राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।
सुरक्षित
अपील सं0-२०४९/२००७
(जिला मंच, गाजियाबाद द्वारा परिवाद सं0-७००/२००३ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक ०६-०७-२००७ के विरूद्ध)
कारपोरेशन बैंक, बी-१, सैक्टर-२६, ब्रान्च नोएडा, गौतम बुद्ध नगर, द्वारा ब्रान्च मैनेजर।
............. अपीलार्थी/विपक्षी।
बनाम्
श्रीमती अमृता कोहली पत्नी श्री कुनाल कोहली, निवासी १०२, सन ब्रीज अपार्टमेण्ट, टावर-बी, प्लाट नं0-३, सैक्टर-५, वैशाली, गाजियाबाद।
............. प्रत्यर्थी/परिवादिनी।
समक्ष:-
१. मा0 श्री उदय शंकर अवस्थी, पीठासीन सदस्य।
२. मा0 श्री गोवर्द्धन यादव, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित :- श्री अमित शर्मा विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित :- कोई नहीं।
दिनांक : २६-०२-२०१८.
मा0 श्री उदय शंकर अवस्थी, पीठासीन सदस्य द्वारा उदघोषित
निर्णय
यह अपील, जिला मंच, गाजियाबाद द्वारा परिवाद सं0-७००/२००३ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक ०६-०७-२००७ के विरूद्ध योजित की गयी है।
संक्षेप में तथ्य इस प्रकार हैं कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी के कथनानुसार उसका एक बचत खाता सं0-८०२३ अपीलार्थी की गौतम बुद्ध नगर शाखा में है। इस खाते के संचालन हेतु जारी की गई चेक बुक misplace हो गई, जिसके कुछ खाली चेकों पर परिवादिनी के हस्ताक्षर थे। दिनांक २४-०५-२००२ को परिवादिनी ने एक प्रार्थना पत्र अपीलार्थी को नई चेक बुक जारी करने हेतु प्रेषित किया। अपीलार्थी द्वारा २४-०५-२००२ को नई चेक बुक जारी की गई। पुरानी खो गई चेक बुक का चेक सं0-५४४३७२ जो खाली था और जिस पर परिवादिनी के हस्ताक्षर थे, को वी0एम0 छाबड़ा नाम भरकर किसी व्यक्ति ने अपीलार्थी के कर्मचारियों से
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साजिश करके १,०४,०००/- रू० के भुगतान हेतु प्रेषित किया। इस चेक की तिथि में अंक ३ में ओवर राइटिंग करके २ को ३ बनाया गया। बैंक के कर्मचारियों ने साजिश करके इस चेक का भुगतान बैंक के नियमों की अवहेलना करते हुए कर दिया। श्री वी0एम0 छाबड़ा परिवादिनी के मकान मालिक थे किन्तु यह चेक उनके द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया और न ही उनके द्वारा कोई धनराशि प्राप्त की गई। अत: अवैध रूप से निकाली गई १,०४,०००/- रू० की धनराशि की मय ब्याज वापसी एवं क्षतिपूर्ति की अदायगी हेतु परिवाद जिला मंच के समक्ष प्रेषित किया गया।
अपीलार्थी बैंक ने जिला मंच के समक्ष प्रतिवाद पत्र प्रस्तुत किया। अपीलार्थी बैंक के कथनानुसार प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने चेक बुक खोने की कोई शिकायत अपीलार्थी बैंक में प्रेषित नहीं की। स्वीकृत रूप से परिवादिनी के हस्ताक्षर से प्रश्नगत चेक भुगतान हेतु अपीलार्थी बैंक के समक्ष प्रस्तुत किया गया। परिवादिनी ने भुगतान रोके जाने हेतु कोई सूचना अपीलार्थी बैंक को प्रेषित नहीं की। अत: परिवादिनी द्वारा जारी किए गये चेक का भुगतान बैंक द्वारा न किए जाने का कोई औचित्य नहीं था। परिवादिनी ने वी0एम0 छाबड़ा जिनके नाम यह चेक जारी किया को परिवाद में पक्षकार नहीं बनाया और न ही अवैध रूप से धन निकाले जाने के विरूद्ध कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई। अपीलार्थी द्वारा सेवा में कोई त्रुटि नहीं की गई। अपीलार्थी का यह भी कथन है कि प्रश्नगत परिवाद की सुनवाई का क्षेत्राधिकार जिला मंच गाजियाबाद को प्राप्त नहीं था।
