सुरक्षित
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।
अपील संख्या-2413/2011
(जिला उपभोक्ता फोरम, जौनपुर द्वारा परिवाद संख्या-222/2006 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 14.10.2011 के विरूद्ध)
1. सुप्रीटेण्डेंट आफ पोस्ट आफिसेज, जौनपुर डिवीजन, जौनपुर।
2. पोस्ट मास्टर जनरल (चीफ) यू0पी0 सर्कल, लखनऊ।
अपीलार्थीगण/विपक्षी संख्या-1 व 3
बनाम्
1. पीयूष मौर्या पुत्र श्री विजय कुमार मौर्या, निवासी मोहल्ला मर्दनपुर, पोस्ट सदर, जिला जौनपुर।
2. डायरेक्टर नेशनल सेविंग्स, यू0पी0 विकास दीप, 22, स्टेशन रोड, लखनऊ।
प्रत्यर्थीगण/परिवादी/विपक्षी सं0-2
समक्ष:-
1. माननीय श्री संजय कुमार, पीठासीन सदस्य।
2. माननीय श्री महेश चन्द, सदस्य।
अपीलार्थीगण की ओर से उपस्थित : डा0 उदय वीर सिंह, विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी संख्या-1 की ओर से उपस्थित : श्री टी0एच0 नकवी, विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी संख्या-2 की ओर से उपस्थित : कोई नहीं।
दिनांक 29.12.2017
मा0 श्री संजय कुमार, पीठासीन सदस्य द्वारा उदघोषित
निर्णय
यह अपील, परिवाद संख्या-222/2006, पीयूष मौर्या बनाम अधीक्षक डाक घर व अन्य में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, जौनपुर द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 14.10.2011 से क्षुब्ध होकर विपक्षी सं0-1 व 3/अपीलार्थीगण की ओर से योजित की गयी है, जिसके अन्तर्गत जिला फोरम द्वारा निम्नवत् आदेश पारित किया गया है :-
'' परिवादी पीयूष मौर्या का परिवाद संख्या 222/2006 विपक्षीगण के विरूद्ध मु0 40,000/- रू0 व मु0 3000/- रू0 क्षतिपूर्ति एवं मु0 1000/- रू0 वाद व्यय कुल मु0 44,000/- रू0 के लिए स्वीकार किया जाता है। विपक्षीगण को आदेश दिया जाता है कि एक माह के अन्दर उपर्युक्त धनराशि अदा करें, अथवा फोरम में जमा करे। इस निर्धारित अवधि में उक्त धनराशि जमा न करने पर परिवादी परिवाद पत्र की तिथि से 6 प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ''
प्रकरण के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार हैं कि परिवादी ने दिनांक 23.10.2004 को रू0 3,00,000/- व रू0 3,00,000/- विपक्षीगण डाकघर में 06 वर्षीय मासिक आय योजना में निवेशित किया, जिसका क्रमश: खाता संख्या-303109 तथा 303110 दिनांक 08.10.2004 को खोला गया था, लेकिन बिना किसी कारण बताये दिनांक 28.10.2005 से खाता नम्बर-303110 को बिना किसी ब्याज व बोनस दिये बन्द कर दिया गया और दिनांक 27.06.2006 को रू0 3,00,000/- में से रू0 2,76,000/- का चेक परिवादी के पक्ष में जारी कर दिया गया, जिसकी शिकायत करने पर विपक्षी ने परिवादी की पासबुक फाड़ कर फेंक दी और अपमानित किया गया, जिससे क्षुब्ध होकर प्रश्नगत परिवाद जिला फोरम के समक्ष योजित किया गया।
विपक्षी संख्या-1 व 3 ने परिवाद पत्र का विरोध करते हुए प्रतिवाद पत्र प्रस्तुत किया गया और मुख्यत: यह तर्क किया गया कि नियमानुसार एक निवेषक मात्र रू0 3,00,000/- ही निवेशित कर सकता है। परिवादी ने नियम विरूद्ध त्रुटिपूर्ण तरीके से रू0 6,00,000/- निवेशित कर दिया, इसलिए विपक्षी ने रू0 3,00,000/- से अधिक निवेशित धनराशि में से आवश्यक ब्याज कटौती करके रू0 2,76,000/- परिवादी को वापस कर दिये, जिसमें विपक्षी द्वारा कोई सेवा में कमी नहीं की गयी है।
जिला फोरम द्वारा उभय पक्ष को सुनने एवं पत्रावली का परिशीलन करने के उपरांत उपरोक्त आक्षेपित निर्णय एवं आदेश पारित किया गया।
उपरोक्त निर्णय एवं आदेश से क्षुब्ध होकर अपील सुनवाई हेतु पीठ के समक्ष प्रस्तुत हुई। अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता डा0 उदय वीर सिंह तथा प्रत्यर्थी संख्या-1 की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री टी0एच0 नकवी उपस्थित हुए। प्रत्यर्थी संख्या-2 की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ। विद्वान अधिवक्तागण को विस्तार से सुना गया एवं प्रश्नगत निर्णय/आदेश तथा उपलब्ध अभिलेखों का गम्भीरता से परिशीलन किया गया।
उपरोक्त आक्षेपित निर्णय एवं आदेश से क्षुब्ध होकर वर्तमान अपील, अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्ता द्वारा योजित करते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि परिवादी ने दिनांक 23.10.2004 को रू0 3,00,000/- व रू0 3,00,000/- विपक्षीगण/अपीलार्थीगण, डाकघर में 06 वर्षीय मासिक आय योजना के अन्तर्गत जमा किये थे, जिसका क्रमश: खाता संख्या-303109 तथा 303110 था। खाता संख्या-303110 को बन्द कर दिया गया, क्योंकि सरकार की पालिसी है कि एक व्यक्ति 03 लाख रूपये तक ही उक्त योजना में जमा कर सकता है। 03 लाख रूपये तक की योजना वाले खाते को चालू रखा गया तथा दूसरे खाते को बन्द कर दिया गया, इसमें अपीलार्थीगण द्वारा कोई सेवा में कमी नहीं की गयी है।
प्रत्यर्थी संख्या-1 के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि दूसरा खाता संख्या-303110 जो बन्द किया गया है, उक्त खाते में जमा धनराशि पर अर्जित साधारण ब्याज दिलाया जाये। जिला फोरम ने जो निर्णय एवं आदेश पारित किया है, वह सही एवं उचित है।
प्रत्यर्थी संख्या-2 की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ।
आधार अपील एवं सम्पूर्ण पत्रावली का परिशीलन किया गया, जिससे यह तथ्य विदित होता है कि परिवादी ने दिनांक 23.10.2004 को एमआईएस खाता संख्या-303110 खोला था तथा उसी दिन उसमें रूपये तीन लाख जमा किये थे। अपीलार्थीगण/विपक्षीगण द्वारा दिनांक 27.06.2006 को रू0 3,00,000/- में से रू0 2,76,000/- का चेक परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 के पक्ष में जारी किया गया तथा खाता संख्या-303110 बन्द कर दिया गया। अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्ता का यह तर्क कि एमआईएस खाता एक व्यक्ति केवल तीन लाख रूपये तक का खोल सकता है। परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 द्वारा तीन-तीन लाख रूपये के दो एमआईएस खाता अर्थात् कुल 06 लाख रूपये के दो एमआईएस खाता खोले गये थे। जांच के दौरान पता चलने पर परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 का एक खाता संख्या-303110 को बन्द कर दिया गया तथा परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 को चेक द्वारा रू0 2,76,000/- की धनराशि वापस की गयी। अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क किया कि परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 को उसके द्वारा जमा की गयी धनराशि पर अर्जित साधारण ब्याज का भुगतान किया जा सकता है।
Post Office (Monthly Income Account) Rule 1987 की धारा-5 में यह अंकित है कि :-
" Deposits and withdrawals :- (1) There shall be only one deposit in the account in multiple of one thousand rupees not exceeding rupees three lakh in case of single account and rupees six lakh in case of joint account.
[MOF (DEA) Notification No. GSR 8 (E) dated 1.2.2000 effective form 1.2.2000 and No. GSR 613 (E) dated 18.7.2000]
(2) Except provided in rule 10, no withdrawal shall be permitted under these rule before the expiry of a period of six years from the date of opening of an account."
उपरोक्त तथ्यों पर विचार करने के उपरांत हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 द्वारा दो एमआईएस खाता तीन-तीन लाख रूपये जमा करके खोले गये थे। विपक्षीगण/अपीलार्थीगण की एमआईएस स्कीम के अनुसार एक व्यक्ति तीन लाख रूपये से अधिक धनराशि एमआईएस खाता में नहीं जमा कर सकता है। अपीलार्थीगण द्वारा नियमानुसार एमआईएस खाता संख्या-303110 जो बन्द किया गया है, वही सही एवं उचित है, परन्तु जमा धनराशि पर साधारण ब्याज न देकर उक्त जमा धनराशि में से कटौती करते हुए रू0 2,76,000/- की धनराशि का भुगतान परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 को किया गया है, वह सही एवं उचित नहीं है। अत: अपीलार्थीगण/विपक्षीगण के पास एमआईएस खाता संख्या-303110 में रू0 3,00,000/- की धनराशि जब तक जमा थी, उस अवधि, अर्थात् दिनांक 23.10.2004 से 27.06.2006 तक अर्जित साधारण ब्याज के साथ जमा मूलधन रू0 3,00,000/- परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 प्राप्त करने का अधिकारी है। परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 को रू0 2,76,000/- का भुगतान किया जा चुका है, अत: उसे समायोजित किया जाये। तदनुसार प्रस्तुत अपील अंशत: स्वीकार किये जाने योग्य है।
आदेश
अपील अंशत: स्वीकार की जाती है। जिला फोरम, जौनपुर द्वारा परिवाद संख्या-222/2006, पीयूष मौर्या बनाम अधीक्षक डाक घर व अन्य में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 14.10.2011 अपास्त किया जाता है तथा अपीलार्थीगण/विपक्षीगण को आदेशित किया जाता है कि वह परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 के एमआईएस खाता संख्या-303110 में जमा धनराशि रू0 3,00,000/- पर दिनांक 23.10.2004 से 27.06.2006 तक की अवधि में तत्समय प्रचलित बचत खाता ब्याज दर से अर्जित साधारण ब्याज तथा मूल धनराशि रू0 3,00,000/- में से परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 को पूर्व में भुगतान की गयी धनराशि रू0 2,76,000/- को समायोजित करते हुए शेष धनराशि इस निर्णय एवं आदेश की तिथि से दो माह में परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या-1 को भुगतान करना सुनिश्चित करें, अन्यथा उक्त धनराशि पर 06 प्रतिशत ब्याज देय होगा।
पक्षकारान अपना-अपना अपीलीय व्यय स्वंय वहन करेंगे।
पक्षकारान को इस निर्णय की प्रमाणित प्रतिलिपि नियमानुसार उपलब्ध करा दी जाये।
(संजय कुमार) (महेश चन्द)
पीठासीन सदस्य सदस्य
लक्ष्मन, आशु0, कोर्ट-4