जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण फोरम, सिवनी(म0प्र0)
प्रकरण क्रमांक 282014 प्रस्तुति दिनांक-29.03.2014
समक्ष :-
अध्यक्ष - रवि कुमार नायक
सदस्य - श्री वीरेन्द्र सिंह राजपूत,
विजय कुमार अवस्थी, आत्मज श्री
सुरेष कुमार अवस्थी, निवासी-कटंगी
रोड, सिवनी तहसील व जिला सिवनी
(म0प्र0)। 480-661................................................आवेदकपरिवादी।
:-विरूद्ध-:
आदित्य नाहटा, आत्मज स्वर्गीय श्री
प्रतापचंद नाहटा, संचालक-मेसर्स
पन्नालाल प्रतापचंद नाहटा, सोना एवं
चांदी के विक्रेता, बुधवारी बाजार, नायक
क्लाथ स्टोर्स के सामने, सिवनी तहसील
व जिला सिवनी (म0प्र0) 480-661.......................अनावेदकविपक्षी।
:-आदेश-:
(आज दिनांक- 15.07.2014 को पारित)
द्वारा-अध्यक्ष:-
(1) परिवादी ने यह परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के तहत, 30 ग्राम फाइन सोना की खरीदी के लिए अनावेदक को अदा की गर्इ 1,00,000-रूपये की राषि, मय ब्याज दिलाने या तयषुदा मूल्य अनुसार, सोना व षेश राषि दिलाने व हर्जाना दिलाने के अनुतोश हेतु पेष किया है।
(2) मामले में अनावेदक-पक्ष ने उपसिथति के बाद भी कोर्इ जवाब पेष नहीं किया। अत: कोर्इ भी तथ्य स्पश्टत: स्वीकृत या स्पश्टत: विवादित नहीं।
(3) संक्षेप में परिवाद का सार यह है कि-परिवादी ने दीपावली त्यौहार के समय दिनांक-13.10.2012 को अनावेदक सोना-चांदी के जेबर विक्रेता से 30 ग्राम फाइन सोना तत्समय प्रचलित दर 30,000-रूपये प्रति 10 ग्राम की दर से खरीदना चाहा था, तो अनावेदक ने, परिवादी से 1,00,000-रूपये अगि्रम जमा करने पर, आगामी मंगलवार को देने का वायदा किया, इस पर परिवादी ने 1,00,000-रूपये जमा किये और अनावेदक ने अपने संस्थान के लेटरहेड में अपने हस्ताक्षर से लिखित जारी कर, परिवादी को प्रदान किया, अनावेदक ने जानना चाहा कि-3 तोला सोना 90,000- रूपये का होता है और 1,00,000-रूपये जमा कराया जा रहा है, तो पावती 1,00,000-रूपये की देने का निवेदन किया, लेकिन अनावेदक द्वारा कहा गया कि-वह रूपये की पावती नहीं देता, माल की देता है। और देते समय सोने की कीमत घटबढ़ गर्इ, तो उसके हिसाब से माल का लेनदेन हो जाता है और यह आष्वासन दिया था कि-परिवादी चिन्ता न करे, जैसी कीमत होगी, वैसा हिसाब कर देंगे, तो अनावेदक के विष्वास पर परिवादी ने तय हुये दिन पर, अनावेदक से संपर्क कर, बुक किये गये सोने की मांग की, पर अनावेदक ने त्यौहारी व्यस्तता का बहाना बताकर 8-10 दिन के बाद सोना देने का आष्वासन दिया, लेकिन इस तरह अनावेदक निरन्तर बहानेबाजी करकर, परिवादी को गुमराह करने लगा, बुक किया गया सोना उसे प्रदान नहीं किया, तब परिवादी ने जरिये अधिवक्ता नोटिस दिलाया, तब अनावेदक, परिवादी के भार्इ से मिलकर क्षमा याचना किया