सुरक्षित
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0 लखनऊ
(जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, लखनऊ (प्रथम) द्वारा परिवाद संख्या 275/2008 में पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश दिनांक 28.09.2010 के विरूद्ध)
अपील संख्या 1824 सन 2010
चन्द्रपाल शर्मा पुत्र श्री रामदेव शर्मा निवासी मकान नं0 479 रिजर्व पुलिस लाइन, जिला लखनऊ वर्तमान निवासी प्लाट नम्बर ए-177 प्रगति विहार, कल्याणपुर थाना गुडम्बा, लखनऊ ।
.......अपीलार्थी/प्रत्यर्थी
-बनाम-
चीफ पोस्ट मास्टर, जी0पी0ओ0 लखनऊ ।
. .........प्रत्यर्थी/परिवादी
समक्ष:-
मा0 श्री उदय शंकर अवस्थी, पीठासीन सदस्य।
मा0 श्री गोवर्धन यादव, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता - श्री रोहित मिश्रा के सहयोगी श्री
ललित नरायण द्विवेदी।
प्रत्यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता - श्रीकृष्ण पाठक ।
दिनांक:-31-05-19
श्री गोवर्धन यादव, सदस्य द्वारा उद्घोषित
निर्णय
प्रस्तुत अपील, जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, लखनऊ (प्रथम) द्वारा परिवाद संख्या 275/2008 में पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश दिनांक 28.09.2010 के विरूद्ध प्रस्तुत की गयी है ।
संक्षेप में, प्रकरण के आवश्यक तथ्य इस प्रकार हैं कि परिवादी स्नातक पास बेरोजगार युवक है। उसने विद्युत सेवा आयोग द्वारा कार्यालय सहायक पद के प्रकाशित विज्ञापन को देखकर अपना आवेदन पत्र महाप्रबन्धक (तृतीय) कमरा नं0 331 शक्ति भवन लखनऊ के पते पर रजि0 डाक से दिनांक 24.09.2007 को प्रेषित किया था । उक्त प्रेषित लिफाफा दिनांक 24.12.2007 को परिवादी को वापस प्राप्त हुआ जिस पर रिफ्यूज्ड लिखा हुआ था। परिवादी ने इसकी शिकायत प्रवर अधीक्षक डाकघर लखनऊ मण्डल लखनऊ से की, कोई सुनवाई न होने पर क्षतिपूर्ति हेतु परिवाद योजित किया।
विपक्षी की ओर से लिखित कथन प्रस्तुत कर उल्लिखित किया कि उन दिनों तमाम रजिस्ट्री लिफाफा महाप्रबन्धक तृतीय शक्तिभवन एवं चकबंदी लखनऊ के प्राप्त हुए थे। परिवादी द्वारा प्रेषित लिफाफा गलती से चकबन्दी आयुक्त को भेज दिया गया था जिसे बाद में चकबंदी आयुक्त ने रिफ्यूज्ड लिखकर कर वापस कर दिया जिसे परिवादी को दिनांक 24.12.2007 को वापस कर दिया गया। चूंकि परिवादी की कोई संविदा भारत सरकार से नहीं हुयी, इसलिए भारत सरकार सेवा उपलब्ध कराने की श्रेणी में नहीं आता है।
जिला मंच ने उभय पक्ष के साक्ष्य एवं अभिवचनों के आधार पर भारतीय पोस्ट आफिस अधिनियम 1998 की धारा-6 के प्राविधानों के अन्तर्गत परिवादी का परिवाद खारिज कर दिया, जिससे क्षुब्ध होकर प्रस्तुत अपील परिवादी द्वारा प्रस्तुत की गयी है।
अपील के आधारों में कहा गया है कि जिला मंच का प्रश्नगत निर्णय विधिपूर्ण नहीं है तथा सम्पूर्ण तथ्यों को संज्ञान में लिए बिना प्रश्नगत निर्णय पारित किया गया है जो अपास्त किए जाने योग्य है।
हमने उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्तागण के तर्क विस्तारपूर्वक सुने एवं पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों का सम्यक अवलोकन किया।
