सुरक्षित
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0 लखनऊ।
अपील संख्या : 764/2013
(जिला उपभोक्ता फोरम, हमीरपुर द्वारा परिवाद संख्या-24/2011 में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 20-02-2013 के विरूद्ध)
- Superintendent of Post Offices, Banda Division, Banda.
- UP Dak Pal, Biwar, Tehsil, Maudaha, District-Hamirpur.
- Superintendent of Post Offices, Faizabad Division, Faizabad.
- C.P.M.G. (Maha Prabandhak) U.P. Circle, Lucknow.
...अपीलार्थी/विपक्षीगण
बनाम्
Jaipal Son of Rameshwar Resident of Village and Post Office-Biwar, Tehsil-Maudaha, District- Hamirpur..
..........प्रत्यर्थी/परिवादी
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित- श्री कृष्ण पाठक।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित- कोई नहीं।
समक्ष :-
- मा0 श्री राज कमल गुप्ता, पीठासीन सदस्य।
- मा0 श्री महेश चन्द, सदस्य।
दिनांक : 28 -09-2018
मा0 श्री महेश चन्द, सदस्य द्वारा उद्घोषित निर्णय
परिवाद संख्या-24/2011 जयपाल बनाम् डाक अधीक्षक, प्रधान डाकघर व तीन अन्य में जिला उपभोक्ता फोरम, हमीरपुर द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय एवं आदेश दिनांक 20-02-2013 के विरूद्ध यह अपील उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा-15 के अन्तर्गत इस आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई है।
इस प्रकरण में विवाद के संक्षिप्त सुसंगत तथ्य इस प्रकार है कि परिवादी ने दिनांक 14-11-2009 को विपक्षी संख्या-2 के यहॉं से एक रजिस्टर्ड पत्र अनिल
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कुमार श्रीवास्तव निवासी-28/4, राम नगर कालोनी, पहाड़गंज, फैजाबाद के पास भेजा था जिसमें एम0ए0 फाइनल जीव विज्ञान का फार्म तथा जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के पक्ष में देय रू0 3900/- का बैंक ड्राफ्ट संख्या-1164 भी था। परिवादी द्वारा भेजा गया पत्र जब गन्तव्य स्थान पर प्राप्तकर्ता तक नहीं पहुँचा तब परिवादी ने विपक्षी संख्या-2 से सम्पर्क किया तो विपक्षी संख्या-2 द्वारा पत्र प्राप्तकर्ता भेजा जाना बताया। परिवादी ने दिनांक 15-01-2010 को विपक्षी संख्या-2 को प्रार्थना पत्र तथा दिनांक 28-01-2010 को विपक्षी संख्या-1 को प्रार्थना पत्र दिया तथा भेजे गये पत्र के संबंध में जानकारी चाही, फिर भी परिवादी के उक्त पत्र की कोई जानकारी विपक्षीगण द्वारा नहीं दी गयी। परिवादी द्वारा भेजा गया पत्र गन्तव्य तक न पहुँचने से परिवादी को काफी नुकसान हुआ तथा पत्र में रखा ड्राफ्ट खो गया तथा फार्म न पहुँचने से परिवादी एम0ए0 फाइनल की परीक्षा में सम्मिलित नहीं हो सका। इससे परिवादी को मानसिक व आर्थिक क्षति हुई। इसलिए परिवादी ने विपक्षी के स्तर पर सेवा में कमी से क्षुब्ध होकर परिवाद संख्या-24/2011 जिला फोरम, हमीरपुर के समक्ष योजित किया है।
