Uttar Pradesh

StateCommission

R/2014/18

Ram Singh Yadav - Complainant(s)

Versus

Brijesh Sachan - Opp.Party(s)

B K Upadhayay

04 Dec 2015

ORDER

STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP
C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010
 
Revision Petition No. R/2014/18
(Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission)
 
1. Ram Singh Yadav
a
...........Appellant(s)
Versus
1. Brijesh Sachan
a
...........Respondent(s)
 
BEFORE: 
 HON'BLE MR. Raj Kamal Gupta PRESIDING MEMBER
 
For the Petitioner:
For the Respondent:
ORDER

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।

                                                   (सुरक्षित)

पुनरीक्षण संख्‍या :18/2014

(जिला मंच, प्रथम लखनऊ द्धारा परिवाद सं0-28/2012 में पारित प्रश्‍नगत आदेश दिनांक 01.02.2014 के विरूद्ध)

राम सिंह यादव, प्रबन्‍ध निदेशक, मेसर्स यादव ट्रैक्‍टर कम्‍पनी मिश्रपुर (कुर्सी रोड) द्वारिकापुरम, लखनऊ।

                                                           ........... पुनरीक्षणकर्ता/विपक्षी

बनाम          

1    बृजेश सचान पुत्र आर0पी0 सचान, निवासी 569/32 ग/13-बी, बारगवान, एल0डी0ए0 कालोनी, कानपुर रोड, लखनऊ।  .... प्रत्‍यर्थी/परिवादी

2    महिन्‍द्रा एण्‍ड महिन्‍द्रा फा0 सर्विस लि0, कार्पोरेट आफिस, साधना हाउस, द्वितीय फ्लोर-570, पी0बी0 मार्ग, महिन्‍द्रा टावर्स के पीछे, वर्ली मुम्‍बई द्वारा मैनेजिग डायरेक्‍टर।

3    महिन्‍द्रा एण्‍ड महिन्‍द्रा फा0 सर्विस लि0, रजिस्‍टर्ड आफिस, गेटवे बिल्डिंग, अपोलो बन्‍दर, मुम्‍बई द्वारा मैनेजिंग डायरेक्‍टर

                                                       .......... प्रत्‍यर्थीगण/विपक्षीगण

समक्ष :-

मा0 श्री जितेन्‍द्र नाथ सिन्‍हा, पीठासीन सदस्‍य

पुनरीक्षणकर्ता की ओर से अधिवक्‍ता :  श्री बी0के0 उपाध्‍याय

प्रत्‍यर्थी की ओर से अधिवक्‍ता      :  श्री शशि कान्‍त शुक्‍ला

दिनांक :21-01-2016

          मा0 श्री जे0एन0 सिन्‍हा, पीठासीन सदस्‍य द्वारा उदघोषित

निर्णय

            वर्तमान पुनरीक्षण, परिवाद सं0 28/2012 बृजेश सचान बनाम राम सिंह यादव व अन्‍य में जिला मंच, प्रथम लखनऊ द्वारा पारित आदेश दिनांक 01.02.2014, से क्षुब्‍ध होकर विपक्षी/पुनरीक्षणकर्ता की ओर से प्रस्‍तुत किया गया है।

     पुनरीक्षणकर्ता/विपक्षी द्वारा प्रारम्भिक आपत्ति के माध्‍यम से यह अभिवचित किया गया है कि परिवाद कालबाधित है। जिला मंच द्वारा पुनरीक्षणकर्ता की उक्‍त प्रारम्भिक आपत्ति को स्‍वीकार नहीं किया गया और यह पाया गया कि प्रश्‍नगत परिवाद कालबाधित नहीं है, अत: लिखित कथन

-2-

प्रस्‍तुत किये जाने के लिए तिथि नियत की गई, उक्‍त आदेश से क्षुब्‍ध होकर पुनरीक्षणकर्ता द्वारा प्रश्‍नगत पुनरीक्षण प्रस्‍तुत किया गया है और मुख्‍य रूप से यह अभिवचित किया गया कि प्रश्‍नगत परिवाद कालबाधित है, अत: जिला मंच द्वारा पारित आदेश अपास्‍त किया जाय।

पुनरीक्षणकर्ता की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री बी0के0 उपाध्‍याय तथा प्रत्‍यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री शशि कान्‍त शुक्‍ला उपस्थित आये। उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्‍तागण को विस्‍तार पूर्वक सुना गया तथा प्रश्‍नगत आदेश का गम्‍भीरता से परिशीलन किया गया।