विद्वान जिला मंच ने यह मत व्यक्त करते हुए प्रत्यर्थी/परिवादिनी द्वारा अपीलार्थी बैंक में चेक बुक खोने की सूचना दिनांक २४-०५-२००२ को प्राप्त कराई गई थी। उसके उपरान्त ही परिवादिनी को नई चेक बुक जारी की गई। प्रश्नगत चेक में तिथि में परिवर्तन किए जाने के बाबजूद बैंक के नियमों का पालन न करते हुए प्रश्नगत चेक का भुगतान किया गया। अत: प्रश्नगत निर्णय द्वारा परिवाद स्वीकार करते हुए अपीलार्थी को निर्देशित किया गया कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी को १,०४,०००/- रू० मय १० प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्याज की दर से दिनांक २९-०३-२००३ से भुगतान की तिथि तक अदा करे। इसके अतिरिक्त अपीलार्थी प्रत्यर्थी/परिवादिनी को ५,०००/- रू० मानसिक, आर्थिक क्षति व वाद व्यय के रूप में अदा करे।
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इस निर्णय से क्षुब्ध होकर यह अपील योजित की गयी है।
हमने अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री अमित शर्मा के तर्क सुने। पत्रावली का अवलोकन किया गया। प्रत्यर्थी को पंजीकृत डाक से नोटिस दिनांक ०१-०८-२०१७ को भेजी गई। प्रत्यर्थी पर आदेश दिनांक २८-०९-२०१७ द्वारा तामील पर्याप्त मानी गई। प्रत्यर्थी की ओर से तर्क प्रस्तुत करने हेतु कोई उपस्थित नहीं हुआ।
अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि प्रश्नगत परिवाद की सुनवाई का क्षेत्राधिकार जिला मंच गाजियाबाद को प्राप्त नहीं था। परिवादिनी का खाता अपीलार्थी बैंक की गौतम बुद्ध नगर शाखा में था और परिवादिनी ने इस शाखा में स्थित खाते से चेक का अवैध रूप से भुगतान होना बताया है। परिवाद के अभिकथनों में कोई वाद कारण जनपद गाजियाबाद में उत्पन्न होना अभिकथित नहीं किया गया है, किन्तु विद्वान जिला मंच ने इस तथ्य पर ध्यान न देते हुए मात्र इस आधार पर कि अपीलार्थी बैंक की शाखा जनपद गाजियाबाद में भी स्थित है प्रश्नगत परिवाद की सुनवाई का क्षेत्राधिकार जिला मंच गाजियाबाद का भी माना है।
परिवाद के अभिकथनों में भी प्रश्नगत परिवाद की सुनवाई का क्षेत्राधिकार जिला मंच गाजियाबाद का उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा-११(बी) के आलोक में जनपद गाजियाबाद में अपीलार्थी बैंक की शाखा स्थित होने के आधार पर अभिकथित किया है, वाद कारण जनपद गाजियाबाद में उत्पन्न होना अभिकथित नहीं किया है। मा0 उच्चतम न्यायालय ने सोनिक सर्जिकल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड, IV (2009) CPJ 40 (SC) के मामले में इस परिपेक्ष्य में शाखा कार्यालय का तात्पर्य उस शाखा कार्यालय से माना है जहॉं वाद कारण उत्पन्न हो।
प्रस्तुत प्रकरण के सन्दर्भ में शाखा कार्यालय, गाजियाबाद में कोई वाद कारण उत्पन्न होना अभिकथित नहीं किया गया। वाद कारण वस्तुत: शाखा कार्यालय गौतम बुद्ध नगर में उत्पन्न होना विदित हो रहा है। अत: अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का यह तर्क स्वीकार किए जाने योग्य है कि प्रश्नगत परिवाद की सुनवाई का क्षेत्राधिकार जिला मंच गाजियाबाद को प्राप्त नहीं था, प्रश्नगत निर्णय क्षेत्राधिकार के अभाव में पारित होने के कारण अपास्त किए जाने योग्य है।