विपक्षीगण की ओर से प्रतिवाद पत्र दाखिल करते हुए कथन किया गया कि विपक्षी संख्या-2 के यहॉं से रजिस्ट्री किया गया तथा शिकायत पर विपक्षी संख्या-3 से जानकारी लेना स्वीकार किया गया। प्रतिवादपत्र में यह भी कहा गया कि परिवादी का पंजीयन पत्र संख्या-21 दिनांक 14-11-2009 को बुक किया था तथा संख्या-14/16 पर अंकित करके अग्रसारित कर दिया गया था। इसकी जानकारी विपक्षी संख्या-3 के फैजाबाद डाकपाल के कार्यालय से प्राप्त हुई। वितरण के दौरान किसी पंजीकृत पत्र के खोने पर विभाग की कोई जिम्मेदारी नहीं है। कीमती प्रपत्र बीमाकृत पत्रके द्वारा प्रेषित किया जाना चाहिए था इस आधार पर परिवाद खारिज होने योग्य है। परिवाद आधारहीन है और निरस्त होने योग्य है।
जिला फोरम ने पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत किये गये साक्ष्यों का परिशीलन करने तथा उनके तर्कों को सुनने के बाद आक्षेपित निर्णय दिनांक 20-02-2013 के द्वारा परिवादी का परिवाद आंशिक स्वीकार कर लिया तथा निम्नलिखित आदेश पारित किया :-
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‘’ परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है। विपक्षीगण को आदेशित किया जाता है कि वे परिवादी को 30 दिन के अंदर संयुक्त या पृथकत: रू0 5,000/- मानसिक आघात के मद में क्षतिपूर्ति के रूप में तथा रू0 1,000/- वाद व्यय के मद में अदा करेंगे। ‘’
उपरोक्त आक्षेपित आदेश से क्षुब्ध होकर यह अपील योजित की गयी है।
अपील की सुनवाई के समय अपीलार्थीगण की ओर से विद्धान अधिवक्ता श्री कृष्ण पाठक उपस्थित हुए। प्रत्यर्थी की ओर से कोई उपस्थित नहीं है।
पीठ द्वारा अपीलार्थी के विद्धान अधिवक्ता के तर्कों को सुना गया तथा आक्षेपित निर्णय और आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया गया।
पत्रावली के अवलोकन से यह तथ्य निर्विवाद रूप से स्वीकार है कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने दिनांक 14-11-2009 को पंजीकृत डाक से एक पत्र भेजा। किन्तु उक्त पत्र निर्धारित गन्तव्य स्थान पर प्राप्तकर्ता तक नहीं पहुँचा। इससे निश्चित रूप से प्रत्यर्थी/परिवादी को क्षति हुई तथा मानसिक वेदना भी हुई जिसके लिए विद्धान जिला फोरम ने उपरोक्त उल्लिखित आक्षेपित आदेश पारित करते हुए क्षति की प्रतिपूर्ति का आदेश अपीलार्थी/विपक्षी को दिया।
अपील में यह आधार भी लिया गया है कि विद्धान जिला फोरम ने प्रश्नगत आदेश के द्वारा अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए गलती की है। अपीलार्थी/विपक्षी के स्तर पर सेवा में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं की गयी है और अपील में प्रश्नगत आदेश को खण्डित करने की प्रार्थना की गयी है।
इण्डियन पोस्ट आफिस रूल्स (स्पीड पोस्ट रूल्स की धारा-66-बी) के अन्तर्गत डाक के विलम्ब से वितरित होने के कारण क्षतिपूर्ति के रूप में स्पीड पोस्ट में हुए व्यय के लिए दोगुनी धनराशि का भुगतान परिवादी को किया जा सकता है। जिसकी परिवादी, विपक्षी से मांग कर सकता है। अपील के आधार में यह भी अभिकथन किया गया है कि पोस्ट आफिस अधिनियम की धारा-6 के अन्तर्गत डाक के गलत पते पर वितरित होने अथवा उसे विलम्ब से पहुँचाने अथवा डाक के क्षतिग्रस्त हो जाने पर, किसी भी प्रकार का दायित्व सरकार/डाक विभाग पर नहीं होगा। अपील में धारा-6 को निम्न प्रकार से अपने अपील के आधार में उद्धरत किया गया है।
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Section-6 Exemption from liability for loss, miss-delivery, delay or damages.
