राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।
सुरक्षित
अपील संख्या-845/2011
(जिला मंच फोरम द्वितीय आगरा द्वारा परिवाद सं0-२२८/२००९ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक २८/०३/२०११ के विरूद्ध)
- मैनेजर स्पीट पोस्ट सेंटर जिला आगरा ।
- पोस्ट मास्टर जनरल आगरा रीजन आगरा।
.............. अपीलार्थीगण।
बनाम्
कु0 वसुन्धरा शर्मा पुत्री श्री विनोद कुमार शर्मा आफ ०२/०७ जीपीओ कम्पाउण्ड माल रोड आगरा।
............... प्रत्यर्थी।
समक्ष:-
१. मा0 श्री संजय कुमार, पीठासीन सदस्य।
२. मा0 श्री महेश चन्द, सदस्य।
अपीलार्थीगण की ओर से उपस्थित :- डा0 उदय वीर सिंह के अधिकृत सहयोगी
श्री सुनील कुमार विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित :- श्री अनिल कुमार मिश्रा विद्वान
अधिवक्ता ।
दिनांक : 23/02/2018
मा0 श्री महेश चन्द, सदस्य द्वारा उदघोषित
आदेश
प्रस्तुत अपील, जिला मंच फोरम द्वितीय आगरा द्वारा परिवाद सं0-२२८/२००९ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक २८/०३/२०११ के विरूद्ध योजित की गयी है।
संक्षेप में विवाद के तथ्य इस प्रकार हैं कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने बी0डी0एस0 प्रवेश परीक्षा २००८ में सम्मिलित होने के लिए आवेदन किया था और अपना आवेदन पत्र दिनांक १६/०९/२००८ को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को स्पीट पोस्ट सेवा द्वारा भेजा था। स्पीड पोस्ट सर्विस की रसीद सं0-१०९६२९६८३ दिनांक १६/०९/२००८ को डाकघर द्वारा निर्गत की गयी । उक्त आवेदन पत्र विश्वविद्यालय में पहुंचने की अंतिम तिथि दिनांक २४/०९/२००८ थी किन्तु अपीलकर्ता/विपक्षीगण की लापरवाही के कारण उपरोक्त स्पीड पोस्ट का पैकेट दिनांक ०१/१०/२००८ को पहुंचा जो दिनांक ०६/१०/२००८ को परिवादी/प्रत्यर्थी को वापस प्राप्त हो गया। प्रत्यर्थी/परिवादी के पिता श्री विनोद कुमार शर्मा ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के निदेशक से दिनांक ०७/१०/२००८ को संपर्क किया और आग्रह किया कि उनका आवेदन पत्र स्वीकार कर लें किन्तु उन्होंने विलंब के आधार पर उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इससे परिवादिनी व उसके पिता को बहुत अधिक मानसिक पीड़ा हुई। परिवादिनी ने अपने अधिवक्ता से माध्यम से दिनांक १८/१०/२००८ को अपीलकर्ता/विपक्षी के उच्च अधिकारियों को एक नोटिस भेजा परन्तु उत्तर में अपीलकर्ता/विपक्षीगण ने अपनी त्रुटि स्वीकार करते हुए दिनांक १२/११/२००८ को रू0 २५/- चेक सं0-६०८६४५ भेजा। अपीलकर्ता/विपक्षीगण के अधिवक्ता ने प्रत्यर्थी/परिवादिनी के अधिवक्ता को दिनांक २०/०२/२००९ को एक पत्र भेजा जिसमें उसने परिवादिनी से अपना खर्चे की पूर्ण धनराशि रू0 २२००/- और पीडि़त पक्ष को रू0 २५/-का चेक वापस करने को कहा गया।
परिवाद पत्र में उपरोक्त उल्लिखित तथ्यों का वर्णन किया गया है जिसमें विभिन्न मदों में कुल रू0 १६ लाख क्षतिपूर्ति दिलाने की प्रार्थना की गयी।
परिवाद पत्र का उपभोक्ता फोरम के समक्ष अपीलकर्ता/विपक्षीगण द्वारा विरोध किया गया। उभय पक्षों के द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों का परिशीलन करने तथा उनको सुनने के बाद विद्वान जिला मंच ने निम्नलिखित आदेश पारित किया-
‘’ परिवाद पत्र स्वीकार किया जाता है। विपक्षीगण को आदेशित किया जाता है कि वह परिवादिनी को धनराशि रू0 २५०००/- बतौर मानसिक, शारीरिक व आर्थिक क्षतिपूर्ति हेतु इस निर्णय के ३० दिवस के भीतर अदा करें। इसके अतिरिक्त बतौर परिवाद व्यय रू0 १०००/- भी उक्त अवधि में परिवादिनी को अदा करे। अवहेलना करने पर परिवादिनी मसस्त धनराशि पर निर्णय की तिथि से वास्तविक भुगतान की तिथि तक ०६ प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज पाने की अधिकारिणी होगी । ‘’
इसी आदेश से क्षुब्ध होकर यह अपील योजित की गयी है।
अपील में अपीलकर्ता की ओर से मुख्य आधार लिया गया है कि प्रश्नगत आदेश इंडियन पोस्ट आफिस अधिनियम १८९८ की धारा ०६ तथा इंडियन पोस्ट आफिस नियमावली १९३३ के नियम ६६बी के प्राविधानों के विपरीत है। परिवाद पत्र में ऐसा कोई आरोप अपीलकर्ता/विपक्षीगण पर नहीं लगाया गया है कि उसने अथवा उसके कर्मचारियों ने जानबूझकर लापरवाही की है। उपरोक्त उल्लिखित इंडियन पोस्ट आफिस अधिनियम १८९८ तथा इंडियन पोस्ट आफिस नियमावली १९३३ के पाविधानों के अन्तर्गत स्पीड पोस्ट के खो जाने पर स्पीड पोस्ट शुल्क की दो गुनी धनराशि अथवा रू0 १०००/- जो भी कम हो का मुआवजा दिया जा सकता है। विद्वान जिला मंच ने इन तथ्यों और प्राविधानों की अनदेखी कर त्रुटि की है और प्रश्नगत आदेश पारित किया है।
