Uttar Pradesh

StateCommission

A/3436/2017

Suraj Prakash Khare - Complainant(s)

Versus

Adhi. Abh. Vidyut Vitaran Khand - Opp.Party(s)

Self

05 Sep 2019

ORDER

STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP
C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010
 
First Appeal No. A/3436/2017
( Date of Filing : 29 Dec 2017 )
(Arisen out of Order Dated 17/10/2017 in Case No. C/57/2015 of District Mahoba)
 
1. Suraj Prakash Khare
Mahoba
...........Appellant(s)
Versus
1. Adhi. Abh. Vidyut Vitaran Khand
Mahoba
...........Respondent(s)
 
BEFORE: 
 HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN PRESIDENT
 
For the Appellant:
For the Respondent:
Dated : 05 Sep 2019
Final Order / Judgement

                                                                                                        

                                                                                                                                          (सुरक्षित)

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ

 

अपील सं0- 3436/2017

(जिला उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष फोरम, महोबा द्वारा परिवाद सं0- 57/2015 में पारित निर्णय व आदेश दि0 17.10.2017 के विरूद्ध)

सूरज प्रकाश खरे, पूरा पता- शुक्‍लानापुरा (बरगद के पास) नगर/ग्राम/तहसील/जिला- महोबा, उ0प्र0 पिन नं0- 210427 मो0 नं0- 9506983507

                                               .............अपीलार्थी

                            बनाम

अधिशासी अभियंता, विद्युत वितरण खण्‍ड महोबा उ0प्र0, पूरा पता- सत्तिनपुरा, महोबा, नगर/ग्राम/तहसील/जिला- महोबा, उ0प्र0 पिन नं0- 210427

                                               ..............प्रत्‍यर्थी

समक्ष:-                       

माननीय न्‍यायमूर्ति श्री अख्‍तर हुसैन खान, अध्‍यक्ष   

अपीलार्थी की ओर से उपस्थित    :  व्‍यक्तिगत रूप से।  

प्रत्‍यर्थी की ओर से उपस्थित     :  श्री इसार हुसैन,

                              विद्वान अधिवक्‍ता।   

 

दिनांक:-  27.09.2019  

माननीय न्‍यायमूर्ति श्री अख्‍तर हुसैन खान, अध्‍यक्ष  द्वारा उद्घोषित

                                                 

निर्णय

          परिवाद सं0- 57/2015 श्री सूरज प्रकाश खरे बनाम अधिशासी अभियंता विद्युत वितरण खण्‍ड में जिला फोरम, महोबा द्वारा पारित निर्णय व आदेश दि0 17.10.2017 के विरूद्ध यह अपील धारा 15 उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत राज्‍य आयोग के समक्ष प्रस्‍तुत की गई है।

          आक्षेपित निर्णय और आदेश के द्वारा जिला फोरम ने परिवाद आंशिक रूप से स्‍वीकार करते हुए निम्‍न आदेश पारित किया है:-

 

          ‘’परिवादी द्वारा प्रस्‍तुत परिवाद विपक्षी के विरुद्ध आंशिक रूप से स्‍वीकार किया जाता है। विपक्षी अधिशाषी अभियंता विद्युत वितरण खण्‍ड महोबा को आदेशित किया जाता है कि वह परिवादी के निवास पर स्‍थापित विद्युत संयोजन को यदि दो किलोवाट भार क्षमता के स्‍थान पर एक किलोवाट भार क्षमता का न किया गया हो तो इस निर्णय की तिथि से 30 दिन के अन्‍दर कर दें। तदनुसार अद्यतन संशोधित बिल अधिभार रहित इसी अवधि में परिवादी को प्रदान करें। परिवादी द्वारा पूर्व में दौरान मुकदमा जमा की गई मु04500/-रू0 (मु0 चार हजार पांच सौ रूपये) की धनराशि का समायोजन बकाया विद्युत बिल में किया जाय। इसी अवधि में विपक्षी द्वारा परिवादी को मानसिक कष्‍ट के मद में मु05,000/-रू0 (मु0पांच हजार रूपये) तथा वाद व्‍यय के मद में मु02,000/-रू0 (मु0दो हजार रूपये) अदा किया जाय।