     पुनरीक्षणकर्ता/विपक्षी सं0-1 के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा मुख्‍य रूप से यह तर्क प्रस्‍तुत किया गया कि अविवादित रूप से प्रश्‍नगत ट्रैक्‍टर को क्रय करने के लिए दिनांक 19.11.2004 को रू0 25,000.00 अदा किये गये और ऋण की बावत एग्रीमेंट दिनांक 27.11.2004 को निष्‍पादित हुआ और ऐसी स्थिति में प्रश्‍नगत परिवाद जो अविवादित रूप से दिनांक 12.01.2012 को योजित किया गया, वह कालबाधित है। यह तर्क भी प्रस्‍तुत किया गया कि आरबीट्रेटर द्वारा अवार्ड पारित किये जाने के संदर्भ में परिवाद योजित नहीं किया जा सकता है। उक्‍त तर्क के संदर्भ में परिवादी/प्रत्‍यर्थी की ओर से यह तर्क जिला मंच के समक्ष भी प्रस्‍तुत किया गया था कि प्रश्‍नगत ट्रक्‍टर कार्य नहीं कर रहा था, अत: उसे कानपुर आफिस को दिनांक 24.10.2005 को वाप‍स कर दिया गया एवं परिवादी अदा की गई धनराशि की वापसी का प्रयास करता रहा, परन्‍तु उसे प्रश्‍नगत धनराशि वापस नहीं की गई एवं माह दिसम्‍बर, 2011 में परिवादी को इस बात की जानकारी हुई कि उसके प्रकरण में मामला आरबीट्रेशन को भेजा गया था और आरबीट्रेटर द्वारा परिवादी के विरूद्ध अवार्ड पारित किया गया है और ऐसी स्थिति में परिवादी प्रश्‍नगत ट्रक्‍टर और अदा की गई धनराशि दोनों से वंचित रहा और इसमें विपक्षीगण आपस में साजिश किये हुए हैं और ऐसी स्थिति में परिवादी द्वारा प्रश्‍नगत परिवाद दिनांक 12.01.2012 को इस आशय का प्रस्‍तुत किया गया कि परिवादी को उसके द्वारा अदा की गई धनराशि 18 प्रतिशत वार्षिक ब्‍याज की दर से दिलाया जाय और अन्‍य अनुतोष की भी मॉग की गई।

     जिला मंच द्वारा उभय पक्ष के तर्को पर विस्‍तार से विचार करते हुए यह निष्‍कर्ष दिया गया कि वर्तमान परिवाद कालबाधित नहीं है, जिससे

-3-

क्षुब्‍ध होकर विपक्षी/अपीलार्थी की ओर से वर्तमान पुनरीक्षण प्रस्‍तुत किया गया है।

     पुनरीक्षणकर्ता के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा मुख्‍य रूप से यह तर्क प्रस्‍तुत किया गया कि अविवादित रूप से वाहन को वर्ष-2004 में क्रय किया गया था और परिवाद वर्ष-2012 में योजित किया गया, ऐसी स्थिति में परिवाद कालबाधित है और अपने तर्क के समर्थन में मा0 उच्‍चतम न्‍यायालय की नजीर Kandimalla Raghavaiah & Co. Vs. National Insurance Co. Ltd. & anr. III (2009) CPJ 75 (SC) की ओर आकर्षित किया गया और यह कहा गया कि वाद कारण उत्‍पन्‍न होने की तिथि से ही कालबाधन के संदर्भ में गणना की जाना चाहिए एवं वर्तमान प्रकरण में वाहन का क्रय करना वर्ष-2004 में पाया जाता है। वाद कारण वर्ष-2004 में ही उत्‍पन्‍न हो गया था, अत: वर्तमान परिवाद कालबाधित है। उपरोक्‍त तर्क के संदर्भ में प्रत्‍यर्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा यह तर्क प्रस्‍तुत किया गया कि वाद कारण परिवाद पत्र के अभिवचन के आधार पर निश्चित किया जाता है और वाद पत्र में स्‍पष्‍ट रूप से यह अभिवचितकिया गया कि आरबीट्रेशन कार्यवाही की बावत परिवाद को वर्ष-2011 में जानकारी प्राप्‍त हुई, तत्‍पश्‍चात उसके द्वारा वर्ष-2012 में परिवाद प्रस्‍तुत कर दिया गया और इस प्रकार वर्तमान प्रकरण में वाद कारण वर्ष-2011 में उत्‍पन्‍न होना स्‍वीकार किये जाने योग्‍य है। परिवादी द्वारा प्रश्‍नगत परिवाद के माध्‍यम से अदा की गई धनराशि की वापसी का अनुतोष मॉगा गया है और आरबीट्रेशन के संदर्भ में परिवादी के विरूद्ध अवार्ड पारित किया गया और उसकी जानकारी परिवादी के अनुसार माह नवम्‍बर, 2011 में हुई है, अत: वाद कारण का वर्ष-2011 में होना स्‍वीकार किये जाने योग्‍य है। ऐसी स्थिति में पुनरीक्षणकर्ता प्रस्‍तुत उपरोक्‍त नजीर का कोई लाभ वर्तमान प्रकरण में पुनरीक्षणकर्ता को प्राप्‍त नहीं है।

     पुनरीक्षणकर्ता के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा पीठ का ध्‍यान मा0 उच्‍चतम न्‍यायालय की नजीर State Bank of India Vs. B.S. Agricultural Industries (I) II (2009) CPJ 29 (SC) एवं V.B. Tyagi Vs. South Central Railway III (2010) CPJ 241 (NC) की ओर आकर्षित किया गया। उपरोक्‍त वर्णित नजीरों में भी प्रतिपादित सिद्धांतों का लाभ पुनरीक्षणकर्ता का प्राप्‍त नहीं है, क्‍योंकि वर्तमान प्रकरण में परिवाद पत्र के अभिवचनों को देखते हुए

-4-

वाद कारण वर्ष-2011 में उत्‍पन्‍न हुआ और ऐसी स्थिति में परिवाद का कालबाधित होना स्‍वीकार किये जाने योग्‍य नहीं है और इस संदर्भ में जिला मंच द्वारा जो निष्‍कर्ष दिया गया है, वह विधि अनुकूल है। प्रस्‍तुत पुनरीक्षण खण्डित किये जाने योग्‍य है।

आदेश

     प्रस्‍तुत पुनरीक्षण खण्डित किया जाता है।

    

           (जे0एन0 सिन्‍हा)                                   पीठासीन सदस्‍य                   

 

हरीश आशु.,

कोर्ट सं0-2

 
 
[HON'BLE MR. Raj Kamal Gupta]
PRESIDING MEMBER

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