Uttar Pradesh

StateCommission

A/2011/1403

Post Office - Complainant(s)

Versus

Phoolmati - Opp.Party(s)

Dr U V Singh

25 Jan 2017

ORDER

STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP
C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010
 
First Appeal No. A/2011/1403
(Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission)
 
1. Post Office
a
...........Appellant(s)
Versus
1. Phoolmati
a
...........Respondent(s)
 
BEFORE: 
 HON'BLE MR. Udai Shanker Awasthi PRESIDING MEMBER
 HON'BLE MR. Raj Kamal Gupta MEMBER
 
For the Appellant:
For the Respondent:
Dated : 25 Jan 2017
Final Order / Judgement

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।

सुरक्षित

अपील सं0१४०२/२०११

 

(जिला मंच, उन्‍नाव द्वारा परिवाद सं0-२१६/२००९ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक १३-०४-२०११ के विरूद्ध)

 

१. सुपरिण्‍टेण्‍डेण्‍ट आफ पोस्‍ट आफिसेज, मुफस्सिल डिवीजन, कानपुर (एम), कानपुर।

२. पोस्‍ट मास्‍टर, पोस्‍ट आफिस करदहा, ग्राम स्‍वयंबरपुर, जिला उन्‍नाव।

                                          .................अपीलार्थीगण/विपक्षीगण।

बनाम्

१. राम नारायण यादव पुत्र श्री जागेश्‍वर यादव निवासी ग्राम स्‍वयंबरपुर खेड़ा, पोस्‍ट आफिस हिलौली, जिला उन्‍नाव।

                                           ................      प्रत्‍यर्थी/परिवादी।

अपील सं0१४०३/२०११

 

(जिला मंच, उन्‍नाव द्वारा परिवाद सं0-२१७/२००९ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक १३-०४-२०११ के विरूद्ध)

 

१. सुपरिण्‍टेण्‍डेण्‍ट आफ पोस्‍ट आफिसेज, मुफस्सिल डिवीजन, कानपुर (एम), कानपुर।

२. पोस्‍ट मास्‍टर, पोस्‍ट आफिस करदहा, ग्राम स्‍वयंबरपुर, जिला उन्‍नाव।

                                          .................अपीलार्थीगण/विपक्षीगण।

बनाम्

१. फूल मति पत्‍नी श्री राम नारायण यादव निवासी ग्राम स्‍वयंबरपुर खेड़ा, पोस्‍ट आफिस हिलौली, जिला उन्‍नाव।

                                           ................    प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी।

समक्ष:-

१. मा0 श्री उदय शंकर अवस्‍थी, पीठासीन सदस्‍य।

२. मा0 श्री राज कमल गुप्‍ता, सदस्‍य।

 

अपीलार्थीगण की ओर से उपस्थित   :- डॉ0 उदय वीर सिंह विद्वान अधिवक्‍ता।

प्रत्‍यर्थी/परिवादी की ओर से उपस्थित :- श्री पंकज त्रिपाठी विद्वान अधिवक्‍ता।

 

दिनांक : ०७-०३-२०१७.

 

मा0 श्री उदय शंकर अवस्‍थी, पीठासीन सदस्‍य द्वारा उदघोषित

निर्णय

प्रस्‍तुत अपीलें, जिला मंच, उन्‍नाव द्वारा परिवाद सं0-२१६/२००९ एवं परिवाद सं0-२१७/२००९ में पारित संयुक्‍त निर्णय एवं आदेश दिनांक १३-०४-२०११ के विरूद्ध योजित की

 

 

 

-२-

गयी हैं। दोनों अपीलों में समान तथ्‍यात्‍मक एवं विधिक वाद बिन्‍दु निहित हैं, अत: ये अपीलें साथ-साथ निस्‍तारित की जा रही हैं। निर्णय हेतु अपील सं0-१४०२/२०११ अग्रणी होगी।