          इस निर्णय की प्रति नियमानुसार पक्षकारों को प्रदान की जाय।‘’  

          जिला फोरम के निर्णय और आदेश से परिवादी सूरज प्रकाश खरे संतुष्‍ट नहीं हैं अत: परिवादी ने यह अपील प्रस्‍तुत किया है और परिवाद पत्र में याचित अनुतोष प्रदान किये जाने का निवेदन किया है।   

          अपील की सुनवाई के समय अपीलार्थी व्‍यक्तिगत रूप से उपस्थित हुआ है। प्रत्‍यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री इसार हुसैन उपस्थित आये हैं।

          मैंने उभय पक्ष के तर्क को सुना है और आक्षेपित निर्णय व आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया है। 

          अपील के निर्णय हेतु संक्षिप्‍त सुसंगत तथ्‍य इस प्रकार हैं कि अपीलार्थी/परिवादी ने जिला फोरम के समक्ष परिवाद प्रस्‍तुत कर कहा है कि उसके यहां एक किलोवाट का घरेलू विद्युत कनेक्‍शन था जिसके सम्‍बन्‍ध में उसने वाद सं0- 51/2014 सूरज प्रकाश खरे बनाम प्रबंध निदेशक, दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम ऊर्जा भवन व दो अन्‍य इस आशय का दायर किया था कि विपक्षीगण को आदेशित किया जाए कि वे तत्‍काल उसके संयोजन सं0- 1620 के भार दो किलोवाट को घटाकर एक किलोवाट करें तथा उसका पुराना मीटर बदलें और एक्‍वाचेक्‍ड मीटर लगायें। अपीलार्थी/परिवादी ने परिवाद पत्र में कहा है कि प्रत्‍यर्थी/विपक्षीगण द्वारा दौरान मुकदमा ही उसका मीटर दि0 23.11.2014 को बदल दिया गया और दो किलोवाट से एक किलोवाट कर दिया गया तथा उसके द्वारा जमा की गई धनराशि समायोजित कर एक किलोवाट का बिल दि0 10.10.2014 से 24.11.2014 तक 38 महीने का 9,336/-रु0 का बनाकर दिया गया तब उसने अपने क्‍लेम का परित्‍याग करते हुए लोक अदालत में दि0 06.12.2014 को सुलह समझौते के आधार पर राजीनामा कर लिया।

           परिवाद पत्र के अनुसार अपीलार्थी/परिवादी का कथन है कि  प्रत्‍यर्थी/विपक्षीगण द्वारा दो किलोवाट से एक किलोवाट विद्युत भार समझौता होने के पहले ही अपनी गलती मानते हुए दि0 23.11.2014 को किया गया था।

          परिवाद पत्र में परिवादी ने कहा है कि बगैर जांच कराये एवं विभागीय नियमों और आदेशों को देखे व समझे एक किलोवाट से कम विद्युत भार के उसके घरेलू संयोजन संख्‍या 2016 का भार प्रत्‍यर्थी/विपक्षीगण ने दो किलोवाट कर दिया था जो लोक अदालत में दि0 06.12.2014 के राजीनामे व आदेश का उल्‍लंघन है।

          परिवाद पत्र में अपीलार्थी/परिवादी ने कहा है कि प्रत्‍यर्थी/विपक्षीगण ने जो नया मीटर लगाया है उसमें एम0सी0बी0 नहीं है।

          परिवाद पत्र में अपीलार्थी/परिवादी ने कहा है कि समझौते से पूर्व उपरोक्‍त परिवाद में अपीलार्थी/परिवादी ने 50,000/-रु0 घोर मानसिक कष्‍ट हेतु क्षतिपूर्ति के रूप में मांगा था। अत: यह धनराशि उसे राजीनामा की अवमानना के रूप में दिलायी जाए। इसके साथ ही अपीलार्थी/परिवादी ने कहा है कि समझौता राजीनामा की अवमानना स्‍वरूप जो मानसिक कष्‍ट व निराशा हुई है उसके लिए उसे 50,000/-रु0 क्षतिपूर्ति दिलायी जाए।

