उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, प्रथम, लखनऊ।
परिवाद संख्या 423/2000
श्रीमती गीता ..........परिवादिनी।
बनाम
लखनऊ विकास प्राधिकरण ...........विपक्षी।
12/12/2022
पत्रावली प्रस्तुत। पुकार करायी गयी। परिवादिनी अनुपस्थित। विपक्षी के विद्वान अधिवक्ता उपस्थित। आदेश पत्र के परिशीलन से विदित है कि दिनॉंक 26.09.2018 को माननीय राज्य आयोग द्वारा पारित आदेश के अनुपालन में यह प्रकरण पुन: मूल वाद में प्रस्तुत किया गया। आदेश पत्र के परिशीलन से यह भी विदित है कि पक्षकारों को सूचना दिये जाने के संबंध में कार्यवाही किये जाने के आदेश पारित किये गये हैं।
दिनॉंक 11.02.2021 को विपक्षी द्वारा वाद पत्र की प्रतिलिपि हेतु आवेदन दिया गया। पुन: मेरे समक्ष दिनॉंक 03.03.2022 को पेश हुई। मेरे द्वारा इस तथ्य का अवलोकन किया गया कि माननीय राज्य आयोग द्वारा दिनॉंक 18.07.2018 को पक्षकारों को सुनने का अवसर देकर निस्तारण किये जाने का आदेश पारित किया गया है।
चॅूंकि प्रस्तुत प्रकरण में परिवादिनी उपस्थित नहीं आ रही थी तो आयोग द्वारा आदेश पारित किया गया कि कार्यालय परिवादिनी के पते पर प्रकरण की अग्रेतर कार्यवाही हेतु सूचित करे। दिनॉंक 23.11.2022 को इस आशय से आदेश पारित किया गया कि परिवादिनी को उनके वाद पत्र में अंकित पते पर सूचना दे दी गयी है। रिपोर्ट के साथ वापस हुई। सूचना पते में अंकित पते पर मिलान किया गया।
मैने प्रार्थना पत्र का अवलोकन किया । परिवाद पत्र में उल्लिखित पते पर ही सूचना भेजी गयी है और वह पुन: आयोग को प्राप्त हो गयी। नोटिस की एक प्रति पत्रावली पर संलग्न है जिसमें तस्करा किया गया है कि जो पत्र भेजा गया है उसमें परिवादिनी को प्रस्तुत प्रकरण में अग्रेतर कार्यवाही किये जाने के संबंध में उल्लिखित किया गया है।
मैंने परिवादिनी द्वारा दाखिल वकालतनामा का अवलोकन किया। वकालतनामा श्री ताहिर अली एवं एस बनर्जी, एस0एन0 श्रीवास्तव एवं आर0के0 श्रीवास्तव का नाम लिखा गया है। यह प्रकरण वर्ष 2000 का है। 22 वर्ष का समय बीत गया है। इस वकालतनामा में विद्वान अधिवक्ता का पता भी अंकित नहीं है, जिससे कि इनके पते पर पत्र भेजा जा सके। शपथ पत्र को श्री ताहिर अली द्वारा सत्यापित किया गया है।
मैने अपीलीय आदेश का अवलोकन किया। राज्य आयोग के आदेश के अवलोकन से भी विदित है कि प्रत्यर्थी उस न्यायालय में भी उपस्थित नहीं हुई। उक्त अपील लखनऊ विकास प्राधिकरण के सचिव द्वारा दाखिल की गयी थी और प्रत्यर्थी श्रीमती गीता जो इस प्रकरण की प्रतिवादी हैं, पुन: दर्शाया गया है यानी कि अपीलीय न्यायालय में प्रत्यर्थी उपस्थित नहीं है और पत्रावली के सम्यक परिशीलन पर अब कोई भी पता ऐसा नहीं है जहॉं पर नोटिस भेजकर परिवादिनी को सूचित किया जा सके। ऐसी परिस्थिति में प्रकरण काफी पुराना है और वर्ष 2000 का है। 22 वर्ष पुराना प्रकरण है। अब ऐसी परिस्थिति में आयोग के पस कोई भी माध्यम नहीं है, जिससे परिवादिनी को सूचित किया जा सके। ऐसी परिस्थिति में पत्रावली अदम पैरवी एवं अनुपस्थिति में खारिज की जाती है। पत्रावली दाखिल दफ्तर हो।
परिवादिनी अग्रेतर कार्यवाही करने के लिये स्वतंत्र रहेगी।
(कुमार राघवेन्द्र सिंह) (सोनिया सिंह) (नीलकंठ सहाय)
सदस्य सदस्य अध्यक्ष