राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0 प्र0, लखनऊ
अपील संख्या-809/2010
(सुरक्षित)
(जिला उपभोक्ता फोरम, कानपुर देहात द्वारा परिवाद संख्या-243/2008 में पारित आदेश दिनांक 07.12.2009 के विरूद्ध)
जगदीश नारायण दिवाकर पुत्र श्री परागी निवासी-1015, रतन लाल नगर, कानपुर-22 जिला कानपुर नगर।
अपीलार्थी/परिवादी
बनाम
- भारत संघ द्वारा प्रवर अधीक्षक डाकघर कानपुर नगर, जिला कानपुर नगर।
- डाकपाल, डाकघर उघोग नगर, कानपुर।
प्रत्यर्थी/विपक्षीगण
समक्ष:-
1. माननीय श्री आलोक कुमार बोस पीठासीन सदस्य।
2. माननीय श्रीमती बाल कुमारी सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री बी0 के0 उपाध्याय।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : डा0 उदयवीर सिंह।
दिनांक: 17-03-2016
माननीय श्रीमती बाल कुमारी सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय
अपीलार्थी/परिवादी द्वारा प्रस्तुत अपील विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम, कानपुर देहात द्वारा परिवाद संख्या-243/2008 में पारित आदेश दिनांक 07.12.2009 के विरूद्ध प्रस्तुत की गयी है। विवादित आदेश निम्नवत् है:-
'' तद्नुसार परिवाद निरस्त किया जाता है। पक्षकार अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करें।'' इसी आदेश के क्षुब्ध होकर अपीलार्थी/परिवादी ने प्रस्तुत अपील दिनांक 10-05-2010 को योजित की है। संक्षेप में तथ्य इस प्रकार है कि उसने विपक्षी संख्या-2 से दिनांक 15-03-1997 को एक छह वर्षीय राष्ट्रीय बचत पत्र संख्या-6NS/J.J.EE 938193 मु0 10,000/-रू0 का क्रय किया जिसकी परिपक्वता अविध दिनांक 15-03-2003 थी। अपीलार्थी/परिवादी जब परिवक्वता अविध पूरी होने पर विपक्षी/प्रत्यर्थी पोस्ट आफिस गया तो रास्ते में सी0टी0आई चौराहे के पास उसका बैंग गिर गया जिसमें बचत पत्र भी रखे थे जिसकी प्रथम सूचना रिपोर्ट उसने दिनांक 24-05-2003 को थाना गोविन्द नगर में दर्ज करायी और विपक्षी संख्या-2 से दिनांक 23-05-2003 को बचत पत्र खो जाने की शिकायत की तथा बचत पत्र की द्वितीय प्रति जारी करने का अनुरोध किया। विपक्षीगण/प्रत्यर्थीगण द्वारा द्वितीय प्रति जारी किये जाने हेतु वांछित औपचारिकताऍं पूरी करने यथा इंडमिनिटी बॉण्ड प्रस्तुत करने हेतु कहा गया। अपीलार्थी/परिवादी ने समस्त औपचारिकताऍं पूरी कर दी। किन्तु विपक्षीगण द्वारा द्वितीय प्रति जारी नहीं की गयी। विपक्षी संख्या-1 द्वारा बिना किसी उचित आधार के उसे हैरान व परेशान करने के उद्देश्य से इस आशय की सूचना दी गयी कि वह दिये गये पते पर सत्यापन के समय घर पर नहीं मिलता है। अपीलार्थी/परिवादी भारतीय स्टेट बैंक में शाखा प्रबन्धक के पद पर शाखा जालौन में कार्यरत है और इस तथ्य की सूचना विपक्षीगण/प्रत्यर्थी को बचत पत्र क्रय करने के समय से ही है और अपीलार्थी/परिवादी अवकाश के दिनों में अपने स्थायी निवास पर सदैव उपलब्ध रहा और प्रत्यर्थी/विपक्षीगण द्वारा कभी भी उसके स्थायी निवास पर सम्पर्क नहीं किया गया। विपक्षी का यह कृत्य कतई अवैध एवं उपभोक्ता हितों के प्रतिकूल एवं मनमाना है। परिवादी का यह भी कथन है कि बचत पत्र दिनांक 15-03-2003 को परिपक्व होकर भुगतान योग्य हो गया था और विपक्षीगण/प्रत्यर्थी की लापरवाही एवं मनमाने रवैये के कारण द्वितीय प्रति जारी न होने से परिवादी मु0 20,150/-रू0 का भुगतान नहीं प्राप्त कर सका और परिवादी को एक वर्ष दो माह का ब्याज का भी नुकसान हुआ।
