(सुरक्षित)
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ
अपील संख्या-3069/2006
(जिला उपभोक्ता आयोग, मेरठ द्वारा परिवाद संख्या-204/2004 में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 20.01.2006 के विरूद्ध)
ए.के. जैन, निवासी पल्लवपुररम, मेरठ 250110 ।
अपीलार्थी/परिवादी
बनाम
1. दि न्यू इण्डिया इंश्योरेंस कम्पनी लि0, ब्रांच आफिस 171-ए, आबुलेन, मेरठ।
2. थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर, मेडसेव हेल्थ केयर लि0, एफ-201 ए, लाडो सराय, बिहाइंड गोल्फ कोर्स, नई दिल्ली 110003 ।
प्रत्यर्थीगण/विपक्षीगण
समक्ष:-
1. माननीय श्री राजेन्द्र सिंह, सदस्य।
2. माननीय श्री सुशील कुमार, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से : श्री टी.एच. नकवी, विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी सं0-1 की ओर से : श्री बी.पी. दुबे, विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी सं0-2 की ओर से : कोई नहीं।
दिनांक: 08.06.2022
माननीय श्री सुशील कुमार, सदस्य द्वारा उद्घोषित
निर्णय
1. परिवाद संख्या-204/2004, ए.के. जैन बनाम दि न्यू इण्डिया इंश्योरेंस कं0लि0 तथा एक अन्य में विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग, मेरठ द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 20.01.2006 के विरूद्ध यह अपील स्वंय परिवादी द्वारा योजित की गई है। इस निर्णय एवं आदेश द्वारा विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने परिवाद इस आधार पर खारिज किया है कि परिवादी क्लेम साबित नहीं कर पाया।
2. परिवाद के तथ्यों के अनुसार परिवादी ने मेडिक्लेम पालिसी प्राप्त की थी। अपोलों अस्पताल, नई दिल्ली में परिवादी ने अपनी पुत्री का इलाज कराया, परन्तु बीमा कम्पनी ने क्लेम का भुगतान नहीं किया। परिवाद पत्र में यह भी उल्लेख है कि परिवादी की पुत्री लिपिका जैन दिनांक 21.07.2001 को दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। दुर्घटना के बाद चेहरे पर निशान रह गए थे, जिनके लिए प्लास्टिक सर्जरी अपोलो अस्पताल में दिनांक 03.04.2003, 21.06.2003 एवं दिनांक 13.10.2003 को हुई थी।
3. विपक्षी का कथन है कि परिवादी की पुत्री 24 घंटे के अन्दर तीन बार अस्पताल में भर्ती हुई, जबकि पालिसी की शर्त संख्या-2.3 के अनुसार कम से कम 24 घंटे भर्ती रहना आवश्यक है, इसलिए बीमा क्लेम देय नहीं है।
4. दोनों पक्षकारों की साक्ष्य पर विचार करने के पश्चात विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा यह निष्कर्ष दिया गया कि दुर्घटना के समय इजाज में जो खर्च हुआ, वह राशि बीमा कम्पनी द्वारा परिवादी को दे दी गई है। प्लास्टिक सर्जरी दुर्घटना के दो वर्ष बाद कराई गई है। परिवादी यह साबित करने में विफल रहा है कि दुर्घटना में आई चोटों के कारण प्लास्टिक सर्जरी करानी पड़ी, इसलिए बीमा क्लेम देय नहीं माना गया। तदनुसार परिवाद खारिज कर दिया गया।