          परिवाद पत्र में अपीलार्थी/परिवादी ने यह भी कहा है कि उसे दि0 15.02.1982 से भुगतान की तिथि तक सलाना ब्‍याज की दर से 18 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्‍याज दिलाया जाए। उससे बाद के जो बिल एक किलोवाट के हिसाब से दिया गया है माह जनवरी में वही उससे लिया जाए। लोक अदालत की अवमानना हेतु उसे 10,000/-रु0 वाद व्‍यय दिलाया जाए। उपरोक्‍त के अतिरिक्‍त परिवाद पत्र में अपीलार्थी/परिवादी ने निम्‍न प्रार्थना की है:-

          1. यह कि विपक्षीगण को आदेशित किया जावे कि तत्‍काल प्रार्थी के संयोजन संख्‍या 1620 के भार 2 कि.वाट से 1 कि.वाट करें एवं विपक्षी द्वारा भेजा गया 2 K.W. का बिल दिनांक 14.3.15 व 14.4.15 को निरस्‍त किया जावे एवं विपक्षी भविष्‍य में कोई त्रुटिपूर्ण 2 K.W. का बिल भेजे तो निरस्‍त किया जावे।     

          2. यह कि विपक्षीगण को आदेशित किया जावे सुलहनामे के परिणाम स्‍वरूप जो मैंने 9336.00 ‘नौ हजार तीन सौ छत्‍तीस रूपया 28.11.2014 को जमा किये हैं उसका वर्षवार तदानुसार माह वार बिल की फोटो कापी का लेजर की फोटो कापी सहित स्‍टेटमेंट की प्रमाणित प्रति दिलाये जाने की कृपा करें।

          3. यह कि माननीय राष्‍ट्रीय लोक अदालत महोबा 06.12.2014 के सुलह समझौते को तोड़ते हुए फिर से विद्युत विभाग के नियमों को अपने हांथों में लेकर मेरे विद्युत संयोजन संख्‍या 2016 में विद्युत भार 1 कि0 वाट से 2 कि0वाट कर दिया। इस प्रकार माननीय राष्‍ट्रीय लोक अदालत महोबा के समक्ष कराये समझौते की अवमानना के परिणाम स्‍वरूप वाद क्रमांक 51/2014 के सारे देय ज्‍यों के त्‍यों दिलाये जाने की कृपा की जाये। जैसे:-

          क- मीटर बदलने बावत 130/-रू0 15.02.1982 को जमा किया था किन्‍तु विपक्षीगण ने ना तो चैक किया और न ही बदला गया इलेक्ट्रिसिटी कोड 2005 के अनुसार मुझ प्रार्थी को 50.00 रूपये प्रतिमाह के हिसाब से 30000.00 ‘तीस हजार रूपया’ उस पर 18 प्रतिशत ब्‍याज जैसा कि पोस्‍ट आफिस बैंक, जी0पी0एफ0 में मिलता है। दिलाये जाने की कृपा करें।

          ख- विपक्षीगण की ओर से सुलह समझौते के आधार पर मानसिक कष्‍ट के एवज में 50000.00 पचास हजार रूपया त्‍याग दिये थे सुलह समझौते के उल्‍लंघन स्‍वरूप 50000.00 रूपये दिलाये जाने की कृपा करें।

          ग- सुलह समझौते के परिणाम स्‍वरूप जो मैंने वाद व्‍यय 10000.00 रूपये त्‍याग दिया था वह विपक्षीगण से सुलह समझौता तोड़ने के परिणाम स्‍वरूप 10000.00 दिलाये जाने की कृपा करें।

          घ- गलत और 96.6 प्रतिशत तेज भागने वाले मीटर लगाकर जो मेरा विद्युत विभाग में 96.6 प्रतिशत ज्‍यादा पैसा 09.12.2003 से 23.11.2014 तक, 10 वर्ष की ज्‍यादा ली गयी राशि 18 प्रतिशत ब्‍याज सहित 60000.00 (साठ हजार रूपया) दिलाये जाने की कृपा की जाये। दर्शाए मीटर के अलावा मीटर लगाकर।

          ड.- इस नये वाद का व्‍यय 11000.00 रूपये दिलाये जाने की कृपा की जाये।

          (च) न्‍यायालय के समक्ष हुए समझौते को तोड़ने से जो मुझे मानसिक कष्‍ट हुआ उसके एवज में 30000.00 रूपये दिलाये जाने की कृपा की जाये।

