Uttar Pradesh

StateCommission

A/1006/2019

Department of Post and Telegraph - Complainant(s)

Versus

Hariom - Opp.Party(s)

Dr. Udai Veer Singh

31 Jan 2020

ORDER

STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP
C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010
 
First Appeal No. A/1006/2019
( Date of Filing : 19 Aug 2019 )
(Arisen out of Order Dated 12/06/2019 in Case No. C/284/2007 of District Lucknow-I)
 
1. Department of Post and Telegraph
Through Post Mater Chowk Branch Lucknow
...........Appellant(s)
Versus
1. Hariom
S/O Late Sri Som nath R/O 292/3 Tulsi DAS Karg Chowk Lucknow
...........Respondent(s)
 
BEFORE: 
 HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN PRESIDENT
 
For the Appellant:
For the Respondent:
Dated : 31 Jan 2020
Final Order / Judgement

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखन

अपील संख्‍या-1006/2019

(सुरक्षित)

(जिला उपभोक्‍ता फोरम-प्रथम, लखनऊ द्वारा परिवाद संख्‍या 284/2007 में पारित आदेश दिनांक 12.06.2019 के विरूद्ध)

Department of Posts and telegraph through Post Master Chowk Branch, Lucknow.

                          ..................अपीलार्थी/विपक्षी सं01

बनाम

1. 1/1 Hariom aged about 46 year S/o Late Sri Som Nath R/o 292/3 Tulsi Das Marg Chowk, Lucknow.

                          ...................प्रत्‍यर्थी सं01/परिवादी

2. Sri Jagmohan S/o Late Sri Somnath R/o 292/03, Tulsidas Marg Chowk, Lucknow.

                      ...................प्रत्‍यर्थी सं02/परिवादी सं02

3. Smt Rukhsana, Agent (Post Office) (Presently in District Jail) W/o Jahangir through Jail Superintendent, District Jail, Lucknow.

                       ...................प्रत्‍यर्थी सं03/विपक्षी सं02

समक्ष:-

माननीय न्‍यायमूर्ति श्री अख्‍तर हुसैन खान, अध्‍यक्ष।

अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : डॉ0 उदय वीर सिंह,                               

                           विद्वान अधिवक्‍ता।

प्रत्‍यर्थीगण सं01 व 2 की ओर से उपस्थित : श्री सुधीर खन्‍ना,                               

                                      विद्वान अधिवक्‍ता।

प्रत्‍यर्थी सं03 की ओर से उपस्थित : कोई नहीं।

दिनांक: 19.03.2020

मा0 न्‍यायमूर्ति श्री अख्‍तर हुसैन खान, अध्‍यक्ष द्वारा उदघोषित

निर्णय

परिवाद संख्‍या-284/2007 हरिओम व एक अन्‍य बनाम डिपार्टमेन्‍ट आफ पोस्‍ट एण्‍ड टेलीग्राफ द्वारा पोस्‍ट मास्‍टर चौक ब्रांच, लखनऊ व एक अन्‍य में जिला उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष फोरम-प्रथम,  लखनऊ   द्वारा   पारित   निर्णय   और   आदेश                   

 

-2-

दिनांक 12.06.2019 के विरूद्ध यह अपील धारा-15 उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्‍तर्गत राज्‍य आयोग के समक्ष प्रस्‍तुत की गयी है।

जिला फोरम ने आक्षेपित  निर्णय  व  आदेश  के द्वारा  परिवाद आंशिक रूप से स्‍वीकार करते हुए निम्‍न आदेश पारित किया है:-

