दिनांक ०६-०८-२००९ को प्रेषित की, किन्तु उसका भी कोई उत्तर संस्था को प्राप्त नहीं हुआ। दिनांक २४-०७-२००९ से आने वाले समस्त पत्रों एवं आवेदनों को संस्था को नहीं दिया गया, बल्कि संस्था को बदनाम करने और आवेदकों को भ्रमित करने के लिए झूठी टिप्पणी ‘’ फर्म नहीं है, वापस ‘’ लिखकर प्रेषक को वापस कर दिए गये। अत: अपीलार्थी/परिवादी द्वारा विद्वन जिला मंच के समक्ष निम्नलिखित अनुतोष प्रदान करने हेतु परिवाद योजित किया गया :-
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१. प्रार्थी संस्था के लिए आने वाले पत्रों को तत्काल वितरण प्रारम्भ करने का आदेश दिया जाए जिससे विभाग मनमानी न कर सके।
२. प्रार्थी के पक्ष में आने वाले समस्त आवेदन पत्रों, जो वापस किए गये है, के पते का विवरण प्रार्थी को उपलब्ध कराया जाए, जिससे प्रार्थी उन सभी को वस्तुस्थिति से अवगत करा सके एवं संस्था के लिए उत्पन्न होने वाले भ्रम को दूर कर सके।
३. प्रार्थी द्वारा चयन प्रक्रिया के दौरान् होने वाले अब तक किए गये कुल व्यय ३५,०००/- रू० की प्रतिपूर्ति विपक्षी विभाग से कराई जाय, जिससे विभागीय अधिकारियों के दुष्कृत्यों का दण्ड प्रार्थी को न भोगना पड़े और अनावश्यक होने वाली आर्थिक क्षति से बच सके।
४. परिवाद दायर करने के मद में व्यय की जाने वाली धनराशि दिलायी जाये।
५. चौक डाकघर द्वारा प्रार्थी संस्था को अविलम्ब आबंटित किए गए पोस्ट बॉक्स का उपयोग करने के लिए अधिकार पत्र, चाभियॉं एवं जमा राशि की रसीद उपलब्ध कराई जाय, जिससे जमा राशि का सदुपयोग हो सके एवं संस्था को पत्र प्राप्ति में सुगमता हो सके।
६. चोफ पोस्ट मास्टर जनरल, लखनऊ एवं मुख्य डाकपाल चौक को यह निर्देश दिया जाए कि संस्था के पक्ष में आने वाले सभी प्रकार के सामान्य व रजिस्टर्ड पत्रों को पत्र में लिखे पते पर पहुँचाने की व्यवस्था की जाए।
प्रत्यर्थी/विपक्षी ने परिवाद के अभिकथनों को अस्वीकार करते हुए जिला मंच के समक्ष प्रतिवाद पत्र प्रेषित किया। प्रत्यर्थी/विपक्षी के कथनानुसार अपीलार्थी/परिवादी द्वारा पोस्ट बाक्स आबंटन हेतु कोई धनराशि जमा नहीं की गयी। प्रत्यर्थी ने परिवादी संस्था द्वारा पोस्ट बाक्स आबंटन हेतु प्रार्थना पत्र प्रेषित किऐ जाने के तथ्य को स्वीकार किया, किन्तु प्रत्यर्थी के कथनानुसार परिवाद पत्र के तथ्यों के सत्यापन हेतु जन सम्पर्क निरीक्षक ने परिवादी समिति के कार्यालय का निरीक्षण किया तथा यह पाया कि प्रतिवाद पत्र में उल्लिखित पते पर परिवादी का कोई कार्यालय नहीं है। आवेदन पत्र श्री सन्तोष कुमार शुक्ला अध्यक्ष के नाम से प्रेषित किए गये थे, किन्तु दिए गये पते पर समिति
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का कोई बोर्ड नहीं था। जन सम्पर्क निरीक्षक ने इस तथ्य से श्री सन्तोष कुमार शुक्ला को, जब वह पोस्ट आफिस आए थे, तब अवगत कराया था। उनसे समिति के अध्यक्ष होने के सन्दर्भ में प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने हेतु कहा गया था। ऐसी परिस्थिति में अपीलार्थी संस्था द्वारा समस्त औपचारिकताऐं पूर्ण न किए जाने के कारण पोस्ट बाक्स आबंटित नहीं किया गया। प्रत्यर्थी का यह भी कथन है कि गलत पता होने के कारण पत्र वितरित नहीं किए जा सके।
