(सुरक्षित)
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ
अपील सं0- 1425/2018
(जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, फर्रूखाबाद द्वारा परिवाद सं0- 52/2017 में पारित निर्णय व आदेश दि0 18.06.2018 के विरूद्ध)
Mohd. Ansar aged about 50 years S/o Late Babu baksh Resident of 2/134, Suthatti, Farrukhabad, District- Farrukhabad.
……..Appellant
Versus
Dakshinanchal vidhyut vitran nigam limited through its Executive Engineer, Nagriya Chetra, Vidhyut vitran khand, Bholepur, Fatehgarh, District- Farrukhabad.
………Respondent
समक्ष:-
माननीय न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री राजीव श्रीवास्तव,
विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : कोई नहीं।
दिनांक:- 03.10.2019
माननीय न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष द्वारा उद्घोषित
निर्णय
परिवाद सं0- 52/2017 मोहम्मद अंसार बनाम दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लि0 में जिला फोरम, फर्रूखाबाद द्वारा पारित निर्णय व आदेश दि0 18.06.2018 के विरूद्ध यह अपील धारा 15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत राज्य आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई है।
आक्षेपित निर्णय और आदेश के द्वारा जिला फोरम ने परिवाद निरस्त कर दिया है, जिससे क्षुब्ध होकर परिवाद के परिवादी ने यह अपील प्रस्तुत की है।
अपील की सुनवाई के समय अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री राजीव श्रीवास्तव उपस्थित आये हैं। प्रत्यर्थी की ओर से नोटिस तामीला के बाद भी कोई उपस्थित नहीं हुआ है।
मैंने अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता के तर्क को सुना है और आक्षेपित निर्णय व आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया है।
अपील के निर्णय हेतु संक्षिप्त सुसंगत तथ्य इस प्रकार हैं कि अपीलार्थी/परिवादी ने उपरोक्त परिवाद जिला फोरम के समक्ष प्रत्यर्थी/विपक्षी के विरुद्ध इस कथन के साथ प्रस्तुत किया है कि उसके पिता स्व0 बाबूबक्श पुत्र स्व0 रहीम बक्श के नाम दुकान नं0- 2/132 सुतहट्टी फर्रूखाबाद में विद्युत कनेक्शन था जिसका विच्छेदन दि0 15.07.1997 को कर दिया गया तब अपीलार्थी/परिवादी के पिता बाबू बक्श ने दि0 26.08.1997 को रसीद सं0- 9, पुस्तक सं0- 380670 से 253/-रु0 जमा किया और उसके बाद पुन: वह कनेक्शन अपीलार्थी/परिवादी के पिता के नाम संयोजित नहीं किया गया। तदोपरांत अपीलार्थी/परिवादी के पिता की मृत्यु दि0 08.01.1998 को हो गई। अपीलार्थी/परिवादी के पिता की उपरोक्त दुकान पारिवारिक विवाद के कारण बन्द रही। अत: उस पर कोई संयोजन नहीं किया गया।
परिवाद पत्र के अनुसार अपीलार्थी/परिवादी का कथन है कि दि0 15.12.2015 को अभियान के अंतर्गत अपीलार्थी/परिवादी की उपरोक्त दुकान का मीटर बदला गया, परन्तु कोई संयोजन नहीं किया गया और उसके बाद दि0 20.11.2016 को जारी बिल में उपभोग की गई यूनिट की सं0- 202 दर्शायी गई जब कि मीटर दि0 15.12.2015 को लगाया जाना बताया गया तथा बिल 4,15,376/-रु0 का भेजा गया। इस पर अपीलार्थी/परिवादी ने प्रत्यर्थी/विपक्षी से मिलकर अपनी बात कही तो उससे 1,50,000/-रु0 एकमुश्त जमा करने को कहा गया और उसके 1,50,000/-रु0 जमा करने पर विद्युत बिल निरस्त करने का आश्वासन दिया गया। इस प्रकार अपीलार्थी/परिवादी ने परेशानी से बचने के उद्देश्य से दि0 02.12.2016 को 1,50,000/-रु0 जमा कर दिया जिसकी रसीद उसे दी गई।
परिवाद पत्र के अनुसार अपीलार्थी/परिवादी का कथन है कि उसे परेशान करने और आर्थिक क्षति पहुंचाने के उद्देश्य से उसके विरुद्ध मुकदमा सं0- 115/17 दि0 27.1.2017 को धारा 138 विद्युत अधिनियम थाना कोतवाली फर्रूखाबाद में झूठा दर्ज करवा दिया गया जब कि वह मकान/दुकान सं0- 2/132 में न तो निवास करता है न उसमें कोई विद्युत संयोजन चालू था। न ही दि0 15.07.1997 के बाद विद्युत कनेक्शन जोड़ा गया था। परिवाद पत्र में अपीलार्थी/परिवादी ने कहा है कि उसने मा0 उच्च न्यायालय में क्रिमिनल रिट पिटीशन नं0- 2730/17 मो0 अंसार सिद्दीकी बनाम उ0प्र0 राज्य एवं दो अन्य दाखिल किया जो दि0 17.2.2017 को निस्तारित करते हुए विवेचक को गिरफ्तार न करने का आदेश दिया गया। परिवाद पत्र के अनुसार अपीलार्थी/परिवादी का कथन है कि उसे विद्युत बिल गलत ढंग से भेजा गया है जब कि उसने विद्युत का कोई उपभोग नहीं किया है।