''परिवादीगण का परिवाद आंशिक रूप से स्‍वीकार किया जाता है। विपक्षी संख्‍या-01 को निर्देश दिया जाता है कि वह परिवादीगण द्वारा जमा की गयी राशि मुबलिग-48,000/-(अड़तालिस हजार रूपया मात्र) उस पर उत्‍पन्‍न बोनस पर 09 प्रतिशत वार्षिक ब्‍याज की दर से दिनॉक-19.05.2000 से भुगतान की तिथि तक निर्णय की तिथि से 30 दिनों के अन्‍दर अदा करेगें, साथ ही साथ परिवादीगण को हुई मानसिक, शारीरिक क्षति के लिये मुबलिग-10,000/-(दस हजार रूपया मात्र) एवं वाद व्‍यय के लिये मुबलिग-5,000/-(पॉच हजार रूपया मात्र) रूप्‍ये भी अदा करेंगें। यदि आदेश का पालन निर्धारित अवधि में नहीं होता है, तो उपरोक्‍त                समपूर्ण राशि 12 प्रतिशत वार्षिक ब्‍याज की दर से भुगतेय              होगी।''

जिला फोरम के निर्णय व आदेश से क्षुब्‍ध होकर परिवाद के विपक्षी संख्‍या-1 डिपार्टमेन्‍ट आफ पोस्‍ट एण्‍ड टेलीग्राफ द्वारा पोस्‍ट मास्‍टर चौक ब्रांच, लखनऊ ने यह अपील प्रस्‍तुत की है।

अपील की सुनवाई के समय अपीलार्थी की ओर  से  विद्वान

 

 

-3-

अधिवक्‍ता  डॉ0 उदय वीर‍ सिंह और प्रत्‍यर्थीगण संख्‍या-1 व 2 की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री सुधीर खन्‍ना उपस्थित आये हैं। प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ है।

मैंने अपीलार्थी एवं प्रत्‍यर्थीगण संख्‍या-1 व 2 के विद्वान अधिवक्‍तागण के तर्क को सुना है और आक्षेपित निर्णय व आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया है। 

उभय पक्ष की ओर से लिखित तर्क प्रस्‍तुत किया गया है। मैंने उभय पक्ष की ओर से प्रस्‍तुत लिखित तर्क का भी अवलोकन किया है।

अपील के निर्णय हेतु संक्षिप्‍त सुसंगत तथ्‍य इस प्रकार हैं कि परिवादीगण श्रीमती उर्मिला कान्‍ता एवं श्री जगमोहन ने अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 एवं प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3/विपक्षी संख्‍या-2 के विरूद्ध परिवाद जिला फोरम के समक्ष इस कथन के साथ प्रस्‍तुत किया है कि उन्‍होंने प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 परिवाद में विपक्षी संख्‍या-2 के माध्‍यम से अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 के यहॉं 48,000/-रू0 मासिक आय योजना में दिनांक 17.05.1994 को जमा कराया, जिसका खाता संख्‍या-1250 था और परि‍पक्‍वता तिथि दिनांक 17.05.2000 थी तथा परिपक्‍वता राशि 48,000/-रू0 एवं उस पर उत्‍पन्‍न बोनस था।

परिवाद पत्र के अनुसार उपरोक्‍त परिवादीगण का कथन है             कि दिनांक 19.05.2000 को वे अपने उपरोक्‍त खाते की पासबुक और पुन: उपरोक्‍त राशि जमा करने हेतु फार्म भरकर  चौक  स्थित

 

 

-4-

पोस्‍ट आफिस के काउन्‍टर पर गये तब वहॉं उपस्थित कर्मचारी ने राशि पुन: जमा करने से मना कर दिया और पुन: योजना में राशि जमा करने हेतु उसने प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3, जो परिवाद में विपक्षी संख्‍या-2 है, के माध्‍यम से आने को कहा। तभी काउन्‍टर के बाहर खड़ी प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3, जो परिवाद में विपक्षी संख्‍या-2 है, को उपरोक्‍त परिवादीगण ने भरा हुआ फार्म मासिक आय योजना में जमा करने हेतु दिया और उसने 48,000/-रू0 की रसीद                उपरोक्‍त परिवादीगण को दी। इसके साथ ही उपरोक्‍त प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 परिवाद की विपक्षी संख्‍या-2 और अपीलार्थी/विपक्षी  संख्‍या-1 के कर्मचारी ने परिवादीगण से कहा कि वे पुन: राशि जमा करने के कागजात लेने के लिए एक सप्‍ताह के बाद आयें।