          जिला फोरम के समक्ष प्रत्‍यर्थी/विपक्षी की ओर से लिखित कथन प्रस्‍तुत किया गया है और कहा गया है कि वास्‍तव में अपीलार्थी/परिवादी का विद्युत संयोजन 2016 है। लिखित कथन में कहा गया है कि अपीलार्थी/परिवादी ने पहले उपभोक्‍ता वाद सं0- 51/2014 सूरज प्रकाश खरे बनाम प्रबंध निदेशक दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लि0 आदि जिला फोरम में दायर किया था जिसमें प्रत्‍यर्थी/विपक्षी ने अपना लिखित कथन प्रस्‍तुत किया था और उपरोक्‍त परिवाद राष्‍ट्रीय लोक अदालत में समझौते के आधार पर पूर्ण संतुष्टि में निस्‍तारित कर दिया गया है।

          लिखित कथन में प्रत्‍यर्थी/विपक्षी की ओर से कहा गया है कि लोक अदालत में पारित निर्णय दि0 06.12.2014 का पालन विपक्षी ने किया है। यदि कोई लिपिकीय एवं कम्‍प्‍यूटर अंकन की त्रुटि हुई है तो उसे संज्ञान में आने पर तत्‍काल संशोधित कर दिया गया है।

          लिखित कथन में प्रत्‍यर्थी/विपक्षी की ओर से कहा गया है कि बिल त्रुटिपूर्ण होने पर नियत प्राधिकारी के समक्ष प्रार्थना पत्र अपीलार्थी/परिवादी को प्रस्‍तुत करना चाहिए था। उसने अंकन त्रुटि अथवा अधिक लोड के सम्‍बन्‍ध में कोई आवेदन पत्र नियत प्राधिकारी अधिशासी अभियंता के समक्ष प्रस्‍तुत नहीं किया है। लिखित कथन में प्रत्‍यर्थी/विपक्षी ने कहा है कि त्रुटिवश अपीलार्थी/परिवादी के बिल में दो किलोवाट अंकित किया गया था, जिसे प्रत्‍यर्थी/विपक्षी के संज्ञान में आने पर स्‍वत: संशोधित कर दिया गया है। प्रत्‍यर्थी/विपक्षी ने माह जून 2015 में संशोधित बिल की प्रति अपीलार्थी/परिवादी को प्रेषित की है, परन्‍तु अपीलार्थी/परिवादी ने विद्युत देयों का भुगतान नहीं किया है।

          जिला फोरम ने उभय पक्ष के अभिकथन एवं उपलब्‍ध साक्ष्‍यों पर विचार करने के उपरांत अपने निर्णय में उल्‍लेख किया है कि परिवादी द्वारा विभिन्‍न मदों में अत्‍यधिक क्षतिपूर्ति की धनराशि मांगी गई है, लेकिन उसके सम्‍बन्‍ध में वास्‍तविक क्षति होने का कोई विश्‍वसनीय साक्ष्‍य उसने प्रस्‍तुत नहीं किया है जिससे यह साबित हो कि विपक्षी द्वारा सेवा में त्रुटि के फलस्‍वरूप उसे अत्‍यधिक मानसिक कष्‍ट सहना पड़ा है। अत: जिला फोरम ने यह माना है कि अपीलार्थी/परिवादी को सामान्‍य क्षतिपूर्ति दिलाये जाने से ही न्‍याय के उद्देश्‍य की पूर्ति होगी।

          उपरोक्‍त निष्‍कर्ष के आधार पर ही जिला फोरम ने आक्षेपित आदेश पारित किया है जो ऊपर अंकित है।

          अपीलार्थी का तर्क है कि जिला फोरम ने अपीलार्थी/परिवादी के कथन एवं सम्‍पूर्ण तथ्‍यों पर उचित ढंग से विचार नहीं किया है और जो अनुतोष प्रदान किया है वह वाद की परिस्थितियों में अपर्याप्‍त है। अत: जिला फोरम द्वारा पारित निर्णय और आदेश संशोधित करते हुए अपीलार्थी/परिवादी को परिवाद पत्र में याचित अनुतोष प्रदान की जाए।