पत्रावली के अवलोकन से स्पष्ट है कि परिवादी ने रोजगार प्राप्त करने हेतु अपना आवेदन पत्र विपक्षी के माध्यम से महाप्रबन्धक (तृतीय) कमरा नं0 331 शक्ति भवन लखनऊ के पते पर रजि0 डाक से दिनांक 24.09.2007 को प्रेषित किया था जो विपक्षी द्वारा उलिलखित पते पर न पहुंचाकर चकबन्दी आयुक्त के कार्यालय में पहुंचा दिया गया जिन्होंने उक्त लिफाफा रिफ्यूज्ड लिखकर वापस कर दिया जो परिवादी को डाक विभाग ने दिनांक 24.12.2007 को वापस कर दिया गया। उल्लिखित पते पर परिवादी का आवेदन पत्र न पहुंच पाने के कारण परिवादी सेवायोजन से वंचित रह गया जिससे उसे आर्थिक क्षति एवं मानसिक क्लेश हुआ।
प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता का यह भी तर्क है कि उसका कोई दायित्व किसी डाक के गायब होने, गलत जगह पर पहुंचाने या देरी से पहुंचाने का नहीं है जब तक कि परिवादी यह साबित न कर दे कि विपक्षी के कर्मचारियों ने छलकपट से या जानबूझ कर डाक को सही स्थान पर न पहुंचा कर गलत स्थान पर पहुंचाया है। विद्वान अधिवक्ता प्रत्यर्थी द्वारा यह भी उल्लिखित किया गया कि प्रश्नगत प्रकरण इण्डियन पोस्ट आफिस एक्ट की धारा-06 से बाधित है, जो निम्नवत् अंकित है :-
Section 6 of the Indian Post Office Act. 1989 reads as under :
“6, Exemption from liability for loss, misdelivery, delay or damage - The Government shall not incur any liability by reason of the loss, misdelivery or delay of or damage to, any postal article in course of transmission by post, except insofar as such liability may in express terms be undertaken by the Central Government as hereinafter provided and no officer of the Post Office shall incur any liability by reason of any such loss, misdelivery, delay or damage, unless he has caused the same fraudulently or by his willful act or default.”
प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता ने अपने तर्क के समर्थन में मा0 राष्ट्रीय आयोग नई दिल्ली द्वारा IV (2017) CPJ 10 (NC) MANAGER, SPEED POST &ORS VS BHANWAR LAL GORA में पारित विधि व्यवस्था को सन्दर्भित किया है।
उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर पीठ इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि भारतीय डाक अधिनियम की धारा-06 एवं माननीय राष्ट्रीय आयोग के द्वारा अवधारित विधि व्यवस्था के आलोक में जिला मंच द्वारा पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश विधि संगत एवं न्यायोचित है। प्रत्यर्थी की मंशा अपीलार्थी/परिवादी द्वारा प्रेषित डाक के गायब करने या गलत जगह पर पहुंचाने या देरी से पहुंचाने की नहीं थी और न ही परिवादी द्वारा यह साबित किया गया है कि विपक्षी के कर्मचारियों ने छलकपट से या जानबूझ कर डाक को सही स्थान पर न पहुंचा कर गलत स्थान पर पहुंचाया है जिसके कारण उसे हानि हुयी है।
फलस्वरूप प्रस्तुत अपील निरस्त होने योग्य है।
आदेश
प्रस्तुत अपील निरस्त करते हुए जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, लखनऊ (प्रथम) द्वारा परिवाद संख्या 275/2008 में पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश दिनांक 28.09.2010 की पुष्टि की जाती है।
उभय पक्ष इस अपील का अपना अपना व्यय स्वयं वहन करेंगे।
(उदय शंकर अवस्थी) (गोवर्धन यादव)
पीठासीन सदस्य सदस्य
कोर्ट-3
(S.K.Srivastav,PA)