      दोनों मामलों में प्रत्‍यर्थी/परिवादी परस्‍पर पति-पत्‍नी हैं। दोनों परिवादीगण द्वारा अपीलार्थी पोस्‍ट आफिस में धन निवेशित किया गया, जिसकी अदायगी अपीलार्थी पोस्‍ट आफिस द्वारा नहीं की गयी। प्रत्‍यर्थी/परिवादी रामनारायण यादव के कथनानुसार जनवरी, १९९६ में अपीलार्थी सं0-२ के माध्‍यम से उन्‍होंने एक ग्रामीण डाक जीवन बीमा पालिसी में निवेश किया था। यह बीमा पालिसी वर्ष २०१२ में परिपक्‍व होनी थी तथा प्रीमियम की धनराशि ५१०/- रू० प्रतिमाह थी। परिवादी द्वारा जनवरी, ९६ से दिसम्‍बर ९८ तक नियमितरूप से प्रीमियम की धनराशि अदा की गयी। इस प्रकार कुल १८,३६०/- रू० परिवादी द्वारा निवेशित किया गया। तदोपरान्‍त बीमा पालिसी चलाने में अपने आप को असमर्थ पाने पर उसने अपीलार्थी सं0-२ से बीमा न चलाने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की तब अपीलार्थी सं0-२ (तत्‍कालीन पोस्‍ट मास्‍टर अब्‍दुल रफीक) को उनके निर्देशानुसार व विभागीय औपचारिकता बतानेपर विश्‍वास में आकर मूल पासबुक एवं समस्‍त प्रीमियम जमा की रसीदें दिनांक ०७-१२-१९९८ को देकर रिसीविंग प्राप्‍त कर ली। काफी समय व्‍यतीत हो जाने के बाबजूद जमा धनराशि वापस प्राप्‍त न होने पर परिवादी ने अपीलार्थी सं0-२ से दबाब डालकर पूछा तो उन्‍होंने बताया कि उन्‍होंने भुगतान के लिए पासबुक व रसीदें मुख्‍यालय लखनऊ जरिये डाक सं0-४६१७ दिनांक ०९-०३-१९९९ भेज दी हैं, कुछ समय बाद भुगतान हो जायेगा। परिवादी द्वारा लखनऊ जानकारी करने पर मालूम हुआ कि परिवादी की पासबुक या रसीद भुगतान हेतु भेजी नहीं गयी। अत: परिवादी बराबर विभागीय उच्‍चाधिकारियों के समक्ष स्‍वयं उपस्थित होकर एवं पत्राचार के माध्‍यम से प्रयास करता रहा, किन्‍तु जमा धनराशि वापस नहीं हुई। दिनांक १३-०३-२००० को जरिए पत्र अपीलार्थीगण द्वारा परिवादी को सूचित किया गया कि उसके कागजात अग्रिम निस्‍तारण हेतु भेजे जा चुके हैं। अत: परिवादी पुन: प्रतीक्षा करने लगा। काफी समय प्रतीक्षा करने के बाद भुगतान प्राप्‍त न होने पर परिवादी ने पुन: प्रार्थना पत्र विभागीय उच्‍चाधिकारियों को प्रेषित किया। पत्र दिनांक २१-०३-२००० द्वारा परिवादी को सूचित

 

 