परिवाद पत्र के अनुसार उपरोक्‍त परिवादीगण का कथन है             कि दिनांक 24.05.2000 को समाचार पत्रों के द्वारा उन्‍हें ज्ञात हुआ कि प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 परिवाद की विपक्षी संख्‍या-2, अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 के कर्मचारी के साथ मिलकर हजारों जमाकर्ताओं की धनराशि हड़प ली है और पुलिस ने प्रत्‍यर्थी    संख्‍या-3 परिवाद की विपक्षी  संख्‍या-2 को गिरफ्तार कर लिया है। साथ ही अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 के कुछ कर्मचारी भी गिरफ्तार किये गये हैं। तब दिनांक 24.05.2000 को परिवादीगण अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 के अधिकारियों से मिले और अपनी परिपक्‍वता राशि के विषय में जानकारी चाही तो ज्ञात हुआ कि अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 के बाबू एवं प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3, जो परिवाद

 

 

-5-

में विपक्षी संख्‍या-2 है, ने पुन: राशि जमा करने के स्‍थान पर परिपक्‍वता धनराशि एवं बोनस राशि निकाल ली है। तब परिवादीगण ने पुलिस स्‍टेशन चौक में प्राथमिकी दर्ज करायी और पुन: अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 के अधिकारियों से मिले तथा परिपक्‍वता राशि दिलाये जाने की प्रार्थना की।

परिवाद पत्र के अनुसार उपरोक्‍त परिवादीगण का कथन है             कि अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 के अधिकारी आश्‍वासन देते रहे कि परिपक्‍वता राशि उन्‍हें मिल जायेगी और इस क्रम में अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 के अधिकारी ने कई बार परिवादीगण का बयान भी लिया, परन्‍तु उन्‍होंने परिपक्‍वता राशि वापस नहीं किया और न ही उसे मासिक आय योजना में जमा किया। अत: क्षुब्‍ध होकर परिवादीगण ने परिवाद जिला फोरम के समक्ष प्रस्‍तुत किया है।

परिवाद लम्बित रहते हुए उपरोक्‍त परिवादिनी              संख्‍या-1 श्रीमती उर्मिला कान्‍ता का देहान्‍त हो गया। अत: उसके स्‍थान पर परिवाद में उसके विधिक उत्‍तराधिकारी हरिओम को प्रतिस्‍थापित किया गया है।

जिला फोरम के समक्ष अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 की ओर से लिखित कथन प्रस्‍तुत कर कहा गया है कि परिवादीगण ने 48,000/-रू0 मासिक आय योजना में जमा किया था और प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3, जो परिवाद में विपक्षी संख्‍या-2 है, राष्‍ट्रीय बचत योजना की अधिकृत एजेन्‍ट थी।

 

 

-6-

लिखित कथन में अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 की ओर से कहा गया है कि परिवादीगण ने निकासी फार्म (एस0बी0 7) भरकर रूखसाना प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 जो परिवाद में विपक्षी संख्‍या-2 है को दूत बनाकर दिया था, जिस पर परिवादिनी संख्‍या-1 का हस्‍ताक्षर था और उसने विपक्षी संख्‍या-2 को राशि निकालने के लिए अधिकृत किया था।

लिखित कथन में अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 की ओर से कहा गया है कि प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 परिवाद की विपक्षी संख्‍या-2 ने जो रसीद निर्गत की है वह सही और निर्धारित प्रारूप में नहीं है। परिवादीगण को सूचना अविलम्‍ब अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 के अधिकारियों को देनी चाहिए थी, परन्‍तु उन्‍होंने सूचना नहीं दिया है।

