(राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0 प्र0 लखनऊ)
सुरक्षित
अपील संख्या 1225/2011
(जिला मंच बलरामपुर द्वारा परिवाद सं0 231/2003 में पारित निर्णय/आदेश दिनांकित 24/09/2010 के विरूद्ध)
बृजेश कुमार, आयु लगभग 41 वर्ष, पुत्र श्री श्याम लाल, नि0 मोहल्ला पहलवारा, परगना, तहसील एवं जिला व डाकखाना बलरामपुर।
…अपीलार्थी/परिवादी
बनाम
1- चीफ पोस्ट मास्टर जनरल, उत्तर प्रदेश, पी0एम0 जी कार्यालय, उ0प्र0 लखनऊ।
2- डाक अधीक्षक, डाक तार विभाग, गोण्डा।
3- हेड पोस्ट मास्टर, हेड पोस्ट आफिस, बलरामपुर।
4- पोस्ट मास्टर, जनरल पोस्ट आफिस, हजरतगंज लखनऊ।
5- कार्यालय अध्यक्ष प्रशासक, शारदा सहायक समादेश क्षेत्र, विकास परियोजना, प्रथम तल, जवाहर भवन, लखनऊ।
.........प्रत्यर्थीगण/विपक्षीगण
समक्ष:
1. मा0 श्री आलोक कुमार बोस, पीठासीन सदस्य ।
2. मा0 श्री संजय कुमार, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : विद्वान अधिवक्ता श्री राजीव नारायण।
प्रत्यर्थीगण की ओर से उपस्थित : कोई नहीं।
दिनांक 29/04/2015
मा0 श्री संजय कुमार, सदस्य द्वारा उदघोषित ।
निर्णय
प्रस्तुत अपील परिवाद सं0 231/2003 बृजेश कुमार बनाम चीफ पोस्ट मास्टर जनरल उत्तर प्रदेश व अन्य, जिला फोरम, बलरामपुर के निर्णय/आदेश दिनांक 24/09/2010 से क्षुब्ध होकर प्रस्तुत की गई है।
प्रश्नगत प्रकरण में अधीनस्थ जिला फोरम ने परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए विपक्षीगण सं0 01 लगायत 04 को आदेशित किया कि वे आदेश दिनांक 24/09/2010 से 30 दिन के अंदर स्पीड पोस्ट चार्ज मु0 25/- रूपये परिवादी को अदा करे तथा वाद व्यय के रूप में मु0 1000/ रूपये भी परिवादी को अदा करे।
प्रश्नगत प्रकरण में परिवादी/अपीलार्थी का कथन संक्षेप में इस प्रकार है कि उसने सहायक लेखाकार पद हेतु समादेश क्षेत्र विकास परियोजना प्रथम तल जवाहर भवन लखनऊ को नियुक्ति से संबंधित आवेदन पत्र दिनांक 09/06/2002 को समय 11:50 मिनट 17 सेकेण्ड पर स्पीड पोस्ट सेवा द्वारा स्पीड पोस्ट प्रधान डाकघर बलरामपुर से भेजा। परिवादी का नियुक्ति आवेदन
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पत्र विपक्षी सं0 5 के कार्यालाय में दिनांक 10/06/2003 को सायं 5 बजे पहुंचना था। डाकघर विभाग की स्पीड पोस्ट सेवा में नियमानुसार 200 ग्राम वजन का लिफाफा 200 किलोमीटर की दूरी तक 24 घण्टे के अंदर डिलेवरी का प्राविधान है, परन्तु परिवादी का स्पीड पोस्ट पत्र डाक विभाग की लापरवाही के कारण विपक्षी सं0 5 के कार्यालय में समय से नहीं पहुंचा। जिसकी वजह से प्राप्तकर्ता ने प्रार्थी का आवेदन पत्र लेने से इन्कार कर दिया जो रिफ्यूजल प्रमाण पत्र के साथ परिवादी को वापस मिल गया। जिसकी वजह से परिवादी अपनी नियुक्ति हेतु अग्रिम कार्यवाही नहीं कर सका। परिवादी/अपीलार्थी ने दिनांक 24/06/2003 को विपक्षी सं0 5 के कार्यालयमें नियुक्ति आवेदन पत्र प्राप्त करने के संबंध में पूछताछ हेतु जरिये स्पीड पोस्ट से पत्र लिखा, जिसका कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ। जिसके