राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ
अपील संख्या-1620/2018
(सुरक्षित)
(जिला उपभोक्ता फोरम, सहारनपुर द्वारा परिवाद संख्या 195/2007 में पारित आदेश दिनांक 15.05.2018 के विरूद्ध)
Dharamveer Singh Kaushik, son of Kabool Singh Upadhayay, residing at Gangdaspur, Police station-Devband, District-Saharanpur, presently residing at House no. 71 Vijay Colony, Police Station-Sadar Bazar, Saharanpur.
...................अपीलार्थी/विपक्षी सं03
बनाम
1. Dakpal, Chief Post Office, Court Road, Saharanpur.
2. Union Of India through Pravar Adhikshk Dakhghar Mission Compound, Saharanpur.
3. Naresh Kumar Gulati son of Inderraj Gulati, Resident of Gurudwara Road, Madho Prasad Ki Gali, Police Station Kutubshere, Saharanpur.
...................प्रत्यर्थीगण/विपक्षीगण सं01व2 एवं परिवादी
समक्ष:-
माननीय न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री सन्तोष कुमार मिश्रा,
विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थीगण सं01 व 2 की ओर से उपस्थित : कोई नहीं।
प्रत्यर्थी सं03 की ओर से उपस्थित : सुश्री तारा गुप्ता,
विद्वान अधिवक्ता।
दिनांक: 06.08.2019
मा0 न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष द्वारा उदघोषित
निर्णय
परिवाद संख्या-195/2007 इन्दरराज गुलाटी बनाम डाकपाल मुख्य डाकघर कोर्ट रोड, सहारनपुर व दो अन्य में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, सहारनपुर द्वारा पारित निर्णय और आदेश दिनांक 15.05.2018 के विरूद्ध यह अपील धारा-15 उपभोक्ता
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संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत परिवाद के विपक्षी संख्या-3 धर्मवीर सिंह कौशिक की ओर से मियाद अवधि समाप्त होने के बाद राज्य आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गयी है और अपील प्रस्तुत करने में हुए विलम्ब को क्षमा करने हेतु प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया है।
अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री सन्तोष कुमार मिश्रा उपस्थित आये हैं। प्रत्यर्थी संख्या-3 की ओर से विद्वान अधिवक्ता सुश्री तारा गुप्ता उपस्थित आईं हैं।
प्रत्यर्थीगण संख्या-1 व 2 की ओर से विद्वान अधिवक्ता डा0 उदय वीर सिंह के सहयोगी श्री श्रीकृष्ण पाठक दिनांक 09.01.2019 को उपस्थित हुए हैं और वकालतनामा प्रस्तुत करने हेतु समय चाहा है, परन्तु उसके बाद उपस्थित नहीं हुए हैं।
मैंने अपीलार्थी एवं प्रत्यर्थी संख्या-3 के विद्वान अधिवक्तागण को विलम्ब माफी प्रार्थना पत्र पर सुना है।
विलम्ब माफी प्रार्थना पत्र में अपीलार्थी ने कहा है कि आक्षेपित निर्णय व आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि उसे दिनांक 19.05.2018 को प्राप्त हुई, परन्तु वह अपील प्रस्तुत करने हेतु आवश्यक धनराशि 25,000/-रू0 जुटा नहीं पाया। उसने 25,000/-रू0 की धनराशि की व्यवस्था दिनांक 03.08.2018 को किसी तरह से किया तब ड्राफ्ट बनवाकर अपील प्रस्तुत किया है। विलम्ब माफी प्रार्थना पत्र के समर्थन में अपीलार्थी ने शपथ पत्र प्रस्तुत किया है।
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प्रत्यर्थी संख्या-3 की ओर से विलम्ब माफी प्रार्थना पत्र के विरूद्ध आपत्ति प्रस्तुत की गयी है और कहा गया है कि दिनांक 19.05.2018 को अपीलार्थी को आक्षेपित निर्णय व आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त हो गयी थी फिर भी उसने मियाद समाप्ति के 78 दिन बाद अपील प्रस्तुत किया है। अपील प्रस्तुत करने में विलम्ब का कथित कारण विलम्ब क्षमा हेतु उचित आधार नहीं है। अत: विलम्ब माफी प्रार्थना पत्र निरस्त किये जाने योग्य है।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि अपील प्रस्तुत करने में विलम्ब मात्र धारा-15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत वांछित धनराशि की व्यवस्था न हो पाने के कारण हुआ है। अपील प्रस्तुत करने में विलम्ब जानबूझकर नहीं किया गया है। अत: विलम्ब क्षमा कर अपील का निस्तारण गुणदोष के आधार पर किया जाना उचित है।
प्रत्यर्थी संख्या-3 की विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि अपीलार्थी द्वारा अपील प्रस्तुत करने में विलम्ब का कथित कारण उचित और सन्तोष जनक नहीं है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंशुल अग्रवाल बनाम नोयडा IV 2011 CPJ (SC) के वाद में प्रतिपादित सिद्धान्त के आधार पर विलम्ब माफी प्रार्थना पत्र स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है।