विपक्षी संख्या-1 व 2 की ओर से दाखिल जवाब दावा में प्राधिकृत सीनियर सुप्रीन्टेन्डेन्ट पोस्ट आफिस ने कहा है कि गर्वनमेंट सेविंग सर्टिफिकेट एक्ट-1959 के तहत बनाये गये नियमों के अनुसार बचत पत्र धारक के कब्जे से बचत पत्र खो जाने पर नियमानुसार आवश्यक जॉंच के उपरान्त ही डुप्लीकेट बचत पत्र जारी किये जाते हैं। परिवादी द्वारा बचत पत्र खो जाने की सूचना मिलने के पश्चात विभाग द्वारा आवश्यक जॉंच कार्यवाही हेतु परिवादी द्वारा दिये गये पते पर जाने पर अपीलार्थी/परिवादी नहीं मिलते थे अत: डुप्लीकेट पत्र जारी नहीं किये जा सके। विपक्षी/प्रत्यर्थी द्वारा लापरवाही नहीं की गयी है वरन् अपीलार्थी/परिवादी के असहयोग के कारण डुप्लीकेट बचत पत्र जारी नहीं हो सके। परिवाद निरस्त किये जाने योग्य है।
पीठ के समक्ष अपीलार्थी की ओर से विद्धान अधिवक्ता श्री बी0 के0 उपाध्याय एवं प्रत्यर्थी की ओर से विद्धान अधिवक्ता डा0 उदयवीर सिंह उपस्थित आए।
हमने उभयपक्ष के विद्धान अधिवक्तागण के तर्क सुने तथा पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों का गंभीरता से परिशीलन किया।
उभयपक्ष को सुनने के पश्चात तथा गुणदोष के आधार पर पत्रावली का अवलोकन करने से यह तथ्य प्रकाश में आता है कि चूंकि अपीलार्थी/परिवादी को मा0 राष्ट्रीय आयोग के अन्तरिम आदेश से मेंच्योरिटी राशि दिनांक 20-04-2012 को मु0 26,590/-रू0 का भुगतान किया जा चुका है। जिसे परिवादी/अपीलार्थी द्वारा ग्रहण भी कर लिया गया है। इसलिए अपील निरस्त होने योग्य है।
पत्रावली का अवलोकन यह भी दर्शाता है कि प्रस्तुत अपील अंगीकार के स्तर पर सुनवाई हेतु सूचीबद्ध चली आ रही है और यह अपील अभी तक अंगीकृत भी नहीं हुई। अपीलार्थी/परिवादी द्वारा दिनांक 07.12.2009 के प्रश्नगत आदेश की प्रति दिनांक 08.02.2010 को प्राप्त करने के उपरान्त उसके द्वारा अपील दिनांक 10.05.2010 को प्रस्तुत की गयी है, जो कि प्रथम दृष्ट्या समय-सीमा अवधि से बाधित है। अपीलार्थी/परिवादी की ओर से समय-सीमा अवधि में छूट सम्बन्धी प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया है, जिसमें यह कहा गया है कि जिला मंच के प्रश्नगत निर्णय की जानकारी उसे दिनांक 29-04-2010 को द्वितीय प्रति प्राप्त होने पर हुई। और अधिवक्ता द्वारा प्रथम प्रति प्राप्त करने के बाद उसे सूचना नहीं दी गयी और प्रथम प्रति गायब होने पर उसे दिनांक 29-04-2010 को द्वितीय प्रति उपलब्ध करायी गयी। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तह भी आदेश दिनांक 07-12-2009 की जानकारी के बाद यह अपील समय सीमा के अंदर योजित की गयी है एवं विद्धान अधिवक्ता की गलती के कारण प्रथम नकल की प्रति गायब हो गयी थी और उसके द्वारा विलम्ब जानबूझकर नहीं किया गया है, जो क्षमा योग्य है, परन्तु हम प्रार्थना पत्र में वर्णित कारणों को पर्याप्त आधार विलम्ब क्षमा हेतु नहीं पाते हैं और समय-सीमा अवधि में छूट सम्बन्धी प्राविधान के प्रति निम्नलिखित विधि सिद्धान्तों के परिप्रेक्ष्य में स्वीकार किए जाने योग्य नहीं पाया जाता है।
