सुरक्षित
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।
अपील संख्या-342/2012
(जिला उपभोक्ता फोरम, हमीरपुर द्वारा परिवाद संख्या-23/2007 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 12.01.2012 के विरूद्ध)
1. हेड पोस्ट मास्टर, हमीरपुर द्वारा पोस्ट मास्टर।
2. यूनियन आफ इण्डिया द्वारा सेक्रेटरी डिपार्टमेंट आफ पोस्ट एण्ड टेलीग्राफ, गवर्नमेंट आफ इण्डिया, न्यू दिल्ली।
अपीलार्थीगण/विपक्षीगण
बनाम्
देवन्द्र नारायण मिश्रा पुत्र श्री रमेश चन्द्र निवासी मोहल्ला खजांची मुहाल रमेड़ी, सिटी एण्ड डिस्ट्रिक्ट हमीरपुर।
प्रत्यर्थी/परिवादी
समक्ष:-
1. माननीय श्री राम चरन चौधरी, पीठासीन सदस्य।
2. माननीय श्री संजय कुमार, सदस्य।
अपीलार्थीगण की ओर से उपस्थित : डा0 उदय वीर सिंह, विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : कोई नहीं।
दिनांक 05.05.2017
मा0 श्री संजय कुमार, सदस्य द्वारा उदघोषित
निर्णय
यह अपील, परिवाद संख्या-23/2007, देवेन्द्र नारायन सिंह बनाम मुख्य डाकघर हमीरपुर व अन्य में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, हमीरपुर द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 12.01.2012 से क्षुब्ध होकर विपक्षीगण/अपीलार्थीगण की ओर से योजित की गयी है, जिसके अन्तर्गत जिला फोरम द्वारा निम्नवत् आदेश पारित किया गया है :-
‘’ परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है। विपक्षीगण परिवादी को एक माह के अन्दर रू0 300.00 पै0 रजिस्टर्ड पत्र व आवेदन पत्र आदि में व्यय के मद में क्षतिपूर्ति के रूप में, रू0 10,000.00 पै0 (दस हजार मात्र) मानसिक परेशानी के मद में क्षतिपूर्ति के रूप में तथा रू0 500.00 पै0 वाद व्यय के रूप में अदा करेंगे। आवेदित पद पर नियुक्ति होने से वंचित होने के मद में याचित चार लाख रू0 की क्षतिपूर्ति की याचना खारिज की जाती है। विपक्षी डाक विभाग अपने लापरवाह कर्मचारी से विभागीय क्षति की धनराशि वसूल सकेगा। ‘’
अपीलार्थीगण की ओर से विद्वान अधिवक्ता डा0 उदय वीर सिंह उपस्थित हैं। प्रत्यर्थी तामीला के बावजूद भी उपस्थित नहीं आये। यह अपील वर्ष 2012 से निस्तारण हेतु लम्बित है, अत: पीठ द्वारा समीचीन पाया गया कि प्रस्तुत अपील का निस्तारण गुणदोष के आधार पर कर दिया जाये। तदनुसार विद्वान अधिवक्ता अपीलार्थीगण को विस्तार से सुना गया एवं प्रश्नगत निर्णय/आदेश तथा उपलब्ध अभिलेखों का गम्भीरता से परिशीलन किया गया।
परिवाद पत्र का अभिवचन संक्षेप में इस प्रकार है कि परिवादी हमीरपुर न्यायालय में लिपिक के पद पर कार्यरत है। रोजगार समाचार दिनांक 15.09.2006 में उ0प्र0 अधीनस्थ शिक्षा सेवा के अन्तर्गत प्रवक्ता की नियुक्ति हेतु प्रकाशन हुआ था। परिवादी ने उक्त पद के लिए रू0 100/- का ट्रेजरी चालान दिनांक 19.09.2006 को बनवाया और अंक पत्र आदि संलग्न करके आवेदन पत्र पंजिकृत किया। आवेदन पत्र जमा करने की अन्तिम तिथि दिनांक 30.09.2006 से पहले ही दिनांक 20.09.2006 को समस्त संलग्नों सहित लिफाफे पर रू0 35/- का डाक टिकट लगाकर विपक्षी सं0-1 के यहां रजिस्ट्री की थी, जो दूसरे ही दिन लोक सेवा आयोग इलाहाबाद में पहुँच जानी चाहिये थी, लेकिन विपक्षीगण के कर्मचारियों की घोर लापरवाही के कारण उक्त आवेदन पत्र अंतिम तिथि 30.09.2006 के बाद दिनांक 06.10.2006 को वहां पहुँचा, जिसे कालबाधित मानकर अस्वीकृत लिखकर लिफाफा परिवादी को वापस भेज दिया गया। उक्त पद के लिए सीधा साक्षात्कार होकर मेरिट के आधार पर नियुक्ति होनी थी और परिवादी की मेरिट अच्छी थी। इसलिए परिवादी को नियुक्ति होने की पूरी उम्मीद थी, लेकिन विपक्षीगण की लापरवाही के कारण परिवादी को आवेदन पत्र कालबाधित होने के कारण वापस कर दिया गया, जिससे परिवादी को काफी मानसिक कष्ट हुआ, जिससे क्षुब्ध होकर प्रश्नगत परिवाद जिला फोरम के समक्ष याजित किया गया।