मैंने उभय पक्ष के तर्क पर विचार किया है।
आक्षेपित निर्णय व आदेश की प्रमाणित प्रति
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दिनांक 19.05.2018 को अपीलार्थी को प्रदान की गयी है। इस प्रकार अपील प्रस्तुत करने हेतु मियाद दिनांक 18.06.2018 तक थी, परन्तु अपीलार्थी ने अपील दिनांक 07.09.2018 को मियाद अवधि समाप्त होने के 80 दिन बाद प्रस्तुत किया है। अपीलार्थी के अनुसार अपील प्रस्तुत करने में विलम्ब अपील प्रस्तुत करने हेतु वांछित धनराशि की व्यवस्था न हो पाने के कारण हुआ है, परन्तु अपीलार्थी द्वारा प्रस्तुत विलम्ब माफी प्रार्थना पत्र से ही यह स्पष्ट है कि धारा-15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत अपील हेतु वांछित धनराशि 25,000/-रू0 की व्यवस्था दिनांक 03.08.2018 को हो गयी थी, जबकि अपील दिनांक 07.09.2018 को उसके 34 दिन बाद प्रस्तुत की गयी है और इस विलम्ब का कारण अपीलार्थी ने नहीं बताया है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अंशुल अग्रवाल बनाम नोयडा IV 2011 CPJ (SC) के निर्णय में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत विलम्ब माफी के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का संगत अंश नीचे उद्धरित है;
“It also opposite to observe that while deciding an application filed in such cases for condonation of delay. The court has to keep in mind that the special period of Limitation has been prescribed under the Consumer Protection Act 1986 for filing appeals and
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revisions in consumer matters and the object of expeditions adjudication of the consumer dispute will get defeated if this court was to entertain highly belated petition filed against the orders of the consumer fora”
आक्षेपित निर्णय के द्वारा जिला फोरम ने परिवाद स्वीकार करते हुए निम्न आदेश पारित किया है:-
''परिवाद स्वीकार किया जाता है। परिवादी उक्त धनराशि 370000/-रू. (तीन लाख सत्तर हजार रू0) 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित परिवाद योजन से भुगतान तक प्राप्त करने का अधिकरी है। इसके अतिरिक्त परिवादी 10000/- (दस हजार रू0) मानसिक व शारीरिक कष्ट व 3000/-रू0 (तीन हजार रू0) वाद व्यय भी प्राप्त करने का अधिकारी होगा। विपक्षीगण एक माह में उक्त धनराशि का भुगतान परिवादी को करें। इस अवधि के उपरान्त उक्त ब्याज की दर 12 प्रतिशत देय होग।''
उल्लेखनीय है कि उपरोक्त परिवाद परिवादी इन्दरराज गुलाटी ने विपक्षीगण डाकपाल मुख्य डाकघर, यूनियन ऑफ इंडिया द्वारा प्रवर अधीक्षक डाकघर एवं धर्मवीर लिपिक तैनात मुख्य डाकघर के विरूद्ध प्रस्तुत किया है, परन्तु अपील विपक्षीगण डाकपाल मुख्य डाकघर और यूनियन ऑफ इंडिया द्वारा प्रवर अधीक्षक डाकघर की ओर से प्रस्तुत किया जाना नहीं बताया गया है और जिला फोरम के निर्णय से यह स्पष्ट है कि वर्तमान अपीलार्थी श्री धर्मवीर
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लिपिक के विरूद्ध परिवादी द्वारा जमा धनराशि के अपयोजन के सम्बन्ध में अपराध सं0-386/2006 अन्तर्गत धारा-409, 420 आई0पी0सी0 स्थानीय थाने में पंजीकृत किया गया है और पुलिस ने वाद विवेचना आरोप पत्र न्यायालय उक्त धाराओं के अन्तर्गत प्रेषित किया है, जिसके आधार पर आपराधिक वाद अपीलार्थी के विरूद्ध मजिस्ट्रेट न्यायालय में विचाराधीन है।
सम्पूर्ण तथ्यों और परिस्थितियों एवं जिला फोरम के आक्षेपित निर्णय व आदेश पर विचार करते हुए तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय को दृष्टिगत रखते हुए मैं इस मत का हूँ कि अपीलार्थी द्वारा अपील प्रस्तुत करने में विलम्ब का कथित कारण सन्तोष जनक नहीं है। अत: विलम्ब माफी प्रार्थना पत्र निरस्त किया जाता है और अपील कालबाधा के आधार पर अस्वीकार की जाती है।
उभय पक्ष अपील में अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
अपील में धारा-15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत जमा धनराशि अर्जित ब्याज सहित जिला फोरम को विधि के अनुसार निस्तारण हेतु प्रेषित की जाए।
(न्यायमूर्ति अख्तर हुसैन खान)
अध्यक्ष
जितेन्द्र आशु0,
कोर्ट नं0-1