लिखित कथन में अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 की ओर से यह स्‍वीकार किया गया है कि प्रत्‍यर्थी संख्‍—3 परिवाद की विपक्षी संख्‍या-2 को पुलिस ने जांच के सम्‍बन्‍ध में अभिरक्षा में लिया है। इसके साथ ही लिखित कथन में अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 की ओर से कहा गया है कि परिवादिनी संख्‍या-1 के हस्‍ताक्षर का मिलान कर परिपक्‍वता राशि बोनस के साथ दिनांक 19.05.2000 को दी गयी है।

लिखित कथन में अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 की ओर से यह भी कहा गया है कि प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 परिवाद की विपक्षी संख्‍या-2 पर आपराधिक वाद की कार्यवाही चल रही है और दिनांक 27.05.2000 को उसकी एजेंसी निरस्‍त कर दी गयी है।

 

 

-7-

लिखित कथन में अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 की ओर से यह भी कहा गया है कि परिवाद कालबाधित है।

जिला फोरम के समक्ष प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3/परिवाद की विपक्षी संख्‍या-2 की ओर से कोई लिखित कथन प्रस्‍तुत नहीं किया गया है। अत: उसके विरूद्ध परिवाद की कार्यवाही एकपक्षीय रूप से की गयी है।

     जिला फोरम ने उभय पक्ष के अभिकथन एवं उपलब्‍ध साक्ष्‍यों

पर विचार करने के उपरान्‍त यह माना है कि परिपक्‍वता धनराशि 20,000/-रू0 से अधिक थी। अत: उसका भुगतान एकाउन्‍टपेयी चेक से न करके अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 ने सेवा में कमी की है। अत: जिला फोरम ने परिवाद आंशिक रूप से स्‍वीकार करते हुए आक्षेपित आदेश पारित किया है, जो ऊपर अंकित है।

अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि जिला फोरम द्वारा पारित निर्णय और आदेश तथ्‍य, नियम और विधि‍ के विरूद्ध है। परिवाद हेतु वाद हेतुक जून 2000 में उत्‍पन्‍न हुआ है, परन्‍तु परिवाद धारा 24ए उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्‍तर्गत निर्धारित समय-सीमा के बाद वर्ष 2007 में प्रस्‍तुत किया गया है। अत: परिवाद कालबाधित है। ऐसी स्थिति में जिला फोरम ने परिवाद का संज्ञान लेकर जो आदेश पारित किया है वह विधि विरूद्ध है।

अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि मृतक परिवादिनी श्रीमती उर्मिला कान्‍ता ने निकासी  फार्म  (एस0बी0 7)

 

-8-

भरकर प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 श्रीमती रूखसाना को दूत बनाकर दिया था, जिस पर मृतक परिवादिनी श्रीमती उर्मिला कान्‍ता का हस्‍ताक्षर था और उसने धनराशि प्राप्‍त करने हेतु प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 परिवाद की विपक्षी संख्‍या-2 को अधिकृत किया था। अत: परिप‍क्‍वता धनराशि का भुगतान प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3/विपक्षी संख्‍या-2 को नियम के अनुसार किया गया है।

अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 परिवाद की विपक्षी संख्‍या-2 ने परिपक्‍वता धनराशि प्राप्‍त कर यह धनराशि मृतक परिवादिनी व परिवादी संख्‍या-2 से प्राप्‍त करने की रसीद उन्‍हें दिया है, जिससे स्‍पष्‍ट है कि उसने यह धनराशि परिवादीगण से प्राप्‍त करना स्‍वीकार किया है। अत: स्‍पष्‍ट है कि इस धनराशि का भुगतान प्रत्‍यर्थी/परिवादीगण को प्राप्‍त हो चुका है। अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 की सेवा में कोई कमी नहीं है।

अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता का यह भी तर्क है कि माननीय राष्‍ट्रीय आयोग ने प्रदीप कुमार बनाम पोस्‍ट मास्‍टर जनरल आदि के निर्णय, जो IV (2015) सी0पी0जे0 237 में प्रकाशित है, में कहा है कि पोस्‍ट आफिस के नोटिफिकेशन/सर्कुलर दिनांकित 28/29.08.2001 के द्वारा 20,000/-रू0 से अधिक की धनराशि का भुगतान चेक के माध्‍यम से करने का निर्देश दिया गया है, जबकि प्रश्‍नगत भुगतान इस नोटिफिकेशन/सर्कुलर के पहले का है। अत: जिला फोरम ने अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 पोस्‍ट आफिस की सेवा में कमी का जो आधार उल्लिखित किया  है,  वह

 

-9-

उचित नहीं है।

अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 की सेवा में कोई कमी नहीं है और प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 परिवाद की विपक्षी संख्‍या-2 अपीलार्थी की अधीनस्‍थ कर्मचारी नहीं है। उसकी नियुक्ति राज्‍य सरकार के अधिकारी द्वारा की जाती है। अत: प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 परिवाद की विपक्षी संख्‍या-2 के किसी कार्य हेतु अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 का कोई दायित्‍व नहीं बनता है।  

अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि जिला फोरम का निर्णय दोषपूर्ण है अत: निरस्‍त किये जाने योग्‍य है।

अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता ने अपने तर्क के समर्थन में निम्‍नलिखित न्‍यायिक निर्णयों को सन्‍दर्भित किया है:-

1. माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा UP DAKPAL & ORS. versus GANGA SUGAR CORPORATION LTD. EMPLOYEES PROVIDENT FUND TRUST, II (2015) CPJ 369 (NC) के वाद में पारित निर्णय।

2. माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा कारपोरेशन बैंक व एक अन्‍य बनाम नवीन जे0 शाह के वाद में पारित निर्णय दिनांक 25.01.2000।

3. माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा सिविल अपील नं0 2067/2002 स्‍टेट बैंक आफ इण्डिया बनाम मै0 बी0एस0 एग्रीकल्‍चरल इण्‍डस्‍ट्रीज में पारित निर्णय दिनांक 20.03.2009।

 

-10-

4. माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा KANDIMALLA RAGHAVAIAH AND COMPANY Versus NATIONAL INSURANCE COMPANY AND ANOTHER, (2009) 7 Supreme Court Cases 768 के वाद में पारित निर्णय।

5. माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा Union of India through Postal Master General U.P. Versus Shanker Ram (Since Deceased Thru. Lrs.) & Ors., 2011 NCJ 242 (NC) के वाद में पारित निर्णय।

6. माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा PANNA LAL KANKARIA & SONS versus HDFC BANK LTD., II (2015) CPJ 705 (NC) के वाद में पारित निर्णय।

7. माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा GANGA NAGAR CENTRAL COOP. BANK LTD. Versus PUSHPA RANI & ANR. II (2008) CPJ 19 (SC) के वाद में पारित निर्णय।

8. माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा SYNCO INDUSTRIES  Versus STATE BANK OF BIKANER & JAIPUR AND OTHERS, (2002) 2 Supreme Court Cases 1 के वाद में पारित निर्णय।

9. माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा RAKESH KUMAR SHARMA versus ICICI PRUDENTIAL LIFE INSURANCE CO. LTD. & ANR., II (2014) CPJ 196 (NC) के वाद में पारित निर्णय।  

 

-11-

प्रत्‍यर्थीगण संख्‍या-1 व 2 के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि जिला फोरम द्वारा पारित निर्णय और आदेश तथ्‍य और साक्ष्‍य के अनुकूल है और सही है। अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 के कर्मचारी की मिली‍भगत से प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 परिवाद की विपक्षी संख्‍या-2 ने परिवादीगण की धनराशि प्राप्‍त की है और उसका अपयोजन किया है। जिला फोरम ने जो अपीलार्थी/विपक्षी संख्‍या-1 की सेवा में कमी माना है, वह उचित और विधिसम्‍मत है। जिला फोरम के निर्णय में हस्‍तक्षेप हेतु उचित और युक्तिसंगत आधार नहीं है।