और 15-20 दिन के समय की मांग किया कि-उसके परिवार में गमी हो गर्इ है, जिससे वह व्यस्त है, तो परिवादी द्वारा पुन: प्रतीक्षा की गर्इ, लेकिन अनावेदक के द्वारा बुक किया गया सोना व षेश रकम वापस न कर, जमा 1,00,000-रूपये की राषि का निरन्तर उपयोग किया जा रहा है, जो अनावेदक द्वारा सेवा षर्तों का उल्लघंन, व्यवसायिक दुराचार और अनुचित प्रथा को अपनाया गया है। अत: तयषुदा मूल्य का सोना और षेश राषि अथवा जमा 1,00,000-रूपये की राषि 12 प्रतिषत ब्याज व हर्जाना सहित दिलाने की मांग परिवाद में की गर्इ है।
(4) अनावेदक-पक्ष की ओर से मामले में कोर्इ जवाब पेष नहीं किया गया है, हालांकि अनावेदक-पक्ष से नियुक्त अधिवक्ता मामले में नियत दो पेषियों पर उपसिथत रहे।
(5) मामले में निम्न विचारणीय प्रष्न यह हैं कि:-
(अ) क्या परिवादी से 1,00,000-रूपये अगि्रम प्राप्त कर,
अनावेदक के द्वारा बुक किया गया सोना या परिवादी
से प्राप्त की गर्इ बुकिंग राषि करार अवधि बाद भी
वापस नहीं की गर्इ?
(ब) यदि हां, तो क्या अनावेदक ने परिवादी के प्रति-अनुचित
व्यापार प्रथा या अवरोध व्यापार-प्रथा को अपनाया है?
(स) सहायता एवं व्यय?े
-:सकारण निष्कर्ष:-
विचारणीय प्रष्न क्रमांक-(अ) और (ब):-
(6) परिवादी की ओर से पेष साक्ष्य के षपथ-कथन में यह कहा गया है कि-अनावेदक सोना-चांदी और उसके जेबरात के विक्रयगिरवी आदि का व्यवसाय करता है और दिनांक-13.10.2012 को अनावेदक द्वारा, 30,000-रूपये प्रति 10 ग्राम फाइन सोने का भाव बताने पर परिवादी ने क्रय करना चाहा, तो अनावेदक ने 1,00,000-रूपये अगि्रम जमा कराया, सोना आगामी मंगलवार को देने का वायदा किया और उक्त आषय का लिखित अपने संस्था के लेटरहेड में लिखकर व हस्ताक्षर करके परिवादी को दी गर्इ, तो परिवादी ने जानना चाहा कि-30 ग्राम सोना तो 90,000-रूपये का होता है और जो 1,00,000-रूपये जमा कराया गया उसका उल्लेख पावती में नहीं, तो अनावेदक ने स्पश्ट किया कि-पावती रूपये की नहीं, माल की देते हैं, जो कि-माल को देते समय सोने की कीमत में घटबढ़ हो जाती है, तो उसके हिसाब से माल का लेनदेन हो जाता है और माल देते समय जैसी कीमत होगी, वैसा हिसाब कर देंगे। और मंगलवार के दिन सोना देने का करार किया था।
(7) तो परिवादी ने उक्त तथ्य का उल्लेख, मामला पेष करने के पूर्व जो नोटिस जरिये अधिवक्ता अनावेदक को भेजा था, उसकी प्रति प्रदर्ष सी-2 में है, उक्त नोटिस भेजे जाने बाबद प्रदर्ष सी-3 की पोस्टल रसीद और प्रदर्ष सी-4 की पोस्टल प्रापित अभिस्वीकृति की प्रतियों से तामील होना स्पश्ट होता है, उक्त तथ्य का उल्लेख परिवादी के परिवाद में भी किया गया है, लेकिन अनावेदक-पक्ष की ओर से न तो परिवाद का कोर्इ जवाब पेष किया गया, न ही परिवादी के साक्ष्य के षपथ-पत्र का उक्त तथ्य बाबद कोर्इ खण्डन में साक्ष्य, अनावेदक-पक्ष की ओर से पेष हुआ। तो इस संबंध में परिवाद के तथ्य अखणिडत हैं और अनावेदक के द्वारा जारी कही जा रही दिनांक-13.10.2012 की रसीद की प्रति प्रदर्ष सी-1 में अनावेदक के द्वारा, यह लेख किया गया है कि-30 ग्राम सोना है, जो मंगलवार को देना है।