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जहॉ तक गुणदोष के आधार पर प्रश्नगत प्रकरण के विचारण का प्रश्न है अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह स्वीकार किया गया कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने दिनांक २४-०५-२००२ को एक प्रार्थना पत्र नई चेक बुक जारी किए जाने हेतु अपीलार्थी बैंक में प्रस्तुत किया था किन्तु इस प्रार्थना पत्र में प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने पुरानी चेक बुक खोने का तथ्य उल्लिखित नहीं किया था बल्कि अँग्रेजी भाषा में misplace शब्द का प्रयोग किया था जिसका शाब्दिक अर्थ इधर-उधर रखा जाना माना जा सकता है। यदि परिवादिनी की चेक बुक खो गई होती तो स्वाभाविक रूप से परिवादिनी द्वारा loss शब्द का प्रयोग किया जाता। इस सन्दर्भ में अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता ने अपील मेमो के साथ उक्त पत्र की फोटोप्रति कागज सं0-१६ के रूप में दाखिल की है जिसके अवलोकन से इस सन्दर्भ में अपलार्थी के विद्वान अधिवक्ता के तर्क की पुष्टि हो रही है। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि परिवाद के अभिकथनों में स्वयं प्रत्यर्थी/परिवादिनी यह स्वीकार करती है कि प्रश्नगत चेक जो अपीलार्थी बैंक में भुगतान हेतु प्रस्तुत किया गया, में उसके हस्ताक्षर थे। परिवाद के अभिकथनों में यह भी स्वीकार किया गया है कि यह चेक किसी व्यक्ति द्वारा वी0एम0 छाबड़ा नाम के व्यक्ति को भुगतान हेतु भरा गया है। यह भी स्वीकार किया गया है कि श्री वी0एम0 छाबड़ा प्रत्यर्थी/परिवादिनी के मकान मालिक थे।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया कि प्रश्नगत चेक की तिथि में अंक २ को ३ के रूप में परिवर्तित नहीं किया गया है। प्रश्नगत चेक की फोटोप्रति अपील मेमो के साथ पृष्ठ सं0-१७ के रूप में दाखिल की गई है जिसका हमने अवलोकन किया, जिसके अवलोकन से यह स्पष्ट है कि तिथि में अंक २ को ३ में परिवर्तित नहीं किया गया है। अपीलार्थी की ओर से यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने वी0एम0 छाबड़ा को प्रश्नगत परिवाद में पक्षकार नहीं बनाया है और न ही अवैध रूप से धन निकाले जाने के विरूद्ध कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाई है। ऐसी परिस्थिति में प्रश्नगत चेक का भुगतान करके अपीलार्थी बैंक द्वारा सेवा में त्रुटि किया जाना नहीं माना जा सकता। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता के तर्क में बल प्रतीत होता है। प्रत्यर्थी/परिवादिनी यह स्वीकार करती है कि प्रश्नगत चेक पर उसके हस्ताक्षर थे।
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परिवादिनी द्वारा यह भी स्वीकार किया गया है कि यह चेक श्री वी0एम0 छाबड़ा नाम के व्यक्ति को भुगतान हेतु प्रस्तुत किया गया तथा श्री वी0एम0 छाबड़ा उसके मकान मालिक थे। प्रत्यर्थी/परिवादिनी का यह कथन नहीं है कि पूर्व में जारी की गई चेक बुक के बिना प्रयोग चेकों का भुगतान रोके जाने हेतु उसने कोई सूचना अपीलार्थी बैंक को प्रेषित की थी। ऐसी परिस्थिति में हमारे विचार से प्रश्नगत चेक का भुगतान अपीलार्थी बैंक द्वारा किया जाना सेवा में त्रुटि नहीं माना जा सकता। विद्वान जिला मंच ने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य का उचित परिशीलन न करते हुए प्रश्नगत निर्णय पारित किया है, जो अपास्त करते हुए परिवाद निरस्त किए जाने योग्य है। अपील तद्नुसार स्वीकार किए जाने योग्य है।
आदेश
प्रस्तुत अपील स्वीकार की जाती है। जिला मंच, गाजियाबाद द्वारा परिवाद सं0 ७००/२००३ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक ०६-०७-२००७ अपास्त करते हुए परिवाद निरस्त किया जाता है।
उभय पक्ष इस अपील का व्यय-भार अपना-अपना स्वयं वहन करेंगे।
उभय पक्ष को इस निर्णय की प्रमाणित प्रतिलिपि नियमानुसार उपलब्ध करायी जाय।
(उदय शंकर अवस्थी)
पीठासीन सदस्य
(गोवर्द्धन यादव)
सदस्य
प्रमोद कुमार
वैय0सहा0ग्रेड-१,
कोर्ट-३.