          प्रत्‍यर्थी के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि जिला फोरम ने जो अपीलार्थी/परिवादी को अनुतोष प्रदान किया है कानूनन वह अनुतोष भी अपीलार्थी/परिवादी पाने का अधिकारी नहीं है, परन्‍तु प्रत्‍यर्थी/विपक्षी ने जिला फोरम के निर्णय व आदेश के विरुद्ध कोई अपील प्रस्‍तुत नहीं की है। अत: जिला फोरम के निर्णय व आदेश में हस्‍तक्षेप हेतु उचित आधार नहीं है।

          मैंने उभय पक्ष के तर्क पर विचार किया है।

          प्रत्‍यर्थी की ओर से आक्षेपित निर्णय व आदेश के विरुद्ध अपील प्रस्‍तुत किया जाना नहीं बताया गया है।

          माननीय उच्‍च न्‍यायालय बाम्‍बे द्वारा Writ Petition No. 3439 of 2016 Ramchandra Laxman Kamble Vs. Shobha Ramchandra Kamble and Anr. में दिया गया निर्णय दि0 21.12.2018 अपीलार्थी ने संदर्भित किया है जिसमें माननीय उच्‍च न्‍यायालय ने पक्षों की सहमति से पारित डिक्री या आदेश के सम्‍बन्‍ध में निम्‍न मत व्‍यक्‍त किया है:-

                 The consent decrees made by the courts are in effect of nothing but contracts with the seal of the court super-added to them. Accordingly, if the term of the contract is itself opposed to public policy then, such term, is void and unenforceable. If the term is severable then, only the term can be declared as void. If the term is not severable, then, perhaps, the entire contract may fall.

         परिवाद पत्र में याचित अनुतोष से स्‍पष्‍ट है कि अपीलार्थी/परिवादी ने प्रत्‍यर्थी/विपक्षी के विरुद्ध परिवाद लोक अदालत में हुए समझौता का उल्‍लंघन विपक्षी द्वारा किये जाने के आधार पर प्रस्‍तुत किया है। लोक अदालत हुए समझौता को विधि विरुद्ध नहीं कहा जा सकता है।

          प्रत्‍यर्थी/विपक्षी की ओर से जिला फोरम के समक्ष प्रस्‍तुत लिखित कथन से स्‍पष्‍ट होता है कि लोक अदालत में हुए समझौता के बाद भी विपक्षी ने दो किलोवाट के संयोजन का बिल अपीलार्थी को भेजा है जब कि लोक अदालत के निर्णय के अनुसार एक किलोवाट के संयोजन का बिल भेजना चाहिए था। लोक अदालत के निर्णय का अनुपालन प्रत्‍यर्थी/विपक्षी द्वारा न किये जाने से जो अपीलार्थी/परिवादी को कष्‍ट हुआ है उसके लिए जिला फोरम ने अपीलार्थी/परिवादी को 5,000/-रु0 क्षतिपूर्ति प्रदान किया है जो कम प्रतीत होता है। सम्‍पूर्ण तथ्‍यों पर विचार करने के उपरांत क्षतिपूर्ति की धनराशि 5,000/-रु0 से बढ़ाकर 15,000/-रु0 किया जाना उचित है।

          उभय पक्ष के अभिकथन एवं सम्‍पूर्ण तथ्‍यों और साक्ष्‍यों पर विचार करने के बाद मैं इस मत का हूँ कि जिला फोरम के निर्णय व आदेश में उपरोक्‍त संशोधन के अलावा और कोई संशोधन उचित नहीं है।

          उपरोक्‍त निष्‍कर्ष के आधार पर अपील आंशिक रूप से स्‍वीकार की जाती है और जिला फोरम द्वारा आदेशित क्षतिपूर्ति की धनराशि 5,000/-रु0 को बढ़ाकर 15,000/-रु0 किया जाता है। जिला फोरम के निर्णय व आदेश का शेष अंश उपरोक्‍त संशोधन के साथ यथावत रहेगा।

          प्रत्‍यर्थी, अपीलार्थी को 2,000/-रु0 अपील व्‍यय देगा। 

  

      

                    (न्‍यायमूर्ति अख्‍तर हुसैन खान)                                              

                                           अध्‍यक्ष                            

शेर सिंह आशु0,

कोर्ट नं0-1

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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[HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN]
PRESIDENT
 

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