प्रत्‍यर्थीगण संख्‍या-1 व 2 के विद्वान अधिवक्‍ता ने अपने तर्क के समर्थन में उत्‍तर प्रदेश राज्‍य आयोग द्वारा अपील संख्‍या-886/2004 यूनियन आफ इण्डिया बनाम ए0के0 मण्‍डवाल व एक अन्‍य में पारित निर्णय दिनांक 22.09.2017 सन्‍दर्भित किया है।

प्रत्‍यर्थीगण संख्‍या-1 व 2 के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि उपरोक्‍त अपील के तथ्‍य वर्तमान अपील के तथ्‍य के समान हैं और उपरोक्‍त अपील में राज्‍य आयोग ने पोस्‍ट आफिस की सेवा में कमी माना है।

प्रत्‍यर्थीगण संख्‍या-1 व 2 के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि अपील बल रहित है अत: निरस्‍त किये जाने योग्‍य है।

मैंने उभय पक्ष के तर्क पर विचार किया है।

वर्तमान वाद में विवाद मासिक आय योजना की परिपक्‍वता राशि व बोनस की निकासी (withdrawl) के सम्‍बन्‍ध में है।

परिवाद पत्र  के  अनुसार  परिवादीगण  परिपक्‍वता  अवधि

 

-12-

पूरा होने पर अपने खाता की पासबुक एवं पुन: नया खाता खोलने हेतु राशि जमा करने हेतु फार्म भरकर लेकर पोस्‍ट आफिस के सम्‍बन्धित क्‍लर्क के पास गये तो उसने प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 के माध्‍यम से आने को कहा तब परिवादीगण प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 से मिले और उसे भरा हुआ फार्म मासिक योजना में जमा करने हेतु दिया और प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 ने उन्‍हें 48000/-रू0 की रसीद दी, परन्‍तु धनराशि प्राप्‍त कर परिवादीगण का नया खाता नहीं खोला है। धनराशि प्राप्‍त कर अपयोजन किया गया है।

अपीलार्थी/विपक्षी के अनुसार परिवादीगण ने withdrawl फार्म S.B.7 भरकर प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 को दूत बनाकर दिया था, जिस पर मृतक परिवादिनी संख्‍या-1 का हस्‍ताक्षर था और उसने प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 को राशि निकालने हेतु अधिकृत किया था। तब प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 ने प्रत्‍यर्थी/परिवादीगण के प्रश्‍नगत खाता की परिपक्‍वता धनराशि मय बोनस के निकाली है। जिला फोरम ने अपने निर्णय में उल्‍लेख किया है कि अपीलार्थी/विपक्षी ने निकासी फार्म की छायाप्रति अभिलेखीय साक्ष्‍य में नहीं लगाया है। withdrawl फार्म S.B.7 प्रस्‍तुत कर अपीलार्थी को यह साबित करना था कि प्रत्‍यर्थी/परिवादीगण के प्रश्‍नगत खाता की परिपक्‍वता धनराशि व बोनस का भुगतान प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 को विधिवत् परिवादीगण के अधिकार पत्र पर किया गया है। जिला फोरम ने इस सम्‍बन्‍ध में कोर्इ निष्‍कर्ष अंकित नहीं किया है।

जिला फोरम ने अपीलार्थी/विपक्षी की सेवा में कमी का आधार

 

-13-

यह माना है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादीगण के प्रश्‍नगत खाता की परिपक्‍वता धनराशि व बोनस का भुगतान नकद डाक विभाग द्वारा वर्ष 1999 में निर्गत विभागीय सर्कुलर की अवहेलना कर किया गया है।

अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा सन्‍दर्भित प्रदीप कुमार बनाम पोस्‍ट मास्‍टर जनरल आदि IV (2015) C.P.J. 237 के निर्णय में माननीय राष्‍ट्रीय आयोग ने माना है कि D.G. Posts के लेटर नं0 5-20 U.P.-06/2000-INV dated 28/29-8-2001 के द्वारा 20000/-रू0 या उससे अधिक धनराशि का भुगतान नकद न कर चेक से करने को कहा गया है। परन्‍तु वर्तमान विवाद मई 2000 के withdrawl के सम्‍बन्‍ध में है। प्रश्‍नगत withdrawl उपरोक्‍त सर्कुलर दिनांक 28/29-8-2001 के पहले का है।

परिवाद पत्र के अनुसार परिवादीगण ने प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 को पासबुक फार्म भरकर नया खाता खोलने हेतु दिया, परन्‍तु प्रत्‍यर्थी/परिवादीगण के परिपक्‍व खाता की धनराशि पोस्‍ट आफिस कर्मियों से मिलकर निकाल ली और प्रत्‍यर्थी/परिवादीगण का नया खाता नहीं खोला। अत: परिवाद पत्र के अनुसार मुख्‍य शिकायत प्रत्‍यर्थी/परिवादीगण की प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 से है, परन्‍तु प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 को बिना कोई कारण दर्शित किये हुए जिला फोरम ने अवमुक्‍त कर दिया है, जो उचित नहीं है।

माननीय राष्‍ट्रीय आयोग ने पोस्‍ट मास्‍टर जनरल यू0पी0 व एक अन्‍य बनाम शंकर राम IV (2010) C.P.J.  363  N.C.  के

 

-14-

निर्णय में माना है कि राज्‍य सरकार द्वारा नियुक्‍त एजेन्‍ट के कार्य हेतु पोस्‍ट आफिस को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। अत: प्रत्‍यर्थी संख्‍या-3 द्वारा प्रत्‍यर्थी/परिवादीगण के प्रश्‍नगत खाता की धनराशि का अपयोजन किये जाने हेतु वाइकेरियस लाइबिल्‍टी के सिद्धान्‍त पर अपीलार्थी पोस्‍ट आफिस को उत्‍तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है।

परिवाद में कालबाधा के सम्‍बन्‍ध में कोई मत व्‍यक्‍त किये बिना अपीलार्थी/विपक्षी को जिला फोरम के समक्ष अपना कथन प्रस्‍तुत करने का अवसर दिया जाना उचित है।

उपरोक्‍त विवेचना के आधार पर मैं इस मत का हूँ कि जिला फोरम का निर्णय व आदेश विधि के अनुकूल नहीं है और कायम रहने योग्‍य नहीं है। उचित प्रतीत होता है कि पत्रावली जिला फोरम को इस निर्देश से प्रत्‍यावर्तित की जाये कि जिला फोरम उभय पक्ष को साक्ष्‍य व सुनवाई का अवसर देकर इस निर्णय में की गयी विवेचना को दृष्टिगत रखते हुए पुन: विधि के अनुसार निर्णय व आदेश पारित करे।

अपील स्‍वीकार की जाती है और जिला फोरम का आक्षेपित निर्णय व आदेश अपास्‍त करते हुए पत्रावली जिला फोरम को इस निर्देश के साथ प्रत्‍यावर्तित की जाती है कि जिला फोरम उभय पक्ष को साक्ष्‍य व सुनवाई का अवसर देकर इस निर्णय में की गयी विवेचना को दृष्टिगत रखते हुए पुन: विधि के अनुसार निर्णय व आदेश पारित करे।

 

-15-

उभय पक्ष जिला फोरम के समक्ष दिनांक 20.08.2020    को उपस्थित हों।

अपील में उभय पक्ष अपना-अपना व्‍यय स्‍वयं वहन करेंगे।

अपील में धारा-15 उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्‍तर्गत जमा धनराशि अर्जित ब्‍याज सहित अपीलार्थी को वापस की जायेगी।

 

                    (न्‍यायमूर्ति अख्‍तर हुसैन खान)           

                    अध्‍यक्ष             

 

जितेन्‍द्र आशु0,

कोर्ट नं0-1           

 
 
[HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN]
PRESIDENT
 

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