-३-

किया गया कि भुगतान के लिए पालिसी एवं मूल रसीदें जमा करें तब परिवादी ने पुन: अपीलार्थी को पत्र द्वारा सूचित किया कि मूल रसीदें व पासबुक पहले ही जमा की जा चुकी हैं और परिवादी स्‍वयं दिनांक ०८-०५-२००० को डिवीजनल मैनेजर के समक्ष उपस्थित हुआ तथा समस्‍त प्रकरण से अवगत कराकर मूल पासबुक व रसीदों के जमा की मूल रिसीविंग उनके पास जमा करके उक्‍त रिसीविंग की रिसीविंग प्राप्‍त की और आश्‍वस्‍त हो गया कि परिवादी की जमा धनराशि का भुगतान हो जायेगा, किन्‍तु भुगतान नहीं किया गया। पत्र दिनांक ०५-१०-२००० द्वारा परिवादी को सूचित किया गया कि उसकी पत्रावली कानपुर रीजन भेजी जा रही है और दिनांक ३१-१०-२००० को परिवादी को जानकारी दी गयी कि अब्‍दुल रफीक (तत्‍कालीन अपीलार्थी सं0-२) को ड्यूटी से पृथक करके जांच प्रारम्‍भ की गयी है। कुछ समय प्रतीक्षा के उपरान्‍त परिवादी ने पुन: प्रार्थना पत्र देकर धनराशि दिए जाने का आग्रह अपीलार्थीगण से किया तो दिनांक ०७-०२-२००१ को सर्वप्रथम बताया गया कि परिवादी की मात्र २४ किश्‍तें ही जमा हैं। परिवादी द्वारा सूचित ‍किया गया कि उसने ३६ माह की किश्‍तें जमा की हैं। किश्‍तें जमा करने में उसके द्वारा कोई लापरवाही नहीं की गयी। निरन्‍तर परिवादी के प्रयास किए जाने के बाबजूद उसकी धनराशि का भुगतान नहीं किया गया। अन्‍तत: परिवादी को एक पत्रचार की प्रतिलिपि दिनांक ३१-०५-२००४ को प्राप्‍त हुई जिसके माध्‍यम से अपीलार्थी सं0-१ ने मूल पासबुक व पालिसी व जमा की रसीदें भेजकर भुगतान की संस्‍तुति की। उक्‍त संस्‍तुति के बाबजूद प्रत्‍यर्थी को पत्र दिनांक ०८-०५-२००६ प्राप्‍त हुआ, जिसके द्वारा यह कहा गया कि परिवादी ने २४ किश्‍तें जमा की हैं। उसने शेष धनराशि १६,०३५/- रू० जमा नहीं किया है तथा पालिसी का नवीनीकरण भी नहीं कराया गया, जिसके फलस्‍वरूप उसका दावा निरस्‍त कर दिया गया। प्रत्‍यर्थी द्वारा दावे पर पुनर्विचार करने हेतु पत्राचार किया जाता  रहा, किन्‍तु उसका भुगतान नहीं किया गया। अन्‍तत: जमा की गयी धनराशि की मय ब्‍याज अदायगी तथा क्षतिपूर्ति की अदायगी हेतु परिवाद जिला मंच के समक्ष योजित किया गया।

      परिवाद सं0-२१७/२००९ की परिवादिनी श्रीमती फूलमति के कथनानुसार उसने भी

 

 

 

 

-४-

ग्रामीण डाक जीवन बीमा पालिसी में निवेश जनवरी, ९६ में किया तथा प्रीमियम की धनराशि ४८७/- रू० प्रतिमाह थी। परिवादिनी द्वारा जनवरी, १९९६ से दिसम्‍बर, १९९८ तक बराबर प्रीमियम की धनराशि १७,५३२/- रू० जमा की गयी। अन्‍य अभिकथन परिवाद सं0-२१६/२००९ के ही समान हैं।

      अपीलार्थीगण ने जिला मंच के समक्ष प्रतिवाद पत्र प्रस्‍तुत किया। अपीलार्थीगण ने उपरोक्‍त बीमा पालिसी जारी किया जाना स्‍वीकार किया किन्‍तु अपीलार्थीगण के कथनानुसार उपरोक्‍ता बीमा पालिसी के सन्‍दर्भ में कुल २४ माह की किश्‍तें जमा की गयीं। शेष किश्‍तें जमा नहीं की गयीं। अपीलार्थीगण के कथनानुसार तत्‍कालीन पोस्‍ट मास्‍टर डाकघर, करदहा, जिला उन्‍नाव श्री अब्‍दुल रफीक द्वारा वित्‍तीय अनियमितता की गयी। जांच के उपरान्‍त विभाग द्वारा उसे सेवानिवृत्‍त किया गया। अपीलार्थीगण के कथनानुसार यदि अब्‍दुल रफीक तत्‍कालीन डाकपाल द्वारा परिवादी से बीमा की प्रीमियम की धनराशि प्राप्‍त करने के उपरान्‍त बीमा की किश्‍तें जमा नहीं की गयी हैं तो उसके लिए वह शाखा डाकपाल ही उत्‍तरदायी है। अपीलार्थीगण के कथनानुसार प्रत्‍यर्थी/परिवादी ने उक्‍त सेवानिवृत्‍त डाक पाल को व्‍यक्तिगत रूप से पक्षकार नहीं बनाया है और न ही उक्‍त डाकपाल के कृत्‍यों के सन्‍दर्भ में कोई शिकायत विभाग में हीं की। वस्‍तुत: परिवादी ने डाकपाल अब्‍दुल रफीक से मिलकर षड़यन्‍त्र रचा है और अंशत: प्रीमियम की धनराशि जमा करके बीमा पालिसी का भुगतान नियम विरूद्ध चाहा है।