जिला फोरम के समक्ष विपक्षीगण ने परिवाद पत्र का विरोध करते हुए प्रतिवाद पत्र दाखिल किया और यह कहा कि परिवादी ने उक्त पत्र समय से वितरित न होने की शिकायती पत्र विपक्षीगण को नहीं भेजा, नही तो उसकी जांच करायी जाती। उक्त पत्र बुक कराने की तिथि दिनांक 20.09.2006 को ही डाक में चढ़ाकर आर0एम0एस0 बांदा को प्राप्तकर्ता को विपरित करने हेतु भेज दिया गया था। पत्र के पंजीकरण में व उसे प्रेषण में डाकपाल हमीरपुर द्वारा कोई त्रुटि नहीं की गयी थी। पत्र देर से पहुँचने का प्रश्न गलत है। भारतीय डाक अधि0 1998 की धारा6 अन्तर्गत भारतीय डाक को डाक प्रेषण के दौरान किसी डाक वस्तु की क्षति, गलत सुपुर्दगी या उसमें देरी या टूट फूट के मामलों में सभी जिम्मेदारियों से छूट दी गयी है। अत: पंजीकरण पत्र प्रेषण में विपक्षीगण द्वारा कोई लापरवाही नहीं की गयी है। परिवाद खारिज होने योग्य है।
अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्ता द्वारा मुख्य रूप से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि प्रश्नगत मामलें में कर्मचारी के खिलाफ जानबूझकर लापरवाही करने अथवा फ्राड से सम्बन्धित कोई साक्ष्य परिवादी द्वारा नहीं दाखिल किया गया था। ऐसी स्थिति में कर्मचारी को दोषी नहीं माना जा सकता है। परिवादी द्वारा उ0प्र0 अधीनस्थ शिक्षा सेवा के अन्तर्गत प्रवक्ता के पद हेतु आवेदन पत्र डाक के माध्यम से भेजा गया था, जिसकी अन्तिम तिथि दिनांक 30.09.2006 थी, परन्तु डाक घर के कर्मचारी की लापरवाही से आवेदन पत्र दिनांक 06.10.2006 को पहुँचा, जिससे परिवादी प्रवक्ता पद पर चयनित नहीं हो सका। डाक विभाग के कर्मचारी ने जानबूझकर कोई गलती नहीं की है। कर्मचारी के खिलाफ कोई ऐसा साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया है कि जिससे प्रतीत हो कि कर्मचारी परिवादी से व्यक्तिगत द्ववेष रखता हो। अत: जिला फोरम द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश अपास्त होने योग्य है।
आधार अपील एवं सम्पूर्ण पत्रावली का परिशीलन किया गया, जिससे यह तथ्य विदित होता है कि परिवादी ने प्रवक्ता पद हेतु रजिस्ट्री आवेदन पत्र उचित डाक टिकट लगाकर दिनांक 20.09.2006 को भेजा था। आवेदन पत्र पहुँचने की अन्तिम तिथि दिनांक 30.09.2006 थी, परन्तु उक्त आवेदन पत्र दिनांक 06.10.2006 को अधीन्स्थ शिक्षा सेवा आयोग में पहुँचा, जिसके कारण आवेदन पत्र अस्वीकृत कर दिया गया। उक्त पद पर सीधा साक्षात्कार होना निश्चित था। परिवादी साक्षात्कार परीक्षा में सम्मिलित नहीं हो सका। प्रश्नगत प्रकरण में किसी कर्मचारी के खिलाफ कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि सम्बन्धित पोस्ट मैन अथवा सम्बन्धित लिपिक द्वारा जानबूझकर आवेदन पत्र निर्धारित तिथि से पूर्व नहीं प्राप्त कराया गया। भारतीय डाक अधिनियम 1998 की धारा-6 में यह वर्णित है कि :-
“6, Exemption from liability for loss, misdelivery, delay or damage - The Government shall not incur any liability by reason of the loss, misdelivery or delay of or damage to, any postal article in course of transmission by post, except insofar as such liability may in express terms be undertaken by the Central Government as hereinafter provided and no officer of the Post Office shall incur any liability by reason of any such loss, misdelivery, delay or damage, unless he has caused the same fraudulently or by his willful act or default.”
मा0 राष्ट्रीय आयोग ने यूनियन आफ इण्डिया एवं अन्य बनाम एम.एल. बोरा 2011 (2) CPJ में यह विधिक सिद्धान्त व्यक्त किया है कि यदि कर्मचारी के विरूद्ध जानबूझकर पत्र का वितरण विलम्ब से करने का आरोप साक्ष्य द्वारा साबित नहीं होता है तो उसे दोषी अथवा लापरवाही नहीं माना जा सकता है। प्रश्नगत प्रकरण में कर्मचारी के खिलाफ ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नही किया गया है कि पत्र के वितरक ने जानबूझकर द्ववेष भावना से वितरण विलम्ब से किया गया है। तदनुसार अपील स्वीकार किये जाने योग्य है।
आदेश
अपील स्वीकार की जाती है। जिला फोरम, हमीरपुर द्वारा परिवाद संख्या-23/2007, देवेन्द्र नारायन सिंह बनाम मुख्य डाकघर हमीरपुर व अन्य में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 12.01.2012 अपास्त किया जाता है ।
(राम चरन चौधरी) (संजय कुमार)
पीठासीन सदस्य सदस्य
लक्ष्मन, आशु0, कोर्ट-2