“The Government shall not incur any liability by reason if the loss, miss-delivery or delay of, or damages to, any postal article in course of transmission by post, expect in so far as such liability may in express terms be undertaken by the Central Givernment as herein after provided, and no officer of the post office shall incur any liability by reason of any such loss, miss-delivery, delivery or damages, unless she has caused the same fraudulently or his willful act or default.”
अपील में यह आधार भी लिया गया है कि विद्धान जिला फोरम ने प्रश्नगत आदेश के द्वारा परिवादी को 30 दिन के अंदर संयुक्त या पृथकत: रू0 5,000/- मानसिक आघात गलत एवं मनमाने ढंग से अनुमन्य किया है। अपीलार्थी/विपक्षी के स्तर पर सेवा में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं की गयी है और अपील में प्रश्नगत आदेश को खण्डित करने की प्रार्थना की गयी है।
अपीलार्थी के विद्धान अधिवक्ता के तर्कों को सुना गया तथा पत्रावली पर उपलब्ध अभिलेखों का परिशीलन किया गया।
पत्रावली पर उपलब्ध अभिलखों के परिशीलन से यह स्पष्ट है कि डाकघर अधिनियम-1898 की धारा-6 के अन्तर्गत डाकघर/सरकार को किसी भी डाक के गलत पते पर वितरित हो जाने अथवा उसे विलम्ब से पहुँचाने अथवा उसे क्षतिग्रस्त को जाने के कारण उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। अधिक से अधिक स्पीड पोस्ट पर हुए व्यय की धनराशि उसे वापस की जा सकती है। इस प्रकरण में भी डाक 2-3 दिन विलम्ब से वितरित हुई है क्योंकि बीच में गुरूनानक जयन्ती का अवकाश था। उपरोक्त उल्लिखित डाकघर अधिनियम-1898 की धारा-6 के अन्तर्गत इस प्रकार डाक वितरण में हुए विलम्ब के लिए शासन/डाकघर को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। इण्डियन पोस्ट आफिस रूल्स (स्पीड पोस्ट रूल्स की धारा-66-बी) के अन्तर्गत डाक के विलम्ब से वितरित होने के कारण क्षतिपूर्ति के रूप में स्पीड पोस्ट में हुए व्यय के लिए दोगुनी धनराशि का भुगतान परिवादी को किया जा सकता है। इस प्रकरण में भी अधिक से अधिक स्पीड पोस्ट
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पर लगाये गये डाक टिकटों की धनराशि की दुगनी धनराशि प्रत्यर्थी/परिवादी को डाक विभाग द्वारा वापस की जा सकती है। विद्धान जिला फोरम ने डाकघर के उपरोक्त प्राविधानों की अनदेखी करके त्रुटि की है और प्रश्नगत आदेश त्रुटिपूर्ण ढंग से पारित किया है जो खण्डित होने योग्य है।
अपीलार्थी की अपील में बल है। उपरोक्त विवेचना के आधार पर हम इस मत के है कि प्रत्यर्थी/परिवादी अधिक-से-अधिक डाक टिकटों में व्यय हुई धनराशि की दुगनी धनराशि अपीलार्थी/विपक्षी से प्राप्त करने का अधिकारी है। अत: अपीलार्थी की अपील आंशिक रूप से स्वीकार किये जाने योग्य है।
आदेश
अपील आंशिक रूप से स्वीकार की जाती है। प्रश्गनत आदेश खण्डित करते हुए अपीलार्थी/विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह प्रत्यर्थी/परिवादी को उसके द्वारा डाक टिकटों में व्यय की गयी धनराशि की दुगनी धनराशि का भुगतान करें।
उभयपक्ष अपना-अपना अपीलीय व्यय स्वंय वहन करेंगे।
उभयपक्षों को निर्णय की प्रमाणित प्रति नियमानुसार उपलब्ध करायी जाए।
( राज कमल गुप्ता ) ( महेश चन्द )
पीठासीन सदस्य सदस्य
कोर्ट नं0-3, प्रदीप मिश्रा,