विद्वान जिला मंच द्वारा यह निर्णीत किया गया कि अपीलार्थी/परिवादी को पोस्ट बाक्स नं0-७ आबंटित किया जाना तथा इस सन्दर्भ में २१०/- रू० शुल्क प्रत्यर्थी पोस्ट आफिस में जमा किए जाने का तथ्य प्रमाणित नहीं है। तद्नुसार अपीलार्थी/परिवादी का परिवाद प्रश्नगत निर्णय द्वारा निरस्त कर दिया गया।
इस निर्णय से क्षुब्ध होकर यह अपील योजित की गयी।
हमने अपीलार्थी/परिवादी के विद्वान अधिवक्ता श्री सन्तोष कुमार शुक्ला एवं प्रत्यर्थी/विपक्षी डाक विभाग के विद्वान अधिवक्ता डॉ0 उदय वीर सिंह के तर्क सुने तथा अभिलेखों का अवलोकन किया।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि विद्वान जिला मंच ने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य एवं पक्षकारों के अभिकथनों का उचित परिशीलन न करते हुए प्रश्नगत निर्णय पारित किया है। अपीलार्थी की ओर से यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि अपीलार्थी के पक्ष में प्रत्यर्थी द्वारा पोस्ट बाक्स सं0-७ आबंटित किया गया था तथा इस प्रयोजन हेतु २१०/- रू० अपीलार्थी/परिवादी द्वारा अदा किया गया था। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता ने इस सन्दर्भ में अपील के साथ संलग्नक-४ पृष्ठ सं0-४९ की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया तथा यह तर्क प्रस्तुत किया कि इस अभिलेख में अंकित P B 7/21-03-2010 स्वत: ही आबंटन को प्रमाणित करता है। उनके द्वारा यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि जन सम्पर्क निरीक्षक द्वारा झूँठी भौतिक सत्यापन रिपोर्ट प्रेषित की गयी, जबकि संस्था के कार्यालय की वास्तविक स्थिति के सन्दर्भ में विश्वसनीय साक्ष्य जिला मंच के समक्ष प्रेषित की गयी थी। प्रत्यर्थी/विपक्षी
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को यह अधिकार नहीं है कि वह निराधार तथ्यों के आधार पर पोस्ट बाक्स आबंटन अस्वीकार करे और अवैध रूप से अपीलार्थी संस्था को प्रेषित पत्र भ्रामक टिप्पणियों के आधार पर उसे वितरित नहीं करे।
प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि जिला प्रशासन, पुलिस तथा प्रत्यर्थी विभाग की जानकारी में ऐसी सूचना प्राप्त हुई थी कि फर्जी फर्मों द्वारा पोस्ट बाक्स आबंटन हेतु आवेदन पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं तथा जानकारी करने पर यह तथ्य प्रकाश में आया कि झूठे पते के आधार पर कुछ फर्म पोस्ट बाक्स आबंटन प्राप्त करने में सफल हुईं, जिसका दुरूपयोग करते हुए उन्होंने बेरोजगार युवकों से बैंक ड्राफ्ट मंगाए तथा उनका आहरण किया गया। अत: विभाग के उच्च अधिकारियों द्वारा यह निर्देश जारी किया गया कि सतर्कतापूर्वक पोस्ट बाक्स का आबंटन किया जाय। अपीलार्थी/परिवादी द्वारा आवेदन पत्र में उल्लिखित पते का सत्यापन जन सम्पर्क निरीक्षक द्वारा किया गया। जन सम्पर्क निरीक्षक ने अपीलार्थी/परिवादी के कार्यालय का निरीक्षण किया तथा निरीक्षण के मध्य उन्होंने यह पाया कि अपीलार्थी द्वारा दर्शित पते पर संस्था का कोई कार्यालय स्थित नहीं है। इस सन्दर्भ में जन सम्पर्क निरीक्षक द्वारा प्रेषित आख्या कागज सं0-४४ व ४५ की ओर अधिवक्ता प्रत्यर्थी ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया, जिसके अवलोकन से प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता के उपरोक्त कथन की पुष्टि हो रही है। प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि जन सम्पर्क निरीक्षक की आख्या के आलोक में अपीलार्थी/परिवादी को कोई पोस्ट बाक्स आबंटित नहीं किया गया। प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क भी प्रस्तुत कियागया कि पोस्ट बाक्स आबंटन हेतु कोई धनराशि अपीलार्थी/परिवादी द्वारा विभाग के कार्यालय में जमा नहीं की गयी। उनके द्वारा यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि चूँकि अपीलार्थी/परिवादी को कोई पोस्ट बाक्स आबंटित नहीं किया गया और न ही कोई शुल्क उससे प्राप्त किया गया, अत: अपीलार्थी को उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं माना जा सकता।
प्रस्तुत मामले में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या अपीलार्थी/परिवादी द्वारा पोस्ट बॉक्स आबंटन हेतु कोई धनराशि प्रत्यर्थी के कार्यालय में जमा की गयी एवं क्या उसे
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कोई पोस्ट बाक्स आबंटित किया गया ?
अपीलार्थी/परिवादी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा सन्दर्भित अपील के साथ संलग्न पृष्ठ सं0-४९ में कथित रूप से अंकित शब्द P B -7 अस्पष्ट है। साथ ही मात्र इस पृष्ठांकन के आधार पर यह प्रमाणित नहीं माना जा सकता कि वस्तुत: पोस्ट बाक्स सं0-७ अपीलार्थी/परिवादी को आबंटित किया गया। प्रश्नगत निर्णय में विद्वान जिला मंच द्वारा यह निर्णीत किया गया है कि पोस्ट बाक्स आबंटन हेतु २१०/- रू० अपीलार्थी/परिवादी द्वारा प्रत्यर्थी/विपक्षी के कार्यालय में जमा किये जाने के सन्दर्भ में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की गयी है और न ही पोस्ट बाक्स सं0-७ आबंटित किए जाने के सन्दर्भ में कोई साक्ष्य अपीलार्थी/परिवादी द्वारा प्रस्तुत की गयी है। विद्वान जिला मंच का यह निष्कर्ष हमारे विचार से त्रुटिपूर्ण नहीं है, क्योंकि अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा इस सन्दर्भ में अपील के साथ संलग्न पृष्ठ सं0-४९ के अतिरिक्त अन्य कोई साक्ष्य जिला मंच के समक्ष दाखिल किया जाना नहीं बताया गया। जैसा कि ऊपर वर्णित किया जा चुका है कि मात्र इस अभिलेख के आधार पर यह स्वत: प्रमाणित नहीं माना जा सकता कि वस्तुत: पोस्ट बाक्स सं0-७ अपीलार्थी/परिवादी को आबंटित किया गया और इस सन्दर्भ में कोई शुल्क अपीलार्थी/परिवादी द्वारा प्रत्यर्थी/विपक्षी के कार्यालय में जमा किया गया।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम १९८६ की धारा-२(घ) में उपभोक्ता को निम्नवत् परिभाषित किया गया है :-
‘’ २(१)(घ)(i)- ऐसे किसी प्रतिफल के लिए जिसका संदाय कर दिया गया है या वचन दिया गया है या भागत: संदाय किया गया और भागत: वचन दिया गया है, या किसी आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन किसी माल का क्रय करता है, इसके अन्तर्गत ऐसे किसी व्यक्ति से भिन्न ऐसे माल का कोई प्रयोगकर्ता भी है ऐसे प्रतिफल के लिए जिसका संदाय किया गया है या वचन दिया गया है या भागत: संदाय किया गया है या भागत: वचन दिया गया है या आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन माल क्रय करता है जब ऐसा प्रयोग ऐसे व्यक्ति के