(8) तब, जबकि-यह दर्षित है कि-यह कोर्इ गिरवी का समव्यवहार था नहीं, अनावेदक जो सोना-चांदी का विक्रेता है, उसके द्वारा 30 ग्राम सोना जमा करके मंगलवार को देने का कोर्इ कारण भी संभव नहीं और परिवादी ने कोर्इ 30 ग्राम सोना जमा किया हो, ऐसा अनावेदक का कोर्इ बचाव नहीं रहा है। तो पेष साक्ष्य से स्थापित है कि-अनावेदक ने, परिवादी से वास्तव में 1,00,000-रूपये अगि्रम के रूप में जमा कराया था और परिवादी को उस दिन 30 ग्राम सोना न बेचकर आने वाले मंगलवार के दिन, उस दिन जो मूल्य होगा, उक्त अनुसार ही सोना देने का करार किया था।
(9) लेकिन प्रदर्ष सी-1 में दर्षाये करार के दिन मंगलवार को भी अनावेदक के द्वारा, परिवादी को उक्त 30 ग्राम सोना दिया नहीं गया और तब से अब-तक अनावेदक के द्वारा, परिवादी को न तो सोना दिया गया और न ही मूल्य के वास्ते प्राप्त की गर्इ अगि्रम राषि लौटार्इ गर्इ, जो कि-परिवादी की ओर से पेष साक्ष्य के अखणिडत षपथ-पत्र और प्रदर्ष सी-2 के परिवादी द्वारा जरिये अधिवक्ता भेजे नोटिस का अनावेदक द्वारा खण्डन न किये जाने और परिवाद का जवाब न पेष किये जाने की परिसिथति से पुश्ट है। तो विचारणीय प्रष्न क्रमांक-'अ को प्रमाणित होना निश्कर्शित किया जाता है।
(10) यह तो किसी तरह भी संभव नहीं कि-सोना-चांदी और उसके जेबरात के विक्रय का दुकान करने वाले अनावेदक के पास दिनांक-13.10.2012 से लेकर अब-तक के डेढ़ वर्श से अधिक अवधि के समय में परिवादी से अगि्रम राषि लेकर उसे विक्रय करने के लिए 30 ग्राम सोना भी उपलब्ध न रहा हो। तो वास्तव में उक्त परिसिथतियों में यह सिथति स्पश्ट है कि-माह सितम्बर और अक्टूबर-2012 में दीपावली के पूर्व से सोने के भाव में जो प्रतिदिन लगातार बढ़ोत्तरी हो रही थी और इसलिए अनावेदक, परिवादी को उससे रकम लेने के बाद भविश्य में जब सोने के दाम अधिकतम उंचे होना संभव हो, तब अनुचित रूप से उंचे दाम पर सोना विक्रय करना चाहता था और परिवादी से 1,00,000-रूपये अगि्रम लेकर उसे सोना खरीदी के व्यवहार में अनुचित रूप से फंसा लिया था और इसलिए करार अनुसार, प्रदर्ष सी-1 में दर्षाये मंगलवार के दिन परिवादी को अनावेदक ने 30 ग्राम सोना नहीं दिया और अधिक मूल्य प्राप्त करने की प्रत्याषा में टालता रहा, लेकिन दुर्भाग्य से कुछ समय बाद ही सोने के दाम में तेज गिरावट चालू हो गर्इ और 30,000-रूपये प्रति 10 ग्राम के मूल्य तक भी सोना अक्टूबर- नवम्बर- 2012 के बाद नहीं पहुंच पाया और इसलिए अनावेदक, परिवादी से