विद्वान जिला मंच ने प्रश्‍नगत निर्णय द्वारा दोनों परिवादोंको संयुक्‍त रूप से निस्‍तारित करते हुए दोनों परिवाद स्‍वीकार किए तथा अपीलार्थीगण को निर्देशित किया कि परिवाद सं0-२१६/२००९ के परिवादी को १८,३६०/- रू० अदा करें तथा इस धनराशि पर दिनांक ०१-०१-१९९९ से अदायगी की तिथि तक १८ प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्‍याज देय होगा। अपीलार्थीगण क्षतिपूर्ति के रूप में परिवादी को ४०,०००/- रू० की धनराशि अदा करें तथा ३,०००/- रू० परिवाद व्‍यय के रूप में अदा करें। इसी प्रकार परिवाद सं0-२१७/२००९ के सन्‍दर्भ में विद्वान जिला मंच द्वारा अपीलार्थीगण को निर्देशित किया गया कि अपीलार्थीगण परिवादिनी को १७,५३२/- रू० अदा करें तथा इस धनराशि पर दिनांक    ०१-०१-१९९९ से अदायगी की तिथि तक १८ प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्‍याज देय होगा।

 

 

-५-

अपीलार्थीगण क्षतिपूर्ति के रूप में परिवादी को ४०,०००/- रू० की धनराशि अदा करें तथा ३,०००/- रू० परिवाद व्‍यय के रूप में अदा करें।   

इस निर्णय से क्षुब्‍ध होकर ये अपीलें योजित की गयीं।

हमने अपीलार्थीगण की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता डॉ0 उदय वीर सिंह एवं प्रत्‍यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री पंकज त्रिपाठी के तर्क सुने तथा अभिलेखों का अवलोकन किया।

उल्‍लेखनीय है कि जिला मंच द्वारा पारित प्रश्‍नगत आदेश दिनांकित १३-०४-२०११ के विरूद्ध यह अपील दिनांक ०१-०८-२०११ को योजित की गयी है। इस निर्णय की प्रमाणित प्रतिलिपि अपीलार्थी को दिनांक १८-०४-२०११ को प्राप्‍त हुई है। अपील के प्रस्‍तुतीकरण में हुए विलम्‍ब को क्षमा करने हेतु अपीलार्थी डाक विभाग की ओर से प्रार्थना पत्र प्रस्‍तुत किया गया है तथा इस प्रार्थना में किए गये अभिकथनों के समर्थन में अपीलार्थी की ओर श्री पी0के0 मिश्रा का शपथ पत्र प्रस्‍तुत किया गया है। प्रस्‍तुत अपील के गुणदोष पर विचारण, जिसका विस्‍तृत विवरण आगे किया जा रहा है, से यह विदित होता है कि अपील में अंशत: बल है। अपील के प्रस्‍तुतीकरण में हुए विलम्‍ब के सम्‍बन्‍ध में अपीलार्थी की ओर से दिया गया स्‍पष्‍टीकरण सन्‍तोषजनक पाते हुए अपील के प्रस्‍तुतीकरण में हुआ विलम्‍ब क्षमा किया जाता है।

जहॉ तक गुणदोष के आधार पर अपील पर विचार किए जाने का प्रश्‍न है, प्रश्‍नगत प्रकरणों में मुख्‍य विवाद इस तथ्‍य का है कि –

(१) क्‍या परिवादीगण द्वारा प्रश्‍नगत बीमा पालिसी के सन्‍दर्भ में २४ मासिक किश्‍तें जमा की गयीं अथवा ३६ मासिक किश्‍तें जमा की गयी ?                             (२) क्‍या प्रत्‍यर्थीगण/परिवादीगण द्वारा डाकपाल अब्‍दुल रफीक के साथ षड़यन्‍त्र करके आंशिक किश्‍तों का भुगतान किए जाने के बाबजूद प्रश्‍नगत पालिसी के अन्‍तर्गत अवैध रूप से धनराशि प्राप्‍त करने का प्रयास किया गया ?