जिला फोरम के समक्ष प्रत्यर्थी/विपक्षी की ओर से लिखित कथन प्रस्तुत किया गया है और कहा गया है कि परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत पोषणीय नहीं है। मंच को परिवाद की सुनवाई का क्षेत्राधिकार प्राप्त नहीं है। अपीलार्थी/परिवादी का प्रश्नगत कनेक्शन वाणिज्यिक है। अत: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के प्राविधान लागू नहीं होते हैं।
लिखित कथन में प्रत्यर्थी/विपक्षी ने कहा है कि अपीलार्थी/परिवादी के प्रश्नगत संयोजन पर विद्युत चोरी पायी गई जिसके सम्बन्ध में विभाग द्वारा अपराध सं0- 115/2017 पर दि0 27.02.2017 को एफ0आई0आर0 पुलिस स्टेशन फर्रूखाबाद में दर्ज करायी गई है। एफ0आई0आर0 के विरुद्ध अपीलार्थी/परिवादी ने मा0 उच्च न्यायालय इलाहाबाद में रिट याचिका प्रस्तुत किया जिसमें मा0 उच्च न्यायालय के समक्ष उसके अधिवक्ता ने अण्डरटेकिंग दी कि वह विद्युत के सभी अवशेषों का भुगतान करेगा।
जिला फोरम ने उभय पक्ष के अभिकथन एवं उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के उपरांत यह माना है कि प्रश्नगत प्रकरण विद्युत चोरी और असेस्मेंट से सम्बन्धित नहीं है। अत: मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यू0पी0 पावर कार्पोरेशन लि0 आदि बनाम अनीस अहमद 2013 (3) सी0पी0आर0 670 (एस0सी0) के वाद में प्रतिपादित सिद्धांत के आधार पर परिवाद संधार्य नहीं है। अत: जिला फोरम ने परिवाद निरस्त कर दिया है।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि जिला फोरम का निर्णय तथ्य और विधि के विरुद्ध है। अपीलार्थी/परिवादी ने वर्ष 1997 के बाद विद्युत का उपभोग प्रश्नगत दुकान में नहीं किया है। विद्युत चोरी के सम्बन्ध में उसके विरुद्ध किया गया कथन गलत है और आधार रहित है।
मैंने अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता के तर्क पर विचार किया है।
परिवाद पत्र के कथन से ही स्पष्ट है कि अपीलार्थी/परिवादी की प्रश्नगत दुकान में विद्युत चोरी का प्रकरण पाया गया है और उसके विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करायी गई है। परिवाद पत्र के कथन से यह भी स्पष्ट है कि अपीलार्थी/परिवादी ने दर्ज एफ0आई0आर0 के विरुद्ध रिट याचिका मा0 उच्च न्यायालय इलाहाबाद के समक्ष प्रस्तुत किया है, जिसमें अपीलार्थी/परिवादी की गिरफ्तारी पर रोक लगायी गई है। प्रथम सूचना रिपोर्ट निरस्त नहीं की गई है।
प्रत्यर्थी/विपक्षी के लिखित कथन से स्पष्ट है कि मा0 उच्च न्यायालय के समक्ष अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता ने समस्त अवशेष धनराशि जमा करने का आश्वासन दिया है और अपीलार्थी/परिवादी ने 1,50,000/-रु0 जमा भी किया है।
उभय पक्ष के अभिकथन एवं सम्पूर्ण तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के उपरांत यह स्पष्ट है कि अपीलार्थी/परिवादी के विरुद्ध वर्तमान प्रकरण विद्युत चोरी और उसके आधार पर किये गये असेस्मेंट का है। अत: मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यू0पी0 पावर कार्पोरेशन लि0 आदि बनाम अनीस अहमद 2013 (3) सी0पी0आर0 670 (एस0सी0) के वाद में प्रतिपादित सिद्धांत के आधार पर अपीलार्थी/परिवादी द्वारा प्रस्तुत परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत ग्राह्य नहीं है। अत: जिला फोरम ने आक्षेपित निर्णय और आदेश के द्वारा परिवाद निरस्त कर कोई गलती नहीं की है। जिला फोरम के निर्णय और आदेश में हस्तक्षेप हेतु उचित आधार नहीं है। अत: अपील निरस्त की जाती है।
उभय पक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
(न्यायमूर्ति अख्तर हुसैन खान)
अध्यक्ष
शेर सिंह आशु0,
कोर्ट नं0-1