उपरोक्त वर्णित तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में यह अवलोकनीय है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-1166/2006 बलवन्त सिंह बनाम जगदीश सिंह तथा अन्य में यह अवधारित किया गया है कि समय-सीमा में छूट दिए जाने सम्बन्धी प्रकरण पर यह प्रदर्शित किया जाना कि सदभाविक रूप से देरी हुई है, के अलावा यह सिद्ध किया जाना भी आवश्यक है कि अपीलार्थी के प्राधिकार एवं नियंत्रण में वह सभी सम्भव प्रयास किए गए हैं, जो अनावश्यक देरी कारित न होने के लिए आवश्यक थे और इसलिए यह देखा जाना आवश्यक है कि जो देरी की गयी है उससे क्या किसी भी प्रकार से बचा नहीं जा सकता था। इसी प्रकार राम लाल तथा अन्य बनाम रीवा कोलफील्ड्स लिमिटेड, AIR 1962 SC 361 पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह अवधारित किया गया है कि बावजूद इसके कि पर्याप्त कारण देरी होने का दर्शाया गया हो, अपीलार्थी/परिवादी अधिकार स्वरूप देरी में छूट पाने का अधिकारी नहीं हो जाता है क्योंकि पर्याप्त कारण दर्शाया गया है ऐसा अवधारित किया जाना न्यायालय का विवेक है और यदि पर्याप्त कारण प्रदर्शित नहीं हुआ है तो अपील में आगे कुछ नहीं किया जा सकता है तथा देरी को क्षमा किए जाने सम्बन्धी प्रार्थना पत्र को मात्र इसी आधार पर अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। यदि पर्याप्त कारण प्रदर्शित कर दिया गया है तब भी न्यायालय को यह विश्लेषण करने की आवश्यकता है कि न्यायालय के विवेक को देरी क्षमा किए जाने के लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिए अथवा नहीं और इस स्तर पर अपील से सम्बन्धित सभी संगत तथ्यों पर विचार करते हुए यह निर्णीत किया जाना चाहिए कि अपील में हुई देरी को अपीलार्थी की सावधानी और सदभाविक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में क्षमा किया जाए अथवा नहीं। यद्यपि स्वाभाविक रूप से इस अधिकार को न्यायालय द्वारा संगत तथ्यों पर कुछ सीमा तक ही विचार करने के लिए प्रयुक्त करना चाहिए।
हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आफिस आफ दि चीफ पोस्ट मास्टर जनरल तथा अन्य बनाम लिविंग मीडिया इण्डिया लि0 तथा अन्य, सिविल अपील संख्या-2474-2475 वर्ष 2012 जो एस.एल.पी. (सी) नं0 7595-96 वर्ष 2011 से उत्पन्न हुई है, में दिनांक 24.02.2012 को यह अवधारित किया गया है कि सभी सरकारी संस्थानों, प्रबन्धनों और एजेंसियों को बता दिए जाने का यह सही समय है कि जब तक कि वे उचित और स्वीकार किए जाने योग्य स्पष्टीकरण समय-सीमा में हुई देरी के प्रति किए गए सदभाविक प्रयास के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट नहीं करते हैं तब तक उनके सामान्य स्पष्टीकरण कि अपील को योजित करने में कुछ महीने/वर्ष अधिकारियों द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के परिप्रेक्ष्य में लगे हैं, को नहीं माना जाना चाहिए। सरकारी विभागों के ऊपर विशेष दायित्व होता है कि वे अपने कर्त्तव्यों का पालन बुद्धिमानी और समर्पित भाव से करें। देरी में छूट दिया जाना एक अपवाद है और इसे सरकारी विभागों के लाभार्थ पूर्व अनुमानित नहीं होना चाहिए। विधि का साया सबके लिए समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए न कि उसे कुछ लोगों के लाभ के लिए ही प्रयुक्त किया जाए।
Mahindra & Mahindra Financial Services Ltd. Vs Naresh Singh, I(2013) CPJ 407 (NC) & Dihi Development Authority Vs. V.P. Narayanan, IV (2011) CPJ 155 (NC) & Anshul Agarwal Vs. NOIDA, IV (2011) CPJ 63 (SC) & आर0बी0 रामलिंगम बनाम आर0बी0 भवनेश्वरी, 2009 (2) Scale 108 के मामले में तथा अंशुल अग्रवाल बनाम न्यू ओखला इण्डस्ट्रियल डवलपमेंट अथॉरिटी, IV (2011) CPJ 63 (SC) एवं में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह अवधारित किया गया है कि न्यायालय को प्रत्येक