उपरान्त दिनांक 17/07/2003 एवं 24/06/2003 के पत्र के संबंध में डाक अधीक्षक बलरामपुर से पूछताछ की, तो उन्होंने लिखित रूप से बताया कि 24/06/2003 को पत्र भेज दिया गया है। दिनांक 25/07/2003 को पोस्ट मास्टर बलरामपुर से दिनांक 24/06/2003 के पत्र के वितरित होने के संबंध में जानकारी के लिए पत्र प्राप्त कराया गया, फिर भी कोई जानकारी नहीं प्राप्त हुई। उसके बाद परिवादी/अपीलार्थी ने दिनांक 08/08/2003 को चीफ पोस्ट मास्टर हजरतगंज लखनऊ, डाक अधीक्षक गोण्डा को स्पीड पोस्ट दिनांक 24/06/2003 के संबंध में जानकारी के लिए पत्र भेजा परन्तु अब तक कोई जवाब नहीं मिला है। डाकतार विभाग ने उपभोक्ता के कार्य के प्रति घोर लापरवाही की है और परिवादी के आवेदन पत्र समय से न पहुंचने के कारण उसका भविष्य अंधकारमय हो गया है। जब कि उसे नियुक्ति मिलने की पूर्ण संभावना थी तथा जिसकी वजह से उसे आर्थिक, मानसिक, शारीरिक क्षति हुई।
विपक्षीगण/प्रत्यर्थीण ने अपने वादोउत्तर में कथन किया है कि विभाग द्वारा दूरी के अनुसार समय सीमा निर्धारित की गई है और यदि स्पीड पोस्ट वस्तु निर्धारित समय के अंदर प्रापक को वितरित नहीं हो पाती है तो केवल स्पीड पोस्ट चार्ज ही विभाग द्वारा प्रेषक को वापस किया जाता है। विपक्षीगण/प्रत्यर्थीगण परिवादी के शेष कथनों से इन्कार किया है और विशेष कथन किया है कि परिवादी द्वारा इनकारी से वापस किये गये स्पीड पोस्ट को विलंब से पहुंचने के कारण वापस किये जाने का कथन गलत है। स्पीड पोस्ट जारी होने कि दिनांक 24/06/2003 गलत है जबकि स्पीड पोस्ट जारी होने की तिथि 09/06/2003 है। परिवाद में दर्शाया गया स्पीड पोस्ट सं0- ई0ई0 705330161 एन0 दिनांक 09/06/2003 को उनके कार्यालय में प्राप्त हुआ।
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जिस पर उसी दिन कार्यवाही कर दी गई है। विपक्षीगण द्वारा कोई लापरवाही नहीं की गई है। परिवादी की शिकायत एक माह के अंदर न होने के कारण काल बाधित है। परिवादी कोई भी अनुतोष पाने का अधिकारी नहीं है। अत: परिवाद निरस्त करने की याचना की है।
विपक्षी सं0 5 औपचारिक पक्षकार है। जिसको परिवादी द्वारा शेष विपक्षीगण सं0 1 लगायत 4 के विभाग द्वारा स्पीड पोस्ट भेजा जाना कहा गया है। अतएव विपक्षी सं0 5 को कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता है।
अधीनस्थ जिला फोरम ने दोनों पक्षों के साक्ष्य का अवलोकन करते हुए गुणदोष के आधार पर निर्णय/आदेश पारित किया है जिसके खिलाफ अपील प्रस्तुत की गई है।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता की बहस अंगीकरण के स्तर पर सुना गया। आधार अपील एवं संपूर्ण पत्रावली का परिशीलन किया गया जिससे यह प्रतीत होता है कि परिवादी/अपीलार्थी ने एक स्पीड पोस्ट के माध्यम से आवेदन पत्र भेजा था जो प्राप्तकर्ता को समय से प्राप्त न होने के कारण इन्कारी की रिपोर्ट अंकित होकर परिवादी को वापस भेज दिया गया। डाक विभाग के कर्मचारी द्वारा कोई जानबूझकर द्वेषपूर्ण भावना से पत्र का वितरण नहीं किया गया है न इसके संबंध में