परिवादीगण का यह कथन है कि जनवरी, १९९६ से दिसम्‍बर ९८ तक प्रीमियम की अदायगी हेतु कुल ३६ माह की किश्‍तें निर्धारित की गयीं। आगे बीमा पालिसी    चलाने में असमर्थ पाने पर स्‍वयं परिवादीगण द्वारा बीमा पालिसी न चलाने की इच्‍छा

 

 

-६-

तत्‍कालीन डाकपाल के समक्ष व्‍यक्‍त की। तब तत्‍कालीन पोस्‍ट मास्‍टर अब्‍दुल रफीक के निर्देशानुसार तथा विभागीय औपचारिकताऐं बताने पर विश्‍वास में आकर मूल पासबुक तथा समस्‍त प्रीमियम जमा की रसीदें दिनांक ०७-१२-१९९८ को उन्‍हें देकर रिसीविंग प्राप्‍त कर ली। परिवाद की धारा-९ में परिवादी द्वारा यह भी अभिकथन किया गया है कि अपीलार्थी सं0-१ के पत्र दिनांक ३१-०५-२००४ की प्रतिलिपि उसे प्राप्‍त हुई थी जिसके माध्‍यम से अपीलार्थी सं0-१ ने मूल पासबुक व पालिसी एवं जमा रसीदों को भेजकर भुगतान की संस्‍तुति की, फिर भी परिवादी को भुगतान नहीं किया गया। उक्‍त पत्र की फोटोप्रति प्रत्‍यर्थी/परिवादी ने प्रस्‍तुत अपील के सन्‍दर्भ में आपत्ति के साथ संलग्‍नक-४(बी) के रूप में प्रेषित की है। इस सन्‍दर्भ में प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा जिला मंच के समक्ष प्रस्‍तुत परिवाद के अभिकथनों को भी अपीलार्थीगण ने प्रतिवाद पत्र में स्‍पष्‍ट रूप से इन्‍कार नहीं किया।

अपीलार्थीगण का यह कथन है कि उनके लेजर में प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा मात्र २४ किश्‍तें जमा किया जाना अंकित है। यदि अवैध रूप से तत्‍कालीन डाकपाल अब्‍दुल रफीक द्वारा परिवादी द्वारा कथित रूप से जमा की गयी अन्‍य किश्‍तें विभाग में जमा नहीं की गयीं तो उसके इस कृत्‍य के लिए विभाग उत्‍तरदायी नहीं माना जा सकता, क्‍योंकि प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा कुल २४ किश्‍तें जमा किया जाना ही अपीलार्थीगण के अभिलेखों में दर्शित है। पी0ओ0आई0एफ0 की नियमावली के नियम ३९ एवं ४० के अन्‍तर्गत उक्‍त पालिसी का भुगतान नहीं किया जा सकता। अपीलार्थीगण द्वारा अब्‍दुल रफीक के अनधिकृत कृत्‍यों की जांच के उपरान्‍त उसे बर्खास्‍त किया जा चुका है। अपीलार्थीगण का यह भी कथन है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादी ने अब्‍दुल रफीक को व्‍यक्तिगत रूप से पक्षकार नहीं बनाया है और न ही उसके कृत्‍यों के विरूद्ध कोई शिकायत प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा की गयी। वस्‍तुत: प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा अब्‍दुल रफीक तत्‍कालीन डाकपाल के साथ सॉंठगॉंठ करके प्रश्‍नगत बीमा पालिसी के अन्‍तर्गत अनधिकृत रूप से धनराशि की अदायगी की मॉंग  की गयी।

उल्‍लेखनीय है कि स्‍वयं अपीलार्थी यह स्‍वीकार करता है कि प्रश्‍नगत बीमा

 

 

 

 