5. इस निर्णय/आदेश को परिवादी द्वारा इन आधारों पर चुनौती दी गई है कि विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित निर्णय/आदेश विधि विरूद्ध है, अवैध तथा मनमाना है, कल्पना एवं संभावनाओं पर आधारित है। परिवादी द्वारा समस्त साक्ष्य इस आशय की दी गई है कि दुर्घटना के कारण चेहरे पर निशान रह गए थे, इसलिए प्लास्टिक सर्जरी कराई गई, इसलिए बीमा क्लेम अदा करने का आदेश दिया जाना चाहिए था।
6. अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता तथा प्रत्यर्थी संख्या-1 के विद्वान अधिवक्ता उपस्थित आए। प्रत्यर्थी संख्या-2 की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ। केवल अपीलार्थी एवं प्रत्यर्थी संख्या-1 के विद्वान अधिवक्ताओं को सुना गया तथा प्रश्नगत निर्णय/आदेश एवं पत्रावली का अवलोकन किया गया।
7. अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का यह तर्क है कि दुर्घटना के कारण चेहरे पर निशान बने रहे, इसलिए तीन बार अर्थात दिनांक 03.04.2003, 21.06.2003 एवं दिनांक 13.10.2003 को प्लास्टिक सर्जरी कराई गई। दुर्घटना की तिथि दिनांक 21.07.2001 है। यह इलाज दुर्घटना के परिणामों के कारण ही सम्पादित कराया गया है। बीमा पालिसी की क्लाउज संख्या-4.5 के अनुसार दुर्घटना के कारण जो भी आवश्यक उपचार हो, उनकी क्षतिपूर्ति की जा सकती है। परिवादी ने सशपथ बयान दिया है कि दुर्घटना के कारण ही चेहरे पर निशान बने रहे और दुर्घटना का ही परिणाम है कि प्लास्टिक सर्जरी कराने के लिए बाध्य होना पड़ा।
8. बीमा कम्पनी के विद्वान अधिवक्ता का यह तर्क है कि परिवादी की पुत्री तीनों बार 24 घंटे से कम समय अस्पताल में भर्ती रही, इसलिए बीमा क्लेम नहीं दिया जा सकता। उन्होंने बीमा पालिसी की शर्त संख्या-2.3 की ओर पीठ का ध्यान आकृष्ट कराया है। इस क्लाउज में जिन बीमारियों का उल्लेख किया गया है, उनमें यद्यपि प्लास्टिक सर्जरी का उल्लेख नहीं है, परन्तु प्लास्टिक सर्जरी भी उसी श्रेणी में शामिल मानी जानी चाहिए, जिनका उल्लेख 24 घंटे से कम समय के लिए इलाज कराने के लिए भी क्लेम देने के लिए दिया गया है, क्योंकि इस क्लाउज में सर्जरी शब्द का प्रयोग अनेक बार हुआ है, जैसे आई सर्जरी, डेंटल सर्जरी, इसलिए प्लास्टिक सर्जरी भी इसी श्रेणी में मानी जानी चाहिए। तदनुसार 24 घंटे से कम समय में अस्पताल में भर्ती रहने के बावजूद बीमा क्लेम देय बनता है। अपील तदनुसार स्वीकार होने योग्य है।
आदेश
9. प्रस्तुत अपील स्वीकार की जाती है। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित निर्णय/आदेश दिनांक 20.01.2006 अपास्त किया जाता है तथा परिवाद इस प्रकार स्वीकार किया जाता है कि बीमा कम्पनी द्वारा परिवाद पत्र में वर्णित तीनों चिकित्सीय खर्च अंकन 48,528/- रूपये परिवादी को उपलब्ध कराए जाए। इस राशि पर परिवाद प्रस्तुत करने की तिथि से भुगतान की तिथि तक 06 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज भी देय होगा।
उभय पक्ष इस अपील का व्यय स्वंय वहन करेंगे।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दे।
(राजेन्द्र सिंह) (सुशील कुमार)
सदस्य सदस्य
निर्णय/आदेश आज खुले न्यायालय में हस्ताक्षरित, दिनांकित होकर उद्घोषित किया गया।
(राजेन्द्र सिंह) (सुशील कुमार)
सदस्य सदस्य
लक्ष्मन, आशु0,
कोर्ट-2