मामले में यह देखना है और परीक्षण करना है कि क्या अपील में हुई देरी को अपीलार्थी ने जिस प्रकार से स्पष्ट किया है, क्या उसका कोई औचित्य है? क्योंकि देरी को क्षमा किए जाने के सम्बन्ध में यही मूल परीक्षण है, जिसे मार्गदर्शक के रूप में अपनाया जाना चाहिए कि क्या अपीलार्थी ने उचित विद्वता एवं सदभावना के साथ कार्य किया है और क्या अपील में हुई देरी स्वाभाविक देरी है। उपभोक्ता संरक्षण मामलों में अपील योजित किए जाने में हुई देरी को क्षमा किए जाने के लिए इसे देखा जाना अति आवश्यक है क्योंकि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में अपील प्रस्तुत किए जाने के जो प्राविधान दिए गए हैं, उन प्राविधानों के पीछे मामलों को तेजी से निर्णीत किए जाने का उद्देश्य रहा है और यदि अत्यन्त देरी से प्रस्तुत की गयी अपील को बिना सदभाविक देरी के प्रश्न पर विचार किए हुए अंगीकार कर लिया जाता है तो इससे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के प्राविधानानुसार उपभोक्ता के अधिकारों का संरक्षण सम्बन्धी उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।
उपरोक्त सन्दर्भित विधिक सिद्धान्तों के परिप्रेक्ष्य में हमने अपीलार्थी द्वारा प्रदर्शित उपरोक्त तथ्यों का अवलोकन एवं विश्लेषण किया है और यह पाया है कि स्पष्टतया उपरोक्त सन्दर्भित स्पष्टीकरण सदभाविक स्पष्टीकरण नहीं है, ऐसा स्पष्टीकरण नहीं है जिससे अपीलार्थी अपील योजित किए जाने में हुई देरी से बच नहीं सकता था। दिनांक 07-12-2009 के विवादित आदेश की सत्य प्रतिलिपि दिनांक 08.02.2010 को प्राप्त कर लिए जाने के उपरान्त भी प्रदत्त सीमा अवधि तक अपील न किए जाने और दिनांक 10.05.2010 को अर्थात् लगभग 93 दिन बाद इस अपील को योजित किए जाने का कोई स्पष्ट औचित्य नहीं है। देरी होने सम्बन्धी तथ्य को जिस प्रकार से वर्णित किया गया है, उससे यह नहीं लगता है कि उसके अलावा कोई विकल्प अपील में देरी से बचने का नहीं था। अत: हम धारा-15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 द्वारा प्रदत्त 30 दिन की कालावधि के अवसान के पश्चात् यह अपील ग्रहण किए जाने योग्य नहीं पाते हैं क्योंकि अपीलार्थी उस अवधि के भीतर अपील न योजित करने के सम्बन्ध में पर्याप्त कारण के प्रति ऐसा स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने में विफल है, जिससे हमारा समाधान हो सके कि कालावधि के अवसान के पश्चात् अपील ग्रहण की जा सकती है। चूंकि इस प्रकरण में अपीलार्थी/परिवादी छह वर्षीय राष्ट्रीय बचत पत्र संख्या-6NS/J.J.EE 938193 मु0 10,000/-रू0 परिपक्व भुगतान मु0 26590/-रू0 स्वेच्छा से दिनांक 20-04-2012 को प्राप्त कर चुका है अत: पक्षकारान के बीच उपभोक्ता-सेवादाता का संबंध समाप्त हो चुका है। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत अपील 93 दिन विलम्ब से योजित की गयी है जिसका कोई ठोस स्पष्टीकरण अपीलार्थी/परिवादी द्वारा नहीं दिया गया अत: प्रस्तुत अपील सारहीन एवं समय-सीमा से बाधित होने के कारण निरस्त होने योग्य है।
आदेश
अपील उपरोक्त खण्डित की जाती है। जिला उपभोक्ता फोरम, कानपुर देहात द्वारा परिवाद संख्या-243/2008 में पारित आदेश दिनांक 07.12.2009 की पुष्टि की जाती है। उभयपक्ष अपना-अपना अपीलीय व्ययभार स्वयं वहन करेंगे।
पक्षकारों को निर्णय की प्रतिलिपि नियमानुसार प्राप्त करायी जाए।
( आलोक कुमार बोस ) ( बाल कुमारी )
पीठासीन सदस्य सदस्य
कोर्ट नं0-3
प्रदीप मिश्रा