प्राप्त रकम और उसे विक्रय किये जाने के लिए सोने को अपने पास लगातार रोके हुये है, जो कि-अन्य कोर्इ कारण ऐसी परिसिथतियों में संभव नहीं। तो स्पश्ट है कि-अनावेदक ने उक्त माल-सोना के प्रदाय में करार पार्इ गर्इ अवधि के परे विलम्ब, सोने की कीमत में बढ़ोत्तरी की संभावना को देखते हुये किया, ताकि परिवादी पर अनुचित कीमत या निर्बधंन अधिरोपित किये जा सकें, जो कि-ऐसा किया जाना अनावेदक द्वारा, परिवादी के प्रति किया गया अवरोधक व्यापारिक व्यवहार है और वस्तुओं की मूल्य में वृद्धि की प्रवत्ती को देखते हुये, उनकी जमाखोरी कर, विक्रय को उपलब्ध कराने से इंकार करना अनुचित व्यापार-प्रथा है। तो अनावेदक के द्वारा, परिवादी के प्रति-प्रतिबंधित व्यापार, व्यवहार व अनुचित प्रथा को अपनाया जाना स्थापित पाया जाता है। तदानुसार विचारणीय प्रष्न क्रमांक-'ब को निश्कर्शित किया जाता है।
विचारणीय प्रष्न क्रमांक-(स):-
(11) विचारणीय प्रष्न क्रमांक-'अ और 'ब के निश्कर्शों के आधार पर मामले में निम्न आदेष पारित किया जाता है:-
(अ) अनावेदक ने, परिवादी से सोना विक्रय के लिए जमा
करार्इ गर्इ 1,00,000-रूपये (एक लाख रूपये) अगि्रम
राषि का अपने व्यापार के लिए अनुचित रूप से लगभग
पौने दो वर्श से उपयोग किया है और सोने की मूल्य
वृद्धि की संभावना को देखते हुये, विक्रय करार अनुसार
सोना प्रदाय करने में विलम्ब, अनुचित लाभ के लिए
किया है, इसलिए अनावेदक, परिवादी से दिनांक-
13.10.2012 को प्राप्त की गर्इ 1,00,000-रूपये (एक
लाख रूपये) की राषि परिवादी को लौटाये।
(ब) अनावेदक ने परिवादी की उक्त राषि को अनुचित रूप से
अपने पास रोककर, अपने व्यवसाय में लगाकर लाभ कमाया है और परिवादी को उक्त राषि पर संभवित ब्याज की आर्थिक हानि कारित किया है, परिवादी के प्रति-अपनार्इ गर्इ अनुचित प्रथा से उसे जो मानसिक-कश्ट व असुविधा हुर्इ और जो ब्याज की आर्थिक हानि हुर्इ है, उन सबको देखते हुये, अनावेदक, परिवादी को 25,000-रूपये (पच्चीस हजार रूपये) हर्जाना अदा करे।
(स) अनावेदक उक्त राषियों का भुगतान आदेष की प्रति
प्राप्त होने के दिनांक से 30 दिन की अवधि के अंदर
परिवादी को करे, उक्त अवधि में भुगतान न होने पर,
आदेष के अपालन बाबद, दायित्वाधीन होने के अतिरिक्त
उक्त राषियों पर एक माह की अवधि के पष्चात के भविश्य की अवधि के लिए की जाने वाली विलम्ब अवधि के संबंध में 10 प्रतिषत वार्शिक ब्याज की दर से ब्याज, विलम्ब की सिथति में अदा करेगा।
(द) अनावेदक स्वयं का कार्यवाही-व्यय वहन करेगा और परिवादी को कार्यवाही-व्यय के रूप में 2,000-रूपये (दो हजार रूपये) अदा करेगा।
मैं सहमत हूँ। मेरे द्वारा लिखवाया गया।
(श्री वीरेन्द्र सिंह राजपूत) (रवि कुमार नायक)
सदस्य अध्यक्ष
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