अपील सुनवाई हेतु पीठ के समक्ष प्रस्तुत हुई। अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता डा0 उदय वीर सिंह के अधिकृत सहयोगी अधिवक्ता श्री सुनील कुमार एवं प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता श्री अनिल कुमार मिश्रा उपस्थित हैं। उभय पक्षों की बहस सुनी गयी। पत्रावली पर उपलब्ध अभिलेखों का परिशीलन किया गया।
यह तथ्य निर्विवाद है कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी द्वारा दिनांक १६/०९/२००८ को स्पीड पोस्ट अपीलकर्ता/प्रत्यर्थी के माध्यम से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को भेजा गया था। यह स्पीड पोस्ट ३-४ दिन की अवधि के बाद दिनांक ०१/१०/२००८ को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को में पहुंचा जिसे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा विलंब के कारण लेने से इनकार किया गया। विलंब से आवेदन पत्र पहुंचने के कारण परिवादिनी अपने बी0डी0एस0 की मेडिकल प्रवेश परीक्षा २००८ में सम्मिलित नहीं होसकी। उसके द्वारा मेडिकल परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए काफी तैयारी की गयी थी। इस पर उसका काफी समय और धनराशि व्यय हुई और उसे परीक्षा में सम्मिलित न होने के कारण काफी मानसिक क्षति हुई। यह भी तथ्य निर्विवाद है कि अपीलकर्ता/विपक्षी द्वारा रू0 २५/- का चेक प्रत्यर्थी/परिवादिनी को इस आशय से भेजा गया कि उनके स्तर पर डाक पहुंचाने में विलंब हुआ है। यह इस बात की स्वीकृति है कि डाक को विलंब से पहुचाने में अपीलकर्तागण के स्तर पर लापरवाही की गयी है। पोस्ट आफिस अधिनियम १८९८ की धारा ०६ का उल्लेख किया है जिसमें कहा गया है कि किसी भी डाक के खो जाने या किसी अन्यत्र जगह पर डिलीवरी हो जाने अथवा उसके विलंब से पहुंचने अथवा डाक में रखे सामान की क्षतिग्रस्त होने से डाकघर तथा उसके अधिकारियों को सुरक्षा कवच उपलब्ध है। उन्होंने इंडियन पोस्ट आफिस अधिनियम १८९८ के नियम ०६ का उदृत दिया गया है-
‘’ Exemption from liability for loss, misdelivery, delay or damage.- The Government shall not incur any liability by reason of the loss, misdelivery or delay of, or damage to, any postal article in course of transmission by post, except in so far as such liability may in express terms be undertaken by the Central Government as hereinafter provided; and no officer of the Post Office shall incur any liability by reason of any such loss, misdelivery, delay or damage, unless he has caused the same fraudulently or by his willful act or default.’’
अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता ने कहा कि इस संबंध में मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा भी अनेक निर्णय पारित किए गए हैं जिसमें इस प्रकार की दण्ड में डाकघर को सुरक्षा कवच दिया गया है।
इसके अतिरिक्त अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता ने मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा रिवीजन पिटीशन सं0-७११/२०१७ IV (2017) CPJ 10 (NC) मैनेजर स्पीड पोस्ट एवं अन्य बनाम भंवर लाल गोरा में पारित आदेश का भी उदृण दिया गया है जिसमें कहा गया है कि विलंब से डाक की डिलीवरी होने पर स्पीड पोस्ट के शुल्क को वापस किया जा सकता है। इस प्रकरण में भी अपीलकर्ता द्वारा स्पीड पोस्ट के शुल्क को चेक के माध्यम से वापस किया गया है। अपीलकर्ता की अपील में बल है। तदनुसार अपील स्वीकार किए जाने योग्य है।
आदेश
अपील स्वीकार की जाती है। जिला मंच द्वारा पारित प्रश्नगत आदेश निरस्त किया जाता है।
उभयपक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
उभयपक्ष को इस आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि नियमानुसार निर्गत की जाए।
(संजय कुमार) (महेश चन्द)
पीठासीन सदस्य सदस्य
सत्येन्द्र, कोर्ट-४