जानबूझकर विलंब से भेजे जाने का कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार डाक विभाग के खिलाफ धोखाधड़ी व जानबूझकर विलंब करने का मामला नहीं पाया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में अपीलार्थी/परिवादी केवल स्पीड पोस्ट में हुए खर्च को ही पाने का अधिकारी है। जिला फोरम ने जो निर्णय दिया है वह विधि सम्मत है। जिला फोरम के निर्णय/आदेश में किसी भी प्रकार की कोई त्रुटि नहीं पायी जाती है। अपीलार्थी के अपील में बल न होने के कारण गुणदोष के आधार पर भी निरस्त करने योग्य है।
यह अपील 09 माह के विलंब से दाखिल किया गया है। विलंब क्षमा प्रार्थना पत्र दिया गया है परन्तु विलंब का कारण उचित एवं पर्याप्त नहीं है। विलंब के आधार पर अपील निरस्त होने योग्य है। आर.बी. रामलिंगन बनाम आर.बी. भवनेश्वरी 2009 (2) Scale 108 के मामले में तथा अंशुल अग्रवाल बनाम न्यू ओखला इण्डस्ट्रियल डवपमेंट अथॉरिटी, ।v (2011) सी.पी.जे. 63 (एस.सी.) में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह आधारित किया गया है कि न्यायालय को प्रत्येक मामले में यह देखना है और परीक्षण करना है कि क्या अपील में हुई देरी को अपीलार्थी ने जिस प्रकार से प्रस्तुत किया है क्या उसका कोई औचित्य है, क्योंकि देरी को क्षमा किये जाने के संबंध में यही मूल परीक्षण जिसे मार्गदर्शक के रूप में अपनाया जाना चाहिए कि
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क्या अपीलार्थी ने उचित विद्वता एवं सदभावना के साथ कार्य किया है और क्या अपील में हुई देरी स्वाभाविक देरी है। उपभोक्ता संरक्षण मामलों में अपील योजित किये जाने में हुई देरी को क्षमा किये जाने के लिए इसे देखा जाना अति आवश्यक है, क्योंकि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में अपील प्रस्तुत किये जाने के जो प्राविधान दिये गये हैं उन प्राविधानों के पीछे मामलों को तेजी से निर्णीत किये जाने का उद्देश्य रहा है और यदि अत्यन्त देरी से प्रस्तुत की गई अपील को बिना स्वाभाविक देरी के प्रश्न पर विचार किये हुए अंगीकरण कर लिया जाता है तो इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के प्राविधान के अनुसार उपभोक्ता के अधिकारों का संरक्षण संबंधी उद्देश्य ही विफल हो जायेगा।
सभी तथ्यों पर विचार करने के उपरान्त पीठ द्वारा यह पाया जाता है कि जिला फोरम के निर्णय/आदेश में कोई विधिक त्रुटि नहीं है एवं अपील समय सीमा के उपरान्त नौ माह विलंब से योजित किया गया है जिसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण अपीलार्थी द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया। फलस्वरूप यह अपील सारहीन तथा काल सीमा से बाधित होने के कारण अंगीकरण पर निरस्त होने योग्य है।
आदेश
अपील अंगीकरण के स्तर पर निरस्त की जाती है। पक्षकार अपना-अपना अपीलीय व्यय भार स्वयं वहन करेंगे। उभय पक्ष को इस निर्णय की प्रमाणित प्रति नियमानुसार उपलब्ध कराई जाय।
(आलोक कुमार बोस)
पीठासीन सदस्य
(संजय कुमार)
सदस्य
सुभाष चन्द्र आशु0 कोर्ट नं0 4