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अनुमोदन से किया जाता है, लेकिन इसके अन्तर्गत कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो ऐसे माल को पुन: विक्रय या किसी वाणिज्यिक प्रयोजन के लिए अभिप्राप्त करता है।
‘’ २(१)(घ)(ii)- किसी ऐसे प्रतिफल के लिए जिसका संदाय किया गया है या वचन दिया गया है या भागत: संदाय और भागत: वचन दिया गया है, या किसी आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन सेवाओं को भाड़े पर लेता है या उपयोग करता है और इनके अन्तर्गत ऐसे किसी व्यक्ति से भिन्न ऐसी सेवाओं का कोई हिताधिकारी भी है, जो किसी प्रतिफल के लिए जिसका संदाय किया गया है और वचन दिया गया है और भागत: वचन दिया गया है या, किसी आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन सेवाओं को भाड़े पर लेता है या उपयोग करता है, जब ऐसी सेवाओं का उपयोग प्रथम वर्णित व्यक्ति के अनुमोदन से किया जाता है। लेकिन ऐसा कोई व्यक्ति सम्मिलित नहीं है जो इन सेवाओं का किसी वाणिज्यिक प्रयोजनार्थ उपभोग करता है। ‘’
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत उपरोक्त परिभाषा के आलोक में क्योंकि कोई पोस्ट बाक्स अपीलार्थी/परिवादीको आबंटित किया जाना प्रमाणित नहीं है और न ही इस सन्दर्भ में कोई शुल्क की अदायगी प्रमाणित है, अत: अपीलार्थी/परिवादी को प्रत्यर्थी/विपक्षी का उपभोक्ता नहीं माना जा सकता।
यदि तर्क के लिए यह स्वीकार भी कर लिया जाय कि अपीलार्थी/परिवादी का पोस्ट बाक्स आबंटन हेतु प्रस्तुत प्रार्थना पत्र निराधार तथ्यों के आधार पर स्वीकार नहीं किया गया तब भी इस विवाद के निस्तारण का क्षेत्राधिकार उपभोक्ता मंच को प्राप्त होना नहीं माना जा सकता।
जहॉं तक अपीलार्थी/परिवादी के इस कथन का प्रश्न है कि अपीलार्थी/परिवादी को प्रेषित पत्र उसे वितरित नहीं किए जा रहे हैं, बल्कि प्रत्यर्थी/विपक्षी के कर्मचारियों द्वारा असत्य टिप्पणियों के साथ प्रेषक को वापस किए जा रहे हैं, इस सन्दर्भ में भी यह उल्लेखनीय है कि कथित रूप से अपीलार्थी/परिवादी को भेजे गये पत्रों के सन्दर्भ में डाक वितरण की सेवाऐं वस्तुत: प्रेषक द्वारा प्राप्त की गयी मानी जाऐंगीं न कि प्राप्तकर्ता
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द्वारा प्राप्त की जानी मानी जाऐंगीं। अत: उन पत्रों के सन्दर्भ में भी अपीलाथी्र/परिवादी को प्रत्यर्थी/विपक्षी का उपभोक्ता होना नहीं स्वीकार किया जा सकता।
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में हमारे विचार से अपीलार्थी/परिवादी द्वारा प्रस्तुत परिवाद स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है। विद्वान जिला मंच ने परिवाद को निरस्त करके कोई त्रुटि नहीं की है। अत: अपील में बल न होने के कारण अपील निरस्त किए जाने योग्य है।
आदेश
अपील निरस्त की जाती है। जिला फोरम (द्वितीय), लखनऊ द्वारा परिवाद सं0-१२२२/२००९ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक १६-०८-२०१४ की पुष्टि की जाती है।
पक्षकार अपीलीय व्यय-भार अपना-अपना स्वयं वहन करेंगे।
उभय पक्ष को इस निर्णय की प्रमाणित प्रति नियमानुसार उपलब्ध करायी जाय।
(उदय शंकर अवस्थी)
पीठासीन सदस्य
(महेश चन्द)
सदस्य
प्रमोद कुमार
वैय0सहा0ग्रेड-१,
कोर्ट-४.