-७-

पालिसी तत्‍कालीन डाकपाल शाखा करदहा श्री अब्‍दुल रफीक द्वारा जारी की गयी थी। प्रत्‍यर्थी/परिवादी का यह कथन है कि प्रश्‍नगत बीमा पालिसी के सन्‍दर्भ में नियमित रूप से मासिक प्रीमियक की धनराशि प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा जमा की गयी। दिसम्‍बर, १९९८ के पश्‍चात् प्रश्‍नगत बीमा पालिसी आगे जारी रखने में असमर्थ होने पर उन्‍होंने जमा की गयी धनराशि का भुगतान चाहा। इस पर तत्‍कालीन डाकपाल अब्‍दुल रफीक द्वारा विभागीय औपचारिकताऐं बताने पर विश्‍वास करके परिवादी द्वारा मूल पासबुक तथा जमा की रसीदें उन्‍हें दे दी गयीं तथा रिसीविंग प्राप्‍त की गयी। पक्षकारों के अभिकथनों से यह विदित होता‍ है कि ये अभिलेख अपीलार्थी को भी प्राप्‍त हुए। इसके बाबजूद अपीलार्थी द्वारा प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा जमा की गयी धनराशि का भुगतान नहीं किया गया। एक निवेशकर्ता द्वारा बीमा पालिसी जारी करने वाले सम्‍बन्धित डाकपाल को प्रश्‍नगत बीमा पालिसी से सम्‍बन्धित किश्‍तों की अदायगी किया जाना अस्‍वाभाविक नहीं माना जा सकता। जमा की गयी प्रीमियम की धनराशि के सन्‍दर्भ में निवेशकर्ता द्वारा जमा की रसीदें सम्‍बन्धित डाकपाल से प्राप्‍त की गयीं तथा पासबुक में जमा धनराशि का इन्‍द्राज किया जाना भी सुनिश्चित किया गया। एक निवेशकर्ता से अपने निवेश की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने हेतु इससे अधिक अपेक्षा नहीं की जा सकती। मात्र अपीलार्थी के अभिलेखों में प्रश्‍नगत बीमा पालिसी के सन्‍दर्भ में २४ मासिक किश्‍तों की अदायगी का इन्‍द्राज होने के आधार पर अपीलार्थी परिवादीगण की सॉंठगॉंठ तत्‍कालीन डाकपाल से होना अभिकथित कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में सम्‍भवत: अपीलार्थी निवेशक से यह अपेक्षा कर रहे हैं कि वह जमा की गयी धनराशि की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए न केवल पासबुक में इन्‍द्राज सुनिश्चित करें बल्कि यह भी सुनिश्चित करें कि विभाग में अनुरक्षित सम्‍बन्धित लेजर में जमा का इन्‍द्राज हुआ है अथवा नहीं। यह अपेक्षा आश्‍चर्यजनक एवं हास्‍यास्‍पद है। अपीलार्थी का यह कथन है कि परिवादीगण द्वारा अब्‍दुल रफीक के साथ साँठगॉंठ की गयी थी, मामले की परिस्थितियों के आलोक में अपीलार्थी की एक निवेशक के प्रति संवेदनहीनता ही प्रदर्शित करता है।

निर्विवाद रूप से प्रश्‍नगत बीमा पालिसी तत्‍कालीन पोस्‍ट मास्‍टर श्री अब्‍दुल   रफीक द्वारा जारी की गयी। अपीलार्थीगण का यह कथन नहीं है कि जनवरी, १९९६ से

 

 

-८-

दिसम्‍बर, १९९८ के मध्‍य अब्‍दुल रफीक डाकपाल करदहा में डाकपाल के पद पर कार्यरत नहीं थे। ऐसी परिस्थिति में प्रश्‍नगत बीमा पालिसी के सन्‍दर्भ में अब्‍दुल रफीक तत्‍कालीन पोस्‍ट मास्‍टर को अदा की गयी धनराशि, जमा की गयी धनराशि मानी जायेगी। निश्चित रूप से पोस्‍ट मास्‍टर के रूप में कार्य करते हुए प्रश्‍नगत बीमा पालिसी की किश्‍तों की अदायगी अब्‍दुल रफीक द्वारा अपने राजकीय कृत्‍यों के निष्‍पादन में किया गया कार्य माना जायेगा।

यह तथ्‍य भी उल्‍लेखनीय है कि स्‍वयं अपीलार्थीगण यह स्‍वीकार करते हैं कि अब्‍दुल रफीक द्वारा वित्‍तीय अनियमितता की गयी। उसके अनधिकृत कृत्‍यों के सन्‍दर्भ में उसके विरूद्ध जांच की गयी और जांच में दोषी पाये जाने के कारण उसे सेवा निवृत्‍त कर दिया गया। अपीलार्थीगण का यह कथन नहीं है एवं न ही ऐसी कोई साक्ष्‍य प्रस्‍तुत की गयी कि उक्‍त जांच के मध्‍य ऐसा कोई तथ्‍य प्रकाश में आया जिससे यह निष्‍कर्ष निकाला जा सके कि वस्‍तुत: परिवादी एवं अब्‍दुल रफीक के मध्‍य कोई सॉंठगॉंठ हुई। अत: अपीलकर्ता का यह कथन विश्‍वसनीय नहीं माना जा सकता कि प्रत्‍यर्थी/परिवादी एवं अब्‍दुल रफीक के मध्‍य सॉंठगॉंठ थी।

उपरोक्‍त तथ्‍यों के आलोक में विद्वान जिला मंच का यह निष्‍कर्ष स्‍वीकार किए जाने योग्‍य है कि मामले की परिस्थितियों के आलोक में प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा प्रश्‍नगत बीमा पालिसी के सन्‍दर्भ में ३६ मासिक किश्‍तों की अदायगी की गयी। अत: अपीलार्थीगण का यह तर्क स्‍वीकार किए जाने योग्‍य नहीं है कि पी0ओ0आई0एफ0 नियमावली के नियम ३९ एवं ४० के अन्‍तर्गत पालिसी का भुगतान नहीं किया जा सकता। क्‍योंकि अपीलार्थीगण द्वारा प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा ३६ किश्‍तों के भुगतान के बाबजूद जमा धनराशि का भुगतान नहीं किया जा रहा है। अत: हमारे विचार से जिला मंच का यह निष्‍कर्ष त्रुटिपूर्ण नहीं है कि अपीलार्थी द्वारा सेवा में त्रुटि की गयी है।

अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा यह तर्क भी प्रस्‍तुत किया गया कि विद्वान जिला मंच द्वारा आरोपित ब्‍याज की धनराशि अधिक है तथा क्षतिपूर्ति का निर्धारण मनमाना है। मामले के तथ्‍यों से यह स्‍पष्‍ट है कि परिवादीगण एक छोटे निवेशकर्ता हैं। उनकी निवेशित धनराशि का न केवल भुगतान नहीं किया गया बल्कि वर्षों

 

 

-९-

भुगतान हेतु उन्‍होंने परेशान किया गया। ऐसी परिस्थिति में में हमारे विचार से जमा की गयी धनराशि पर ब्‍याज के अतिरिक्‍त क्षतिपूर्ति के रूप में भी धनराशि की अदायगी कराया जाना न्‍यायसंगत होगा, किन्‍तु ब्‍याज की दर न्‍यायसंगत एवं क्षतिपूर्ति की धनराशि मामले की परिस्थितियों के आलोक में अनुपातिक होना उचित होगा। मामले के तथ्‍यों एवं परिस्थितियों के आलोक में हमारे विचार से जमा की गयी धनराशि पर १८ प्रतिशत के स्‍थान पर १० प्रतिशत वार्षिक साधारण वार्षिक ब्‍याज की दर से ब्‍याज दिलाया जाना तथा ४०,०००/- रू० क्षतिपूर्ति के स्‍थान पर २०,०००/- रू० क्षतिपूर्ति के रूप में दिलाया जाना न्‍यायसंगत होगा।     

आदेश

प्रस्‍तुत अपील आंशिक रूप से स्‍वीकार की जाती है। जिला मंच, उन्‍नाव द्वारा परिवाद सं0-२१६/२००९ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक १३-०४-२०११ मात्र इस सीमा तक संशोधित किया जाता है कि परिवादीगण द्वारा जमा की गयी धनराशि पर १८ प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्‍याज के स्‍थान पर १० प्रतिशत वार्षिक साधारण वार्षिक ब्‍याज की दर से ब्‍याज तथा ४०,०००/- रू० क्षतिपूर्ति के स्‍थान पर २०,०००/- रू० क्षतिपूर्ति के रूप में देय होगा। शेष आदेश की यथावत् पुष्टि की जाती है।

      अपीलीय व्‍यय-भार उभय पक्ष अपना-अपना वहन करेंगे।

      इस निर्णय की एक प्रमाणित प्रतिलिपि अपील सं0-१४०३/२०११ में रखी जाय।

      उभय पक्ष को इस निर्णय की प्रमाणित प्रति नियमानुसार उपलब्‍ध करायी जाय। 

 

                                              (उदय शंकर अवस्‍थी)

                                                पीठासीन सदस्‍य

 

 

                                               (राज कमल गुप्‍ता)

                                                   सदस्‍य

 

 

 

 

प्रमोद कुमार

वैय0सहा0ग्रेड-१,

कोर्ट-४.

 

 

 

 
 
[HON'BLE MR. Udai Shanker Awasthi]
PRESIDING MEMBER
 
[HON'BLE MR. Raj